
संजय कुमार सिंह
आज मेरे आठ में से सात अखबारों में में कनाडा की खबर लीड है। भारत-कनाडा संबंध, उससे प्रभावित होने वालों की संख्या तथा उसके संभावित परिणामों के कारण यही महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, ऐसे मामलों में हमारी सरकार और हमारे अखबार जो करते रहे हैं उससे भविष्य की चिन्ता अभी नहीं होगी और लगता है कि कनाडा ने विश्वगुरू से पंगा लेकर अपनी मौत को आमंत्रण दे दिया है। अमर उजाला की लीड देखिये, “कनाडा के आरोप बेबुनियाद, द्विपक्षीय रिश्तों पर होगा गंभीर असर, राजनयिक को तलब कर चेताया”। उपशीर्षक है, “भारत के गृहमंत्री अमित शाह का नाम घसीटे जाने पर कड़ा विरोध जताया; भारतीय राजनयिकों की ऑडियो–वीडियो निगरानी की भी निन्दा की”। लीड के साथ तीन कॉलम का एक शीर्षक है, “साइबर खतरे वाले देशों में शामिल करना एक और कुटिल चाल”। इसके ऊपर लाल रिवर्स में डेढ़ कॉलम का शीर्षक है, भारतीय अधिकारियों का उत्पीड़न। इसके मुकाबले द टेलीग्राफ का तीन कॉलम का शीर्षक है, “कनाडा के दावे निराधार : भारत“। फ्लैग शीर्षक है, “दिल्ली (भारत) को बदनाम करने की सोची–समझी रणनीति।“ ऐसा नहीं है कि इस शीर्षक में देशभक्ति कम लग रही हो लेकिन अमर उजाला की खबर में देश भक्ति कुछ ज्यादा ही है। मुझे लगता है कि मामला पर्याप्त गंभीर है और अंततः संबंध खराब ही होंगे। राजनीति और प्रचारक मीडिया का क्या है, ‘ना कोई घुसा था ना कोई घुसा हुआ है‘ के चार साल बाद और बावजूद एकदम मौके पर अब डिसएंगेजमेंट चल रहा है और किसी तरह महाराष्ट्र जीतने की संभावना बनाई जा रही है।
हिन्दू-मुसलमान, बंटेंगे तो कटेंगे और घुसपैठ का जो शोर मचाया जा रहा है और चुनाव आयोग का जैसा मौन समर्थन मिल रहा है उससे चुनाव जीतने और इस तरह की नीतियां जारी रहना अब लगभग निश्चित है। विदेश मामलों में सरकार की रणनीति यही है और आपको याद होगा कि भारत ने एकतरफा संबंध तोड़ने की घोषणा कर दी थी। ऐप्प बंद कर दिये गये थे। दीवाली पर चीन की लाइट नहीं लगाने का ‘आदेश’ था आदि आदि। अब जब संबंध ‘ठीक’ हुए तो उसकी घोषणा भी एकतरफा हुई और लगातार कई दिनों से डिसएंगेजमेंट की खबर लीड बन रही है जो भारत सरकार की ‘कामयाब’ विदेश नीति का प्रचार है। इस मामले में आज हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर (कम से कम शीर्षक) विदेश मंत्रालय के हवाले से है किसी अनाम सूत्र के हवाले तो नहीं ही है। खबर पढ़ने से लगता है कि विज्ञप्ति से लिखी गई है। फिर भी मुद्दा यह है कि विदेश मंत्रालय के हवाले से इस खबर में कहा गया है (गूगल का अनुवाद, संपादित), भारत ने शनिवार को कहा कि उसके सैनिक चार साल से अधिक समय तक चले सैन्य गतिरोध के बाद भारत और चीन के अग्रिम पंक्ति के बलों के पीछे हटने की पुष्टि करने के लिए डेमचोक और देपसांग में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर गश्त कर रहे हैं।
दोनों देशों ने 21 अक्टूबर को एलएसी के लद्दाख सेक्टर में गश्त करने पर एक समझौता किया था। इसका उद्देश्य अप्रैल–मई 2022 में शुरू हुए टकराव से संबंधित मुद्दों को दूर करना और उनका समाधान करना था। दो दिन बाद, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पांच साल में पहली बार रूसी शहर कज़ान में मुलाकात की और सीमा मुद्दे को हल करने और द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने के लिए कई तंत्रों को पुनर्जीवित करने पर सहमति व्यक्त की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक नियमित मीडिया ब्रीफिंग में कहा, “आप सभी जानते हैं कि 21 अक्टूबर, 2024 को भारत और चीन के बीच अंतिम चरण की वापसी पर सहमति हुई थी।” उन्होंने कहा, “परिणामस्वरूप, डेमचोक और देपसांग में परस्पर सहमत शर्तों पर सत्यापन गश्त शुरू हो गई है।” दो “प्रमुख बिंदुओं” का जिक्र किया जो पिछले दो वर्षों में भारत और चीन के बीच कूटनीतिक और सैन्य चर्चाओं का केंद्र रहे हैं। मामले से परिचित लोगों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि भारतीय बलों द्वारा गश्त का उद्देश्य यह सत्यापित करना है कि सैनिकों और उपकरणों को टकराव वाली जगहों से एक निर्दिष्ट और परस्पर सहमत दूरी पर वापस खींच लिया गया है। लोगों ने कहा कि डेमचोक और देपसांग में भारतीय और चीनी सैनिकों की वापसी 23 अक्टूबर को शुरू हुई और 30 अक्टूबर को पूरी हुई।
इस खबर से स्पष्ट है कि पूरे मामले में भारत ने कुछ किया हो या नहीं किया हो, चीनी सैनिक अपनी मर्जी से भारतीय सैनिकों के पास आये और 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए। संयोग से यह बिहार चुनाव के मौका था। अब लगभग अपनी मर्जी से (या भारत सरकार के कहने पर) लौट गये हैं और मौका झारखंड व महाराष्ट्र चुनाव का है। कई दिनों से रोज खबर छपने से लग रहा है कि इसका उपयोग (हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए) किया जा रहा है वरना खबर तो चार साल के दौरान होनी चाहिये थी जब कब्जा था और गश्ती बन्द थी। 70 साल कुछ नहीं हुआ था इसलिए नोटबंदी, जीएसटी, शेल कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई और एनजीओ की कमाई रोकने तथा उनके बंद होने का जो असर हुआ उसे देश झेल पाया। मुफ्त के सरकारी राशन से काम चल जा रहा है लेकिन कनाडा से संबंध बिगड़े तो मामला चीन जैसा नहीं होगा कि सिलेबस से बाहर कर दिया। वहां रह और कमा रहे हजारों लोगों को वापस आना पड़ सकता है। ये सब यहां बेरोजगार रहेंगे और अभी परिवार के लिए जो पैसे भेजते हैं उसके बिना देश की अर्थव्यवस्था का जो हाल होगा उसकी कल्पना की जा सकती है। संभव है, सरकार या भाजपा के पास इसका कोई उपाय हो लेकिन अभी तक जो उपाय किये जाते रहे हैं उससे नहीं लगता है कि जनता की परेशानी में कोई कमी आने वाली है।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस पूरे मामले को एक कॉलम में निपटा दिया है। शीर्षक है, “भारत ने राजनयिक को तलब कर कनाडा सरकार को परिणाम भुगतने की चेतावनी दी”। मुझे लगता है कि इतना पर्याप्त है। जो भी हो, कश्मीर में आतंकवादियों के मारे जाने की खबर यहां लीड है। अमर उजाला में यह सेकेंड लीड है। यहां छपी खबर के अनुसार, फारुक अब्दुल्ला ने कहा है कि आतंकियों को मारें नहीं पकड़ें। खबर इस प्रकार है, नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने मुठभेड़ों की बढ़ती संख्या पर सवाल उठाते हुए स्वंतत्र जांच की मांग की है। उन्होंने कहा है कि आतंकियों को मारने की बजाय गिरफ्तार करना चाहिये। उनसे पूछताछ कर पता लगाया जाना चाहिये कि क्या उमर को अस्थिर करने का काम किसी एजेंसी को सौंपा गया है। अमर उजाला में आतंकवादियों के मारे जाने की खबर सेकेंड लीड है और उसके साथ फारुख अब्दुल्ला का यह बयान मुझे एकदम सामान्य और जरूरी लग रहा है। लेकिन इसपर भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला का बयान दाढ़ी में तिनके की तरह है। बयान दुर्भाग्यपूर्ण के बोल्ड उपशीर्षक से छपी इस खबर में कहा गया है – फारूक का बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। कुछ लोग सुरक्षा बलों पर दोष मढ़ रहे हैं। संवेदनशील मुद्दे पर भी कुछ लोग देश की बजाय परिवार और वोटबैंक को प्राथमिकता दे रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ने फारुक अब्दुल्ला की खबर को तीन कॉलम में तो छापा ही है, शीर्षक है – फारुक ने आतंकी हमलों में वृद्धि की जाच की मांग की, भाजपा ने उनपर हमला बोला।
टाइम्स ऑफ इंडिया में आतंकवादियों के मारे जाने की खबर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, एलईटी कमांडर, दो और आतंकी कश्मीर में मुठभेड़ में मारे गये। इंट्रो है, सीआरपीएफ के दो और जम्मू व कश्मीर पुलिस के दो घायल हुए। फारुक अब्दुल्ला का बयान इसमें हाईलाइट किया हुआ नहीं है। द हिन्दू में आतंकियों के मारे जाने की खबर आठ खॉलम में एंकर है। फारुक अब्दुल्ला का सुझाव इसमें बोल्ड उपशीर्षक से अंतिम पैरे के रूप में है, उन्हें जिन्दा पकड़िये। यहां लिखा है, इन हमलावरों तो जिन्दा पकड़ा जाना चाहिये ताकि पता चले कि इनके पीछे कौन हैं। मुझे लगता है कि यह भी सही है भाजपा के पलटवार से दाढ़ी का तिनका दिख गया है और इसीलिए प्रचारकों ने इसे हिन्दुस्तान टाइम्स की तरह प्रमुखता नहीं दी है। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर तीन कॉलम में है। उपशीर्षक है, 2023 में इंस्पेक्टर की हत्या में विदेशी आतंकवादी शामिल था। नवोदय टाइम्स में यह चार कॉलम की खबर है, लश्कर का शीर्ष पाकिस्तानी कमांडर ढेर। दि एशियन एज में यह खबर तीन कॉलम में है। शीर्षक गौर तलब है, आतंकमुक्त श्रीनगर में दो साल बाद गोलियों की आवाज गूंजी। एलईटी का टॉप कमांडर मार गया, चार सुरक्षा कर्मी जख्मी हुए हैं।
द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार तीन मुठभेड़ में तीन आतंकी मरे के साथ फारुक की खबर भी है और शीर्षक ही है, हमलों में फारुख अंदरूनी साजिश देख रहे हैं। अगर उन्हें ऐसा लग रहा है तो वह निराधार नहीं है और उन्होंने तो अगली बार हमलावर आतंकियों को जिन्दा पकड़ने की कोशिश करने और उससे यह पता लगाने की जरूरत बताई है कि हमलावर कौन हैं। भाजपा का इससे परेशान होना रेखांकित करने योग्य है। कहने की जरूरत नहीं है कि गुजरात मॉडल के दस साल समेत उसके देश भर में लागू होने के बाद कुल 20 वर्षों में बहुत सारी घटनाओं की जांच नहीं हुई है। अब जांच के नाम पर ही मिर्ची लगने जैसे उदाहरण हैं और जांच नहीं कराने के लिए दी गई दलीलों के साथ-साथ मामले तो दिलचस्प हैं ही। जांच नहीं होने का नुकसान (या नफा) यह है कि अपराधी पकड़े नहीं गये हैं और बचाव का उपाय वही घिसा-पिटा तथाकथित ‘पलटवार’ है।
इस बीच दिल्ली की हवा फिर ‘बहुत खराब’ की श्रेणी में चली गई है (हिन्दुस्तान टाइम्स और दि एशियन एज)। भाजपा ने ब्लैकमेल किया : कांग्रेस ने अजीत पवार के एनडीए में जाने की जांच कराने की मांग की है और ब्लैक मेल करने का आरोप लगाया है – दि एशियन एज में सिंगल कॉलम की खबर है। द टेलीग्राफ की एक सिंगल कॉलम की खबर के अनुसार मुस्लिम उम्मीदवार के दौरे के बाद मंदिर को गंगा जल से धोया गया। आज हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम की एक खबर से पता चलता है कि चुनाव पूर्व घोषणाओं को लेकर कांग्रेस-भाजपा की तकरार काफी बढ़ गई है। खबर के अनुसार, शनिवार को कांग्रेस नेताओं ने भाजपा के आरोपों पर जवाबी हमला किया और केंद्र सरकार के प्रदर्शन पर प्रकाश डालने के लिए उसी के आंकड़ों का उपयोग किया। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार आगरा के 14 साल के एक लड़के के पेट से ऑपरेशन करके बैट्री, चेन, स्क्रू और ब्लेड जैसी 65 चीजें निकाली गईं। पेट में संक्रमण से उसकी मौत हो गई। उसके पिता ने बताया कि 13 अक्तूबर तक वह ठीक-ठाक था और उसे कोई बीमारी नहीं थी। सांस लेने में दिक्कत की शिकायत पर उसे जयपुर, अलीगढ़ और नोएडा के अस्पतालों में ले जाया गया। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में पांच घंटे की जटिल सर्जरी के बाद उसके पेट से सारी चीजें निकाली गईं पर उसे बचाया नहीं जा सका। टाइम्स ऑफ इंडिया की ही एक अन्य खबर के अनुसार, विमान में बम होने की झूठी खबर देने के आरोप में गिरफ्तार 35 साल के जगदीश उइके ने आतंकवाद पर अपनी किताब के एनडोर्समेंट के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय को 100 ई-मेल भेजे थे जवाब नहीं मिलने पर उइके ने बम होने की फर्जी सूचना देनी शुरू की।


