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उत्तर प्रदेश

मुस्लिम साधुओं को गिरफ्तार करने वाली पुलिस और सरकार को यह इतिहास भी जानना चाहिए!

राहुल पांडेय-

पिछले हफ्ते गाजीपुर जिले के एक गांव से तीन लोगों को पुलिस ने गेरुआ वस्त्र धारण करके भिक्षा मांगने के आरोप में जेल में बंद कर दिया। आरोप है कि तीनों मुस्लिम थे, गेरुआ पहनकर सारंगी बजाते हुए गांव-गांव घूमकर भिक्षा मांगते थे।

तीनों कहते ही रह गए कि पीढ़ियों से गेरुआ पहनकर भीख मांगते रहे हैं, गोरखपंथी हैं। और तो और, तीनों ने खुद को मऊ के जिस गांव का निवासी बताया, वो भी मुस्लिम बहुल गांव है, और वहां के अधिकतर मुस्लिम गेरुआ पहनकर भीख मांगने का काम पीढ़ियों से करते रहे हैं।

जाहिर है कि नाथ संप्रदाय, गेरुआ और इसके मुस्लिम कनेक्शन से न तो पुलिस परिचित है, और न ही इन तीनों जोगियों को पकड़वाने वाले। परिचित होते तो उनको पता होता कि गुरु गोरखनाथ ने जिस बारहपंथी समाज की शुरुआत की थी, उसमें हिंदू-मुसलमान दोनों थे।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम नाथ जोगियों के दर्जनों गांव हैं। यहां के मुस्लिम गेरुआ धारण करते हैं और खुद को नाथ जोगी मानते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी ये लोग हाथ में सारंगी लेकर नाथ संप्रदाय से जुड़े भजन गाते हुए भिक्षाटन करते रहे हैं। गुरु गोरखनाथ के प्रभाव में मध्यकाल में ढेरों मुस्लिमों ने भी नाथ पंथ अपनाया था। मेरे बचपन में ऐसे जोगी बहुत दिखते थे, अब कभी-कभार ही दिखते हैं।

ब्रिटिश इंडिया के प्रसिद्ध प्राच्यवादी जॉन वेस्टन ब्रिग्स ने एक किताब लिखी थी- ‘गोरखनाथ एंड दि कनफटा योगीज’। इसमें 1891 की जनगणना के हिसाब से वो बताते हैं कि तब भारत में सवा दो लाख योगी थे, जिनमें अवध और आगरा के इलाके में सबसे ज्यादा मुस्लिम योगी ही थे।

1921 की पंजाब की जनगणना बताती है कि तब वहां 30 हजार से भी अधिक मुस्लिम योगी थे। और गेरुआ सिर्फ नाथपंथी मुस्लिम जोगी ही नहीं पहनते हैं। गेरुआ रंग सूफी सिलसिले (धारा) से भी जुड़ा है। सूफियों के चिश्ती सिलसिले में नारंगी या भगवा रंग त्याग, साधना और सेवा का प्रतीक है, वे इस रंग को ससम्मान धारण करते हैं।

अजमेर दरगाह दर्शन करने जाएंगे तो वहां अधिकतर बाबाओं को गेरुए रंग में ही पाएंगे। खुद अखिल भारतीय सूफी सज्जादानशीन परिषद के अध्यक्ष हजरत सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती गेरुए रंग का लिबास पहनते हैं।

ऐसे ही सूफियों का कादरी सिलसिला भी गेरुआ धारण करता है जहां यह रंग आत्मा की शुद्धता और ईश्वर के प्रति गहन प्रेम का प्रतीक है। सूफियों का एक सुहरावर्दी सिलसिला भी है, जिसके संत शहाबुद्दीन सुहरावर्दी और उनके शिष्य इस रंग को आध्यात्मिकता और प्रेम का प्रतीक मानते हैं।

गेरुए से मिलता-जुलता पीला रंग भी है, और अवध को जानने वाले अच्छे से जानते हैं कि देवा शरीफ की होली इसी रंग की होती है। कहते हैं कि जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह अपना वर्तमान और भविष्य- दोनों बिगाड़ती हैं।

गाजीपुर की घटना बताती है कि वर्तमान कहीं न कहीं बिगड़ रहा है। पुलिस बाकायदा समय का चालान करके जेल भेज रही है।

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