पुलवामा अटैक के दौरान ट्रंप ने भारत के आत्मरक्षा अधिकार का समर्थन किया था। बहरहाल सभी एशियाई देश अपने-अपने हितों के चश्में से ट्रंप की सत्ता का आंकलन करने में जुट गए हैं। भारत को भी उनके पिछले कार्यकाल में भारत के हितों को लेकर समीक्षा करनी चाहिए…

महेश शर्मा-
हाल ही में एक ट्वीट में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का हिंदुओं के प्रति प्रेम की झलक ने यह जता दिया था कि वै्श्विक पटल पर अमरेका भारत के साथ खड़ा है। शायद यह वजह हो सकती है कि भारतीय मूल के लोगों की बतौर अमेरिका राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पहली पसंद थे।
यही नहीं रिपब्लिकन पार्टी की भारत से रिश्तों के प्रति नरमी और चीन, पाकिस्तान जैसे देशों के प्रति उसकी गरमी का लाभ भारत को मिलना लगभग तय है। तभी तो उनके दूसरे चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में नारा दे दिया था कि- अबकी बार ट्रंप सरकार।
मोदी के अमेरिका में भाषण के दौरान इस जुमले की विपक्ष ने आलोचना भी की थी। पर शायद ने मोदी को डेमोक्रेट की कमला हैरिस के मुकाबले अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप ज्यादा मुफीद हैं। वो बात दीगर है कि ट्रंप अपना दूसरा चुनाव डेमोक्रेट के जो बाइडन से हार गए थे। पर अबकी शिकस्त दे दी।
ट्रंप का यह ट्वीट भारत के प्रति अमेरिका के भावी रिश्तों को झलकाता है। हाल ही में ट्रंप ने बांग्लादेश में हिंदुओं, ईसाइयों और दूसरे अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा था कि वह बांग्लादेश में हिंदू, ईसाई और दूसरे अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा और भीड़ की लूट की कड़ी निंदा करते हैं। इस समय बांग्लादेश में पूरी तरह अराजकता की स्थिति है। ट्रंप ने आगे लिखा कि अगर वह राष्ट्रपति होते तो ऐसा कभी न होने देते। कमला हैरिस और जो बाइडन ने पूरी दुनिया और अमेरिका में हिंदुओं की अनदेखी की है।
इजराइल से लेकर यूक्रेन तक उनकी नीति भयावह रही है। ट्वीट में वह अमेरिका को एक बार फिर मजबूत बनाने का संकल्प लेते दिखे। उन्होंने लिखा कि वह रेडिकल लेफ्ट के धर्म विरोधी एजेंडे से हिंदू अमेरिकी को बचाएंगे। ट्रंप ने यह संकल्प भी दोहराया कि उनके शासन में वह भारत और दोस्त नरेंद्र मोदी के साथ संबंधों को और मज़बूत करेंगे।
उनके पिछले कार्यकाल पर सिंहावलोकन करें तो डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्तों को मजबूती मिलेगी। अमेरिका फर्स्ट उनका नारा है। ऐसे में अमेरिकी चीजों और सेवा के आयात पर अधिक टैरिफ लगाने वाले देश पर उनकी भृकुटि तन सकती है।
ऐसे में भारत भी दायरे में आ सकता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि उनकी नजरों में भारत कारोबारी नियमों का उल्लंघन कुछ ज्यादा ही करता रहा है। अमेरिकी चीजों पर ज्यादा टैरिफ के वह खिलाफ हैं। वह चाहते हैं कि 20 फीसदी तक ही टैरिफ लगे। उम्मीद की जा रही है कि इस कार्यकाल में रिश्तों में ज्यादा ही मधुरता की उम्मीद की जा सकती है।
दूसरी तरफ वाम या मध्यमार्गी अर्थशास्त्री मानते हैं कि ट्रंप के टैरिफ नियम 2028 तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी 0.1 प्रतिशत गिरावट का सबब हो सकते हैं। दोनों देशों के बीच करीब 200 अरब डॉलर का व्यापार होता है। इसका महंगाई और ब्याज दरों में कटौती पर असर पड़ सकता है। दूसरी तरफ अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करता हुआ आगे बढ़ने वाला चीन पर ट्रंप के आने के बाद लगाम लग सकती है।
जगजाहिर है कि उसके चीन से रिश्ते बहुत अच्छे कभी नहीं रहे। यही स्थिति आती है तो भारत और अमेरिका के बीच रक्षा मजबूत होंगे। यह विश्व जानता है कि उनके पहले कार्यकाल में क्वाड को मजबूती देने में वह दिलचस्पी रखते थे। क्वाड चार देशों का समूह है जिसमें भारत, आस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका हैं। यह अनऑफिशियल मंच है जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र की रणनीतिक सुरक्षा और आपसी सहयोग पर बातचीत करते हैं।
यही नहीं उनके सत्ता में आने के बाद भारत के साथ हथियारों के निर्यात, संयुक्त सैन्य अभ्यास और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में दोनों देशों के बीच ज़्यादा अच्छा तालमेल दिख सकता है। यह भी भारत की मजबूती के संकेत हैं। खासकर पाकिस्तान और चीन तो पक्का तिलमिला रहा होगा। ऐसे में साफ कहा जा सकता है कि डोनल्ड ट्रंप वास्तव में वैश्विक क्षितिज में भारत के लिए ट्रंप कार्ड ही साबित होंगे। फिर भारत भला कमला को क्यों पसंद करें। उनका पिछला कार्यकाल भारत से बड़े रक्षा समझौते वाला साबित हुआ। मोदी से उनकी दोस्ती भी जगजाहिर है।
हां, उनकी नीतियां प्रवासियों के लिए मुश्किलों का सबब हो सकती हैं। चुनाव अभियान के दौरान वह इस पर काफी मुखर भी रहे। अवैध प्रवासियों को वापस उनके देश भेजने का वादा किया है जिसे पूरा करेंगे ही क्योंकि अवैध प्रवासी अमेरिकियों के जॉब ऑपरच्युनीटी खत्म कर रहे हैं।
भारत पर इसलिए भी असर पड़ेगा क्योंकि भारी संख्या में भारतीय एच-1 बी, वीजा पर जाकर टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम करते हैं। ट्रंप इसके नियमों पर सख्ती दिखायी थी। यह नीति भारत की पेशेवर टेक्नोलॉजी कंपनियों के कारोबार पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। उन्हें दूसरे देशों की तरफ मोड़ सकती है।
दूसरी बात यह भी कि डोनल्ड ट्रंप की भारत के मानवाधिकार के ट्रैक रिकार्ड पर चुप्पी भारत के सरकार के लिए फीलगुड का एहसास करा सकती है। इसका एक उदाहरण यह भी है कि पुलवामा अटैक के दौरान ट्रंप ने भारत के आत्मरक्षा अधिकार का समर्थन किया था। बहरहाल सभी एशियाई देश अपने-अपने हितों के चश्में से ट्रंप की सत्ता का आंकलन करने में जुट गए हैं।
भारत को भी उनके पिछले कार्यकाल में भारत के हितों को लेकर समीक्षा करनी चाहिए। क्या इस कार्यकाल में ट्रंप भारत से रिश्तों के मामले में और भी बेहतर साबित होंगे या नहीं। यह वक्त बताएगा। फिलहाल मिडिल ईस्ट में उनकी सरकार की संभावित भूमिका के साथ ही रूस और यूक्रेन युद्ध विराम की दिशा में उनके कदम का इंतजार रहेगा।



chhotebhai
November 7, 2024 at 1:05 pm
मैं ट्रम्प का फैन नहीं हूँ