मनीष दुबे-
झांसी में देर रात बड़ी घटना हो गई. सुबह सोकर उठा तो तमाम ग्रुपों में भिन्न-भिन्न एंगलों से खबरें चल रही थीं. लोग एक दूसरे से घटना पर प्रतिक्रिया ले-पूछ रहे थे.
छत्तीसगढ़ के एक पत्रकार मित्र ने मुझसे पूछा – कुछ लिखा है क्या?
मुझे अभी सिर्फ इतना पता है कि झांसी के किसी अस्पताल में आग लगी है, मैंने जवाब दिया. यह आठ बजे के बाद का समय था. अभी अख़बार भी नहीं देखा था.
अख़बार उठाकर देखा तो सबसे पहले मेरी जिज्ञासा यह जान लेने की हुई कि- कितने मरे?
झांसी में कितने मरे.. से वरिष्ठ पत्रकार व फिल्मकार विनोद कापड़ी का वह लेख याद आ गया जो हंस पत्रिका के 2007 के एक एडिशन में छपा था. लेख का शीर्षक था- कितने मरे?
विनोद कापड़ी ने इस पत्रिका के लिए यह लेख एक घटना व न्यूज चैनलों की मानसिकता पर बेस्ड लिखा था. जो बताता है कि टीवी की सनसनी के लिए ज्यादा से ज्यादा मौतों का होना और जल्द से जल्द खबर के दायरे तक पहुंचना कितना जरूरी होता है. लेख में बताया गया है कि टीवी के लिए बड़ी घटनाएं को कैसे इवेंट की तरह लिया जाता है जिनकी कवरेज की टाइमिंग खूब मायने रखती है, फिर चाहें किसी सहकर्मी की जान पर ही क्यों न बन आए!
बहरहाल, झांसी की घटना सरकारी सेवाओं और तमाम सुरक्षा उपायों की पोल खोलती है जो आम जन जीवन को समय समय पर संकट में डाल देती है. कुछ समय पहले गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में भी इसी तरह का मामला सामने आया था.
झांसी की इस घटना में सुखद यह रहा कि 37 बच्चों को बचा लिया गया, जबकि 10 को सुरक्षा नहीं मिल सकी. इस पर कुछ दिन हो-हल्ला जरूर मचेगा, और फिर से जनता सब कुछ भूला देगी. वैसे भी राशन और हिंदू राष्ट्र के नाम पर सबकुछ झेल लेने वाले भी तो कम नहीं हैं?
https://twitter.com/yashbhadas/status/1857515660882096546?t=ZNRPf6Yui3JT476NYMlXaQ&s=08
नीचे पहले विनोद कापड़ी का लेख- कितने मरे? पढ़ें, उसके बाद झांसी की घटना की कतरन भी देखें…










