जिस तरह गगूल और फेसबुक बिना एक खबर लिखे या खबर लिखने का खर्च उठाये बिना, महज टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण के आधार पर बड़े मीडिया हाउस बन गये उसी तरह एआई कम्पनियाँ इंटरनेट पर मौजूद सारी सामग्री को अपनी जायदाद समझते हुए उन्हीं लोगों को बेरोजगार कर देंगी जिनकी सामग्री से एआई पल रहा है…

रंगनाथ सिंह-
एआई के रूप में दुनिया को वैसी ही तकनीक प्राप्त हो चुकी है जैसी किसी जमाने में इंटरनेट प्राप्त हुआ था या किसी जमाने में टेलीफोन या रेडियो या कैमरा या किसी जमाने में प्रिंटिंग प्रेस प्राप्त हुआ था या किसी जमाने में भाप का इंजन प्राप्त हुआ था या किसी जमाने में रथ का पहिया प्राप्त हुआ था या किसी जमाने में गेहूँ-चावल को उगाने की तकनीक प्राप्त हुई थी। अब से न्यूनतम 50 साल तक एआई का दबदबा रहेगा। जिस तरह आज इंजन, इंटरनेट, प्रेस, फोन, कैमरा इत्यादि आम बात हो चुके हैं, उसी तरह 10-20 साल बाद एआई (AI) आम बात हो जाएगी मगर तब तक यह दुनिया को आमूलचूल तरीके से बदल चुका होगा।
नीचे दिख रही तस्वीर मित्र अनुराग शर्मा ने ग्रोक से बनायी है। तस्वीर में भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय उनकी पालन-कर्ता कृत्तिकाओं के साथ हैं। एआई (AI) भाई कितने लोगों को बेरोजगार करेंगे पता नहीं मगर कुछ नौकरियाँ सीधे उनके निशाने पर हैं।
एआई ने अपने छोटे से जीवन में यह दिखा दिया है कि अब फीचर इमेज या थम्ब इमेज बनाने वालों की जरूरत पहले से काफी कम हो जाएगी। गूगल करके लिखने वालों की जरूरत भी काफी कम हो जाएगी। किसी चीज का सारांश या विश्लेषण लिखने वालों की जरूरत भी कम हो जाएगी। अनुवाद करने वालों की जरूरत भी कम हो जाएगी।
कुछ मित्रों ने चैट जीपीटी से तैयार सामग्री मुझे देखने के लिए दी। उसे देखकर मैं हतप्रभ रह गया! कोई प्रोफेसर या वरिष्ठ पत्रकार जैसा ड्राफ्ट लिखेगा, वैसा ड्राफ्ट चैट (ChatGPT) भाई ने चटपट लिख दिया था।
जिस तरह गगूल और फेसबुक बिना एक खबर लिखे या खबर लिखने का खर्च उठाये बिना, महज टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण के आधार पर बड़े मीडिया हाउस बन गये उसी तरह एआई कम्पनियाँ इंटरनेट पर मौजूद सारी सामग्री को अपनी जायदाद समझते हुए उन्हीं लोगों को बेरोजगार कर देंगी जिनकी सामग्री से एआई पल रहा है। मीडिया मालिकों ने कुछ साल बाद गूगल और फेसबुक से कुछ हासिल भी कर लिया मगर आम लोग एआई कम्पनियों से क्या ही हासिल कर लेंगे!
मुझे तो डर है कि फासीवाद, तानाशाह, शासन, सत्ता, जनता, आवाज, आजादी, अभिव्यक्ति इत्यादि बीजशब्दों से एआई साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कविता या बकलोल प्रसाद पुरस्कार प्राप्त उपन्यास न लिख दें!
एक मित्र ने एक वेबसाइट बतायी जिसका सारा कंटेंट (टेक्सट और इमेज) दोनों एआई से तैयार किया जाता है और उसपर 10 लाख से ज्यादा पाठक हर महीने आते हैं। जाहिर है कि वेबसाइटों का एईओ भी एआई कर रहा है। एआई ने कम्प्यूटर प्रोग्राम के कोड लिखना शुरू कर दिया है। बहुत सारे प्रोग्रामरों की भी नौकरी एआई खाएगा।
बहुत सारे लोगों को मोहनदास गांधी द्वारा तकनीकी और बेरोजगारी के आपसी सम्बन्धों पर जतायी चिन्ता हास्यास्पद लगती है। गांधी जी के चिन्तन में तर्कदोष थे जिसकी वजह से वे गलत नतीजों पर पहुँचे थे मगर उनकी मूल भावना बिल्कुल दुरुस्त थी। जिसे इंग्लिश में “हार्ट एट राइट प्लेस” कहते हैं। दुर्भावना से की गयी निन्दा और सद्भावना से की गयी आलोचना के बीच फर्क करना चाहिए। गांधी जी जो चिन्ता उस वक्त की तकनीक को लेकर जता रहे थे, वही चिन्ता आज हम एआई को लेकर व्यक्त कर रहे हैं।
जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ एआई की मार सबसे ज्यादा उन नौकरियों पर पड़ेगी जिन्हें कुर्सी-कम्प्यूटर के दम पर कथित “बौद्धिक क्षमता” के आधार पर किया जाता है। टिकट काटने का काम तो पहले ही मशीन करने लगी थी। एआई और भी बहुत सारे लिपिकीय कार्य कर लेगा। सेंसर ने साहब लोगों के लिए दरवाजा खोलने के लिए खड़े चौकीदार की नौकरी खत्म कर दी है। इस तरह की अन्य कई नौकरियाँ खत्म हो जाएँगी।
मेरे लिए राहत की केवल इतनी बात है कि एआई द्वारा खत्म की गयी नौकरियों की अंतिम अवस्था आते-आते मैं भी खत्म हो चुका होऊँगा। मनुष्य की सीमा है कि वह यथार्थ का आंशिक अनुमान ही लगा सकता है। पूर्ण अनुमान लगाने का सामर्थ्य उसके वश में नहीं है। वह दो-चार घटनाओं की आहट समय से पहले पा लेता है, मगर बाकी 96-98 घटनाएँ घटित होने के बाद ही नजर आती हैं। तर्क आपको एक सीमा से आगे नहीं ले जा सकते। तर्क और प्रेक्षण की सीमा जहाँ खत्म होती है, वहाँ से ईश्वर की सीमा शुरू होती है। इसलिए केवल ईश्वर जानता है कि एआई क्या करेगा!


