बोधिसत्व-
बात 1995 की होगी। एक युवा कवि का विवाह हुआ। वह पहले लेखकों के एक संगठन में था बाद में द्रोही हो गया। गुरु जी को महत्त्व नहीं देता था। गुरु जी उसकी नई गृहस्थी उजाड़ देना चाहते थे। यह गुरु जी अपने मन के आनन्द के लिए कर रहे थे। उसे उजाड़ने के लिए। बस मन बहलाव के लिए।
इस मुद्दे को अभियान की तरह लिया गया। गुरुजी शौचालय बनवाने और मूत्र विसर्जन के लिए जाने को भी आंदोलन बना देते थे। उनके डेरे पर चेलों के साथ उनकी एक रचनात्मक बैठक हुई। एक चिट्ठी लिखी गई। उस अभी-अभी विवाहित व्यक्ति की एक पूर्व प्रेमिका की कल्पना की गई। उसकी ओर से लिखी चिट्ठी में काफी बारीक प्रेम प्रसंगों का काव्यात्मक विवरण पेश किया गया।
यह भी बताया गया कि उसका और प्रेमी कवि का बच्चा अब स्कूल जाने लगा है। फिर जीवन और जवानी काटने के अनेक मार्मिक उलाहने के बाद यह भी लिखा कि तुमको देख पाऊंगी तो जीती रहूंगी। दर्शन दे दिया करो मेरे छैला! वो मेरे अपूर्व बालम!
चिट्ठी में ऐसी बातें इस उद्देश्य के साथ लिखी गईं कि यदि उस कवि की पत्नी पढ़े तो तत्काल तलाक के लिए दौड़ पड़े। तय हुआ कि अगले एक सप्ताह तक कवि के घर में ऐसी चिट्ठी डाली जाए। और उसका प्रभाव कवि के जीवन पर देखा जाए। सारी चिट्ठियां एक साथ लिख कर एक अद्वितीय कवि को दे दी गईं। उस अद्वितीय कवि ने सात लिफाफे बनाए और उनको लेकर भाव विभोर भी होता रहा। गुरु जी की तीक्ष्ण बुद्धि का विवेचन करने में उसने कई बार प्रयत्न किया। लेकिन पार न पाया।
उसने निष्ठा से वे सब चिट्ठियां नव विवाहित कवि के घर में ऐसे समय डालीं जब कवि घर पर नहीं था। नव विवाहित कवि पर गहरी निगाह रखी गई कि उसके चेहरे पर नाखून के खरोंच आए कि नहीं। कुर्ते कमीज़ फाड़े गए कि नहीं। आदि-आदि।
उन चिट्ठियों का क्या प्रभाव हुआ यह तो नहीं पता चला। लेकिन अपने सुलेख में चिठ्ठी लिखने और पहुंचाने वाले अद्वितीय कवि का अपना दांपत्य जीवन लगभग मृत प्राय है आजकल। पत्नी सालों से बिना श्रृंगार के मायके में मर रही है। कवि कहीं और क्रांति कर रहा है। वह हर दिन क्रांति करता है।
ज्ञानी जनों का अनुमान है कि शायद गुरु जी ने इस अद्वितीय कवि के घर में किसी और कवि से वैसी ही सात चिठ्ठियां सात दिनों में डलवा दी होंगी।
चेले बदल जाते हैं तो नए चेले आ भी तो जाते हैं। चिठ्ठी और उसका मजमून तो कभी भी और आधुनिक और मार्मिक बनाया जा सकता है!


