संजय कुमार सिंह
अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, “राजनेताओं के खिलाफ दर्ज हर मामला दुर्भावनापूर्ण नहीं होता : सुप्रीम कोर्ट”। पूरी खबर से यह नहीं पता चल रहा है कि पश्चिम बंगाल के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली कि नहीं या कब मिलेगी। यह सब तब है जब सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ही, जमानत नियम है और जेल अपवाद है। खबर के अनुसार इस मामले में पैसे बरामद हुए हैं पर तथ्य यह है कि पैसे किसी और के यहां से बरामद हुए हैं और उसे जमानत मिल चुकी है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि मंत्री अपने घर में पैसे नहीं रखेंगे और इस आधार पर 73 साल के राजनेता को दो साल से ज्यादा से जमानत नहीं मिल रही है जबकि नरेन्द्र मोदी ने भ्रष्टाचार के जो भी मामले बताये थे उनमें कोई साबित नहीं हुआ है। दिल्ली के मुख्यमंत्री, आम आदमी पार्टी के कई नेता, महाराष्ट्र के मंत्री, हेमंत सोरेन जैसे कई विपक्षी नेताओं के अपराध 2014 के बाद के हैं, लंबे समय तक जेल में रह चुके हैं जबकि विपक्ष के जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के मामले थे वो वाशिंग मशीन में धुलकर वाशिंग मशीन पार्टी में माल काट रहे हैं। न तो किसी को दिख रहा है और ना किसी के लिए मुद्दा है।
ऐसे में पार्थ चटर्जी को जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट आना पड़ा यह भी खबर है लेकिन बताया जा रहा है कि राज्य यानी सत्ता यानी सरकार यानी नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार गलत नहीं करती है कि विपक्षी नेताओं को जेल में बंद कर देती है। मुझे लगता है कि यह खबर नहीं, सरकार का पक्ष प्रचार है, विज्ञापन है और कई दूसरी खबरों की तुलना में बिल्कुल बेमतलब है। एक संवैधानिक संस्था का लिजलिजापन तो है ही जिसे भारतीय मानक व्यवस्था के रूप में पेश किया गया है। वैसे भी, सुप्रीम कोर्ट की हर टिप्पणी या कानून से संबंधित हर ज्ञान खबर नहीं होती है। कल ही मैंने एक वीडियो इसलिए नहीं देखा कि जब मुझे चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखनी ही नहीं है तो उससे संबंधित कानून जानकर क्या करूंगा। ठीक है कि मामला आईटी ऐक्ट से संबंधित है कंप्यूटर या फोन पर भी देखे जाने पर कार्रवाई हो सकती है। यह भी सच है कि कंप्यूटर में ऐसे वीडियो प्लांट किये जा सकते हैं और उसके लिए भी जेल हो सकती है। लेकिन इस कारण यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि मैं उससे संबंधित नियम जानूं। जब फंस जाउंगा तो हमारे वकील देंखेंगे। जब मुझे बलात्कार करना नहीं है तो बलात्कारी के बचने के उपाय जानकर क्या करूंगा।
अमर उजाला की यह खबर सरकार के प्रचार के अलावा कुछ नहीं है और अगर भ्रष्टाचार पर सुप्रीम कोर्ट के कहे को ही लीड बनाना है तो आज ही दि एशियन एज की लीड है, अदाणी मामले में विपक्ष के प्रदर्शन को लेकर संसद दूसरे दिन स्थगित हो गई। इस शीर्षक के फ्लैग शीर्षक में तीन बुलेट प्वाइंट्स हैं 1) संभल, मणिपुर हिंसा पर चर्चा की मांग को लेकर लोकसभा, राज्यसभा में हंगामा, 2) राहुल गांधी न कहा सरकार अदाणी को बचा रही है और 3) भाजपा ने कहा कि कांग्रेस भारत विरोधी है। इस खबर के साथ एक और शीर्षक है, जेपीसी का कार्यकाल बढ़ाया जायेगा; वक्फ विधेयक इस सत्र में नहीं लाया जायेगा। महाराष्ट्र चुनाव के समय यह प्रचार किया जा रहा था कि संसद के शीतकालीन सत्र में पारित होगा वक्फ बिल। नवभारत टाइम्स की एक पुरानी खबर के अनुसार, सरकार कुछ वर्गों के विरोध के बावजूद संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में वक्फ संशोधन विधेयक पारित करने के लिए दृढ़ संकल्प है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मंगलवार को हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि वक्फ संशोधन विधेयक संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पारित हो जाएगा। इस विधेयक में केंद्र और राज्यों के वक्फ बोर्डों के गठन और कामकाज में व्यापक सुधार का प्रस्ताव है।
पुरानी खबरों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र में एक चुनावी भाषण के दौरान वक्फ एक्ट पर तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि यह कानून कांग्रेस ने अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर बनाया था। कहने की जरूरत नहीं है कि इन तथ्यों के आलोक में सरकार यह विधेयक पास नहीं करवा पाई क्योंकि अदाणी को बचाना है और उनके मामले में चर्चा नहीं होने देनी है। ऐसे में आज खबर यह भी थी। वैसे आज की सबसे बड़ी खबर तो यह थी कि सीबीआई ने एनडीटीवी को क्लीनचिट दे दी है और यह सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी के बावजूद है जिसे अमर उजाला ने लीड बनाया है। ठीक है कि एनडीटीवी राजनेता नहीं है पर एक मीडिया संस्थान, एक व्यवसाय तो है ही जहां कई लोग अपनी पसंद की नौकरी कर रहे थे। इमरजेंसी का विरोध करने वालों के अघोषित आपातकाल में एक विरोधी को सीबीआई के जरिये परेशान करने और उसका मुंह बंद कराने के तमाम सरकारी उपाय और दबाव नाकाम होने पर सरकार ने सीबीआई के जरिये ऐसी स्थितियां बना दीं कि सरकारी सेठ के लिए उसे खरीदना संभव हुआ। यह खबर भी कल की है और ईमानदार व निडर पत्रकारिता का तकाजा था कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के आलोक में इस खबर को पेश किया जाता। मैं अखबार में काम कर चुका हूं और जानता हूं कि जो भी लीड तय करता है वह उस दिन की दूसरी सारी खबरें जानता है। इसलिये इस तरह की चूक सामान्य नहीं है। अखबार की लीड उस दिन की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण खबर को बनाया जाता है। इसलिए सारी खबर जाने बिना यह तय ही नहीं हो सकता है और वैसे भी, दो परस्पर विरोधी या एक जैसी खबरों को एक साथ छापने का रिवाज है।
देश में 10 साल से ज्यादा समय से जो सब चल रहा है उसमें सुप्रीम कोर्ट का कहा बिल्कुल आसामान्य है और भले ही सिर्फ इसी के लिए इसे लीड बनाया जा सकता था पर यह इस समय की सरकार का प्रचार है और सरकार के प्रचार से बचने के लिए इस खबर से बचना चाहिये था। दूसरी ओर एनडीटीवी की खबर सोशल मीडिया पर उपलब्ध थी और मीडिया के लिए यह ऐसा मामला नहीं है कि इसे छिपाया जाये। वैसे भी, इससे संबंधित शीतल पी सिंह की फेसबुक पोस्ट के अंत में अंग्रेजी में लिखा है, “नाजी ऐसे ही काम करते हैं”। इसे पढ़कर मुझे एक मित्र से चर्चा याद आई जब हम इस बात पर सहमत हुए थे कि संघ परिवार के संगठन हिन्दू तालिबान की तरह काम कर रहे हैं और अगर भारत का संविधान खत्म हुआ, हिन्दू राष्ट्र घोषित हो गया तो क्या हो सकता है। हालांकि, वह अलग मामला है। अमर उजाला में आज यह खबर लीड है तो सिर्फ इसलिए कि आज लीड जैसी कोई दूसरी खबर नहीं है। सर्वसम्मत लीड हो तो अखबारों की पसंद का पता नहीं चलता है पर ऐसे मौके बता देते हैं कि अखबार अपने पाठकों की नहीं, सरकार की सेवा कर रहा है और खबरों के रूप में सरकारी विज्ञापन परोस रहा है और सरकार का यह हाल है कि कैबिनेट मंत्री रील बना रहे हैं। वह भी गलत और चिकित्सा मामले में विशेषज्ञ के रूप में पोस्ट किये गये वीडियो को जानकारों के दबाव में उन्हें हटाना पड़ा है।
ऐसे में आप समझ सकते हैं कि सरकार और उसे सबसे योग्य और सक्षम प्रचारित मंत्री कैसे, क्या काम कर रहे हैं। फिर भी देश का मीडिया है कि सच्चाई और निष्पक्षता को छोड़ कर प्रचार में लगा हुआ है। आज कई अखबारों ने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री एकनाथ शिन्दे के नए मुख्यमंत्री की दौड़ से अलग होने की घोषणा को प्रमुखता से लीड के रूप में छापा है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, फडणविस का रास्ता साफ। उपशीर्षक है, शिन्दे ने डाले हथियार (कहा) भाजपा का निर्णय होगा स्वीकार। मुख्यमंत्री बनने के लिए शिन्दे ने अपनी पार्टी तोड़ी, कुछ विधायकों से अलग हुए और फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने नारा दिया, बंटेंगे तो कटेंगे। प्रधानमंत्री ने एक हैं तो सेफ हैं कहकर इसकी पुष्टि की लेकिन एकनाथ शिन्दे के लिए देर हो चुकी थी और भाजपा की राजनति का ही कमाल है कि बहुमत तो वही दिलाता है जो सत्ता में रहता है फिर भी मुख्यमंत्री बनने के रास्ते से हटा दिया जाता है। असल में पार्टी और संगठन ने जब नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री के कार्यकाल से खुश होकर उन्हें प्रधानमंत्री के पद का उम्मीदवार बना दिया तो उन्हें यह भी देखना होता होगा कि किसी अन्य नेता का कद उनसे ज्यादा न हो जाये। इसी में अरविन्द केजरीवाल ने योगी आदित्यनाथ को हटाये जाने क घोषणा की थी पर अपनी योग्यता क्षमता से वे अपनी स्थिति बनाये रख पाये हैं। यही नहीं, पार्टी बाहरी नेताओं के मुकाबले अपने नेता के साथ मजबूती से खड़ी है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड के अनुसार, शिन्दे ने कहा कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री का फैसला अंतिम होगा और इस तरह फडणविस का महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री होना तय।
पश्चिम बंगाल के पूर्व शिक्षा मंत्री की जमानत से संबंधित जो खबर अमर उजाला में लीड है वह कोलकाता के अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर नहीं है। टेलीग्राफ में उत्तर प्रदेश की एक खबर पहले पन्ने पर है जो अमर उजाला में है तो लेकिन शीर्षक जरा अलग है। पहले, अमर उजाला का शीर्षक, संभल हिंसा में शामिल 100 उपद्रवियों के पोस्टर जारी, नुकसान की भी होगी वसूली। उपशीर्षक है, ड्रोन कैमरों वीडियो व सीसीटीवी फुटेज से बवाल करने वालों की हुई पहचान। द टेलीग्राफ में इस खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना करके नाम लिखकर लोगों को बदनाम करने की कार्रवाई उत्तर प्रदेश में फिर शुरू हुई। अब आप दोनों शीर्षक से खबर और सरकार का अंतर तो समझ ही सकते हैं पार्थ चटर्जी की खबर को तूल देने का कारण भी समझ सकते है। आश्चर्यजनक है कि इंडियन एक्सप्रेस को छोड़कर एनडीटीवी की खबर आज मेरे किसी भी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। हो सकता है अपने आपमें आपको वह खबर महत्वपूर्ण नहीं लगे लेकिन उसके पहले पन्ने पर होने से मुझे लगता कि संबंधित अखबार मान रहा है कि सरकार अब कमजोर हो रही है, लोग उसकी चालें समझ रहे हैं। पर अभी ऐसा हुआ नहीं है। शायद देर है। इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड फडणविस का रास्ता साफ होने की खबर ही है। दूसरी ओर उन्हें गलत ढंग से मुख्यमंत्री बनाये जाने से संबंधित मामलों और विवादों का समय पर फैसला नहीं हुआ यहां तक कि चुनाव लड़ने के लिए मूल पार्टी के चुनाव चिन्ह के उपयोग का भी अधिकार मिल गया या दिला दिया गया। स्थिति यह हुई कि भाजपा के साथ रहना उनकी मजबूरी हो गई और भाजपा जब मजबूत स्थिति में आई तो उनके पास भाजपा की शर्तें मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। आज इस बात को इस अंदाज में पेश किया गया है जैसे भाजपा बहुत ही लोकप्रिय पार्टी है और जो करना चाहती है कर ले जाती है और इसमें कोई आंतरिक विरोध नहीं होता है। अंग्रेजी अखबारों में आज यह खबर द हिन्दू में लीड है। दि एशियन एज में अगर अदाणी मामले में संसद में चर्चा नहीं कराये जाने पर संसद की कार्यवाली स्थगित कर दिये जाने की खबर है तो द हिन्दू में अदाणी का खंडन या प्रचार पांच कॉलम में छपा है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक भी आज आदाणी पर ही है और वह द हिन्दू की तरह अदाणी पर उदार नहीं है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, अदाणी की आंधी का हंगामा संसद के शीतकालीन सत्र में जारी।


