
संजय कुमार सिंह
भाजपा सांसद और प्रवक्ता संबित पात्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राहुल गांधी पर हमला बोला है। वैसे तो यह कोई नई बात नहीं है और पिछले 10 साल से भाजपा के कई नेताओं का यही काम रहा है। दूसरी ओर, राहुल गांधी अपना काम कर रहे हैं। ईवीएम पर लग रहे आरोपों पर यकीन किया जाये तो नरेन्द्र मोदी की सरकार चुनाव आयोग की मेहरबानी से सत्ता में है। वैसे भी एन चंद्रबाबू नायडू और नीतिश कुमार की बैसाखी को कौन नहीं जानता। ईवीएम के खिलाफ भाजपा के प्रचार, दावों, किताबों और मुकदमों को याद किया जाये तो उसके खिलाफ शिकायतों पर यकीन नहीं करने का कोई कारण नहीं है पर वह अलग मुद्दा है। तथ्य यह है कि राहुल गांधी की लोकप्रियता लगातार बढ़ी है और नरेन्द्र मोदी का सच सबको पता चल गया है। नौकरी और सांसदी के लिए समर्थन भी अलग मुद्दा है। आज के अखबारों की खबर यह है कि संबित पात्रा का इतना बड़ा आरोप पहले पन्ने पर नहीं छपा है। पर यह आरोप (या राजनीति) अकेले संबित पात्रा की नहीं है और भाजपा ने लोकसभा में भी यह आरोप लगाया है इसलिए अंग्रेजी के कुछ अखबारों में यह पहले पन्ने पर है लेकिन हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों – अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में यह आरोप (संसद में लगाया गया वह भी) पहले पन्ने पर नहीं है।
हो भी क्यों? इतना बड़ा मामला है तो सरकार राहुल गांधी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है। अगर खतरा देश पर है तो जॉर्ज सोरोस को भी क्यों छोड़ा जाना चाहिये? पर ऐसा कुछ नहीं हो रहा है तो समझना मुश्किल नहीं है कि आरोप हवा हवाई है या गैर कानूनी नहीं है। अगर ऐसा है और बहुत संभावना है कि ऐसा ही है तो भाजपा जो कर रह है वह संविधान के खिलाफ है वह विपक्ष के नेता पर झूठे आरोप लगाकर अपनी स्थिति मजबूत करने की नाजायज कोशिश कर रही है। नरेदन्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान भी ऐसे आरोप लगाये हैं और यह विपक्ष को कमजोर करने, उसके लिए संसद और सांसदों को मिले अधिकारों के दुरुपयोग का मामला है। आप जानते हैं कि लोकतंत्र में सरकार का विरोध करना विपक्ष का काम है। बचाव में सरकार झूठे आरोप नहीं लगा सकती है पर वह हो रहा है और मीडिया कितना अनैतिक बने, कब तक कितना और किन मामलों में अयोग्य और अक्षम सरकार का साथ दे। मुझे लगता है इसीलिए यह खबर आज वैसे नहीं छपी है जैसे छपनी चाहिये थी। कायदे से यह देश के विपक्ष के नेता पर देशद्रोही होने का आरोप है और अगर किसी को यकीन ही नहीं हो तो पहले पन्ने पर क्यों छापे। ईडी सीबीआई का डर दिखाकर संबित पात्रा के विरोधी को चुप तो कराया जा सकता है, लेकिन उसके कहे को मजबूती कैसे दी जा सकती है? हालांकि संसद में वही आरोप लगवाकर ऐसा करने की कोशिश की गई है पर अब सबको समझ में आने लगा है कि भाजपा के नेता खुद पर और सरकार पर हमले को भी देश पर हमला कहने लगते हैं।
आइये देखें संबित पात्रा ने क्या कहा है, ‘हम उस खतरनाक त्रिकोण के बारे में बात करने जा रहे हैं जो भारत को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है। इस त्रिकोण में एक तरफ अमेरिका के जॉर्ज सोरोस हैं, अमेरिका की कुछ एजेंसियां हैं। त्रिकोण के दूसरी तरफ ओसीसीआरपी नाम का एक बड़ा न्यूज पोर्टल है। इस त्रिकोण के आखिरी कोने में राहुल गांधी हैं।’ ओसीसीआरपी यानी ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट नाम से ही लगता है कि कभी भी भाजपा सरकार की पोल खोल सकता है जो झूठ बोल कर सत्ता में आई और नोटबंदी जैसी तबाही मचाने वाली कार्रवाई कर चुकी है। एनडीटीवी ही नहीं और भी संस्थाओं के खिलाफ मामले बनाकर खास उद्यमी को फायदा पहुंचाने का अपराध हुआ है। अपराध के तमाम नामुमिकन से मामले चलते रहे हैं और सरकार को खबर ही नहीं हुई। ऐसे में कब किसकी पोल खुल जाये, किसका सबूत आ जाये इसका डर सता रहा हो तो जरूरी है कि पहले उस संस्थान को बदनाम कर दो। इसमें दिलचस्प यह भी है कि भाजपा ने संबित पात्रा की प्रेस कांफ्रेंस को खास मुद्दे पोस्ट किये हैं। इनमें एक है, नेशनल हेराल्ड केस में जब ईडी मां-बेटे से पूछताछ कर रही थी तो ओसीसीआरपी ने एक आर्टिकल छापा, जिसमें लिखा गया कि राहुल गांधी के खिलाफ चल रही लीगल प्रोसीडिंग राजनीतिक रूप से प्रेरित है। मां-बेटे ने 5 हजार करोड़ रुपये का गबन किया और ओसीसीआरपी ने अमेरिका में बैठ के उन्हें क्लीन चिट दे दी।
मेरा मानना है कि नेशनल हेराल्ड का मुद्दा अगर राजनीतिक नहीं है, वाकई गबन हुआ है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? तथ्य यह है कि राजनीतिक भी है तो बेहद घटिया और नीच किस्म की राजनीति है पर वह अलग मुद्दा है। फिर भी, संबित ने कहा है और छपा भी है कि यह एक खतरनाक त्रिकोण बनाता है, जो भारत को अस्थिर करने की कोशिश करता है। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल गांधी उच्च दर्जे के गद्दार हैं। बीजेपी सांसद ने कहा, ‘मैं यह गद्दार शब्द कहने से नहीं डरता… मुझे लोकसभा में विपक्ष के नेता को देशद्रोही गद्दार कहने में कोई झिझक नहीं है।’ जो भी हो खबर यह है कि राहुल गांधी को बदनाम करने की भाजपाई कोशिशों का असर नहीं हो रहा है। इसलिए जोखिम उठाना पड़ रहा है। कांग्रेस को भ्रष्ट कहकर एक बार सत्ता में आने के बाद अब चुनाव में उसे हिन्दू विरोधी प्रचारित किया गया और भले इसका फायदा भी मिला हो पर यह फायदा ईवीएम का नहीं है यह अभी तय नहीं हुआ है। इसलिए हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर (संसद वाली) सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, भाजपा सांसद ने राहुल को सोरस से जोड़ा कहा विपक्ष के नेता देशद्रोही हैं। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर दो कॉलम में छपी है। फ्लैग शीर्षक है, ओसीसीआरपी ने फंडिंग की भूमिका से इनकार किया।
खबर के अनुसार वरिष्ठ भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि राहुल गांधी भारत की सफलता की कहानी को पटरी से उतारने की कोशिश कर रहे हैं। तथ्य यह है कि ‘सफलता की कहानी’ अखबारों में नहीं छपती है। प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस करके नहीं बताते हैं और चुनाव में वोट मांगने के लिए भी उसका उपयोग नहीं करते, खबरें नहीं छपतीं, खोजी और फॉलोअप खबरें तो भूल ही गये हैं। फिर भी राहुल गांधी पर आरोप है कि वे सफलता की कहानी को पटरी से उतार रहे हैं जबकि नोटबंदी के बाद अचानक जीएसटी लागू करने से उद्योग धंधे चौपट हुए, कई बड़े व्यावसाय देश छोड़कर भाग गये, उनसे ना वसूली हुई ना उनका कारोबार वापस बहाल हुआ, लाखों शेल कंपनियों को बंद कराने का दावा किया गया है और विदेशी चंदा लेने के नियम ऐसे कर दिये गये हैं कि जन सेवा करने वाले गैर सरकारी संस्थान व संगठन बंद हो चुके हैं। इससे सैकड़ों नौकरियां गई हैं और सरकार ने सीआरएस का पैसा पीएम केयर्स में ले लिया। ऐसे में विकास की कहानी अगर है भी तो सरकार खुद नहीं सुना रही है, पूर्व सेना प्रमुखों को नहीं सुनाने दे रही है और राहुल गांधी पर आरोप लगा रही है। जो स्थितियां हैं उनमें भारत के मामले विदेशी अखबारों और एजेंसियों ने ही खोले हैं चाहे वह अदाणी का ही मामला क्यों न हो। कुछ सौ करोड़ और उससे भी कम के लिए दो मुख्यमंत्रियों को जेल में रखा जा चुका है लेकिन 20,000 करोड़ के मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई और क्यों नहीं हुई यह सार्वजनिक हुआ तो भाजपा ने खुल कर सेबी प्रमुख का बचाव किया। अब जिस कार्रवाई की खबर है वह लीपापोती लगती है पर वह भी अलग मुद्दा है। ऐसे में ओसीसीआरपी कोई खबर करने वाली हो तो उसकी साख खराब करना भाजपा की मजबूरी हो सकती है। राहुल गांधी के पास तो विकल्प ही नहीं है। वे भारतीय मीडिया और प्रतिनिधियों को निष्पक्ष होने के लिए कई बार कह चुके हैं पर यहां कहानी तो एनडीटीवी की है जहां सेबी प्रमुख नौकरी कर रहे हैं और उन्हें पुराने मामले याद नहीं हैं।
कुल मिलाकर प्रचारकों की पार्टी प्रचार से ही चल रही है और आज यह खबर पहले पन्ने पर नहीं छपी तो ऐसा नहीं है कि स्थिति सुधर गई है। क्योंकि खबर तो व्हाट्सऐप्प से भी फैलाई जाती है और राहुल गांधी ऐसी राजनीति नहीं करते हैं। यह अलग बात है कि इसीलिए लोग राहुल गांधी और उनकी टीम की आलोचना करते हैं। पर राहुल गांधी और उनकी टीम ने अपना स्तर बनाये रखा है। यह इसलिए संभव है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने की जल्दी नहीं है और यह सरकार जितने समय सत्ता में है अपना असली रंग ही दिखा रही है जो भविष्य में कांग्रेस और राहुल गांधी के काम आयेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया में संसद में हंगामे की खबर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, “सोरोस कांग्रेस संबंध के आरोप पर भाजपा विपक्ष की भिड़ंत से संसद में हंगामा”। राहुल गांधी पर आरोप की भाजपाई खबर आज दि एशियन एज में लीड के बराबर दो कॉलम में है। इसके साथ की एक खबर में बताया गया है कि अदाणी मामले में संसद में विपक्ष का आंदोलन जारी। द टेलीग्राफ में आज ये खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं।
मुझे लगता है कि भाजपा की 10 साल की राजनीति का खुलासा अगर सोरोस की ओसीसीआरपी करे तो उसका सहयोग करने में कुछ गलत है। सरकार और प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी है कि वे देश में ऐसा शासन चलायें कि मडिया स्वतंत्र रूप से काम कर सके। जब तक कोई विरोध नहीं करे हम उसे स्वतंत्र मान सकते हैं। लकिन ऐसा नहीं है कि विरोध हो ही नहीं रहा है और सब ठीक चल रहा है कि सरकार उसके खिलाफ जो कर सकेगी करेगी और कर रही है पर कानूनन इसमें कुछ गलत नहीं है। यह बताना और प्रचारित करना किसी भी तरह से गैर कानूनी नहीं है कि नरेन्द्र मोदी अपने सबसे बड़े शस्त्र या हथियार के बारे में कुछ नहीं जानते थे। पी चिदंबरम ने कहा भी था कि अर्थशास्त्र का उनका ज्ञान डाक टिकट के पीछे लिखने बराबर है। इसलिए उन्हें उसके असर का अंदाजा भी नहीं था। नोटबंदी का श्रेय लेने और 50 दिन में सपनों का भारत बनाने वाले ने 10 साल में भारत का यही हाल किया है कि 80 करोड़ लोग मुफ्त के राशन पर निर्भर हैं। इसके बावजूद लोग नरेन्द्र मोदी के प्रशंसक हैं तो इसीलिए कि मीडिया ने लोगों को सच नहीं बताया है और इसे आम जन तक पहुंचाने के लिए जोॉर्ज सोरस या उनकी ओसीसीआरपी से गठजोड़ देशद्रोह नहीं, देश बेचने वाले से देश को बचाने की कोशिश है। मेरी पहुंच वहां तक नहीं है लेकिन मैं उस दिन का इंतजार कर रहा हूं जब मेरे यही अखबार ऐसा लिखने लगेंगे।
आईआईटी के शिक्षकों और डायरेक्टर में भिड़ंत
देश में काम करना ना सिर्फ विपक्ष के लिए मुश्किल हुआ है बल्कि इंडियन एक्सप्रेस में आज खबर है कि आईआटी खड़गपुर में भी माहौल ठीक नहीं है और डायरेक्टर से विवाद बढ़ने पर करीब 100 फैकल्टी ने विरोध किया है। इसकी शुरुआत सितंबर में हुई थी जब शिक्षकों के एसोसिएशन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को पत्र लिखकर संस्था पर मनमानी नियुक्तियां करने का आरोप लगाया था। जवाब में संस्थान ने एसोसिएशन के पदाधिकारियों के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई शुरू कर दी। अब संस्थान के 86 सदस्यों ने लिखा है कि चार पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई बंद नहीं हुई तो वे सामूहिक अनशन करेंगे।
विधेयकों के नाम हिन्दी में होने पर विवाद
जहां तक सरकार या भारत की सफलता की कहानी की बात है, आज अकले द हिन्दू की लीड बताती है कि विधेयकों के हिन्दी नामों को लेकर संसद में हंगामा हुआ। खबर के अनुसार, केंद्र ने हिन्दी और संस्कृत के इन नामों का बचाव यह कहकर किया है कि इससे देश की संस्कृति और विरासत का पता चलता है। आपको याद होगा कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (केएमएफ) के दूध ‘नंदिनी’ को लेकर भी विवाद हुआ था। तब आरोप था कि भाजपा राज्य में स्थानीय नंदिनी डेयरी उत्पादों के बजाय गुजराती ब्रांड अमूल को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। लोगों का कहना था कि अमूल डेयरी के आने से स्थानीय ब्रांड और किसान तबाह हो जाएंगे। अमूल पर कर्नाटक में हंगामा हुआ। विपक्षी नेताओं ने भाजपा पर निशाना साधा। जनता से अपील की थी कि अमूल के खिलाफ आगे आएं और किसानों के साथ खड़े हों। हाल में खबर थी कि वह नंदिनी अब दिल्ली के बाजार में उपलब्ध है। तरल दूध और दही की रेंज लॉन्च करने का यह महत्वपूर्ण विस्तार 21 नवंबर 2024 को कर्नाटक के माननीय मुख्यमंत्री श्री सिद्धारमैया, माननीय उप मंत्री श्री डीके शिवकुमार के साथ कई अन्य की उपस्थिति में हुआ।


