
अभिषेक श्रीवास्तव-
पुरस्कार चाहे जिसे भी मिले, लेकिन 2015 में एमएम कलबुर्गी की हत्या के पश्चात पुरस्कार वापसी के सामूहिक प्रतिरोध से सवाल के कठघरे में तो साहित्य अकादमी नामक संस्था खड़ी हुई थी न? फिर ऐसा कैसे हो गया कि साहित्य अकादमी पुरस्कार का मिलना बीते नौ साल में एक अकर्मक क्रिया बन गया जबकि चर्चा के केंद्र में पुरस्कृत लेखक आ गया?
गगन गिल हों, चित्रा मुद्गल, अनामिका या संजीव जी, इन सबको बीते वर्षों अकादमी पुरस्कार की बधाई हिन्दी साहित्य के दायरे में खूब मिली। इसके उलट, बद्रीनारायण को ज्यादातर लानत भेजी गई। दोनों में समानता बस इतनी सी है कि अकादमी पुरस्कार पार्श्व में चला गया, लेखक केंद्र में आ गया- अपना है तो ठीक, दूसरे का है तो गड़बड़!
अनामिका जी के समय उनके ऊपर उठे सवाल को जेन्डर से घेर दिया गया। संजीव जी को जब पुरस्कार मिला, तो उनके बचाव में दिए गए तर्क उन्हीं को दया का पात्र बनाते हुए देखे गए- कि बेचारे बहुत कष्ट झेले हैं, इत्यादि। बद्री जी का मजाक बनाया गया, दया प्रकाश सिन्हा की कुंडली खोजी गई लेकिन नंदकिशोर आचार्य और चित्रा जी पर बधाई के साथ एक सम्मानजनक चुप्पी बरती गई।
अजीब किस्म का व्यक्ति-केंद्रित पाखंड नहीं दिखता इस सब में? बेशर्मी के प्रति कुछ ज्यादा ही सहिष्णुता नहीं हो गई, कि अभी दसवां साल लगा ही है फासिस्टों द्वारा अकादमी पुरस्कृत लेखक कलबुर्गी की हत्या को और उसे सुविधाजनक ढंग से चौतरफा बिसराया जा चुका है? नैतिकता का एक भी खूंटा नहीं बचा हिन्दी के लेखक के पास थामे रहने के लिए?
हैमलेट के बाप की हत्या राजा क्लाडियस ने की थी। जब बाप का भूत उसके सामने आया और उसे यह पता चला, तो उसने कहा था: The time is out of joint. हैमलेट को अपनी जिम्मेदारी का एहसास हुआ। हत्या तो यहाँ भी हुई थी। एक ही समय में, एक नहीं, चार-चार। गोविंद पानसारे, कलबुर्गी, गौरी लंकेश और नरेंद्र दाभोलकर। क्या मारे गए इन लेखकों के प्रेत जीवित लेखकों के सपने में आते होंगे? उन्हें कभी भी लगता होगा कि काल की उखड़ी हुई चूल को दुरुस्त करना उनकी भी नैतिक जिम्मेदारी है?
या, वाकई सब झूठ था 2015 में? बस एक उच्छवास? भड़ास? या टाइमपास?


