शिवेंद्र कुमार सिंह-
1995-96 में उनकी खबरों को इलाहाबाद हेड पोस्ट ऑफिस से फैक्स करने से पत्रकारिता सीखने और उनके साथ रिश्तों की जो शुरुआत हुई वो अब तक जारी है।
अमर उजाला (इलाहाबाद) में उनकी बाइक से जाकर चाट खाने से लेकर कॉफी हाउस पर कॉफी पिलाने तक का उनका स्नेह वैसे का वैसे बना हुआ है। जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएँ प्रताप सोमवंशी भाई साहब।
एक बार अमर उजाला में तीन चार ऐसी बीट पर काम करने को कहा गया जो उससे पहले बीट नहीं होती थी। संपादक जी किसी बात से नाराज़ थे। मतलब पनिशमेंट पोस्टिंग जैसा मामला था।
मैंने प्रताप भाई से कहा- मैं इस्तीफा दे देता हूँ।
बोले- इसको ऐसे भी तो समझो कि इस बीट पर काम कभी हुआ ही नहीं तो तुम जो भी लिखोगे वो एक्सक्लूसिव होगा। मैंने अखबार के करियर में उतनी ऑल एडिशन बाय लाइन खबर कभी नहीं लिखी।





प्रताप भाई जब दिल्ली आए तो एक सज्जन ने जासूसी के अंदाज में पूछा कि आप प्रताप जी को जानते हैं। मैंने कहा हाँ वो मेरे बड़े भाई हैं। उन सज्जन का अगला सवाल था कि सगे भाई? मैंने भी एक सेकेंड रुककर कहा..
नहीं सगे नहीं रिश्तेदारी में भाई लगते हैं। कुछ रोज़ बाद वही सज्जन आए। काफ़ी ख़फ़ा थे। बोले आपको कम से कम सच बोलना चाहिए। मैं समझ नहीं पाया कि मामला क्या है…. फिर बात समझ आई तो मुझे हंसी आई।
दरअसल, अपने जासूसी मिज़ाज के तहत उन्होंने प्रताप भाई से भी पूछ लिया कि आप शिवेंद्र को जानते हैं। उनका जवाब था – हाँ, मेरा सगा छोटा भाई है।
आप यूँ ही शानदार ग़ज़लें कहते रहें – हमें गिलास आधा खाली है कि थ्योरी से बचाकर गिलास आधा भरा है कि नज़र दिखाते रहें। फिर से बहुत बहुत बधाई भाई साहब।
अरुण आदित्य-
उम्मीदों के पंछी के पर निकलेंगे
मेरे बच्चे मुझ से बेहतर निकलेंगे।
मंथन (जिन्होंने इस शेर को हकीकत में बदल दिया) के पापा
दोस्तों के दोस्त
जाने-माने संपादक
और मक़बूल शायर
प्रताप सोमवंशी को जन्मदिन पर अनंत शुभकामनाएं।

इस मुबारक मौके पर पढ़िए वह ग़ज़ल जो उनकी शायरी की सिगनेचर ट्यून की तरह सुनी जाती है।
कैसे कह देता कोई किरदार छोटा पड़ गया
जब कहानी में लिखा अख़बार छोटा पड़ गया
सादगी का नूर चेहरे से टपकता है हुज़ूर
मैं ने देखा जौहरी बाज़ार छोटा पड़ गया
मुस्कुराहट ले के आया था वो सब के वास्ते
इतनी ख़ुशियाँ आ गईं घर-बार छोटा पड़ गया
दर्जनों क़िस्से-कहानी ख़ुद ही चल कर आ गए
उस से जब भी मैं मिला इतवार छोटा पड़ गया
इक भरोसा ही मिरा मुझ से सदा लड़ता रहा
हाँ ये सच है उस से मैं हर बार छोटा पड़ गया
उस ने तो एहसास के बदले में सब कुछ दे दिया
फ़ाएदे नुक़सान का व्यापार छोटा पड़ गया
घर में कमरे बढ़ गए लेकिन जगह सब खो गई
बिल्डिंगें ऊँची हुई और प्यार छोटा पड़ गया
मेरे सिर पर हाथ रख कर मुश्किलें सब ले गया
इक दुआ के सामने हर वार छोटा पड़ गया
चाहतों की उँगलियों ने उस का कांधा छू लिया
सोने चाँदी मोतियों का हार छोटा पड़ गया।
- प्रताप सोमवंशी


