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आज के अखबार नहीं बताते कि कांग्रेस शीतकालीन सत्र में कोई मांग पूरी नहीं करवा पाई भले इससे एकजुट हुई   

संजय कुमार सिंह

भारत की राजनीति झोला उठाकर चल दूंगा से किसी भी हालत में कुर्सी नहीं छोड़ूंगा जैसी स्थिति में पहुंच गई है। यही उसका क्रमिक विकास है। हम सब देख ही रहे हैं। आज की सबसे बड़ी खबर है संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त हुआ। इसके साथ तथ्य यह है कि देश के सबसे बड़े उद्यमियों में से एक के खिलाफ अमेरिका में मामला सामने आने की चर्चा ही नहीं हुई। मांग के बावजूद नहीं हुई क्योंकि सरकार नहीं चाहती थी। इस तरह सरकार अपनी जिद्द पर कायम रही और जो नहीं चाहती थी उसे नहीं होने दिया। यह उसकी उपलब्धि है। अखबारों में इसकी चर्चा तो नहीं ही है इसके लिए सरकार और भाजपा की प्रशंसा भी नहीं है। समझना मुश्किल नहीं है कि क्यों। संसद में संविधान पर चर्चा हुई पर कैसी हुई सबने देखा – किसी ने नहीं लिखा है कि अच्छी हुई, बुरी हुई या सार्थक रही। अंबेडकर के बारे में गृहमंत्री ने जो कहा उसे लेकर विवाद रहा। विपक्ष ने गृहमंत्री से माफी मांगने और उन्हें बर्खास्त करने की मांग की। सरकार ने इसे भी नहीं सुना पर अखबारों ने इसके लिए भी सरकार की ना प्रशंसा की ना आलोचना की। यही नहीं, अंबेडकर के अपमान के मामले में गृह मंत्री ने कह दिया, पीआईबी के फैक्ट चेक से समर्थन करवाया गया कि कांग्रेस ने भी अंबेडकर का अपमान किया था। यह भाजपा की राजनीति औऱ रणनीति हो सकती है, मौके पर चौका हो सकता है या फंस जाने पर बचने का फूहड़ तरीका हो सकता है। इसकी भी ना प्रशंसा है ना आलोचना है। सबसे दिलचस्प यह कि सरकार ने विपक्ष से अपने संबंध बिल्कुल खराब कर लिये हैं, विपक्ष के नेता पर एफआईआर, झंडे के डंडे के साथ दरवाजा घेरकर खड़े रहने और फिर धक्का देकर गिरा दिये जाने का आरोप और इस कारण राजनीति के गिरते, गिर चुके या बेहतर हुए स्तर की चर्चा भी नहीं है। सिर्फ द टेलीग्राफ में इसकी चर्चा है और वहां यह खबर लीड नहीं है।

संसद मशीन या कारखाना नहीं है कि उसकी उत्पादकता की चर्चा की जाये। संसद लोकतांत्रिक चर्चा कर बेहतर निर्णय के लिए है और जरूरी नहीं है कि हर चर्चा सफल रहे, हर विधेयक पास ही हो जाये या उत्पादकता बढ़ाने के लिये अदाणी के मुद्दे पर चर्चा नहीं हो। पर अखबरों ने मूल बातों का तो जिक्र भर किया है लेकिन उत्पादकता का प्रतिशत जरूर बताया है। नरेन्द्र मोदी ने 10 साल कमजोर विपक्ष के साथ तो गुजार लिया पर विपक्ष के मजबूत होते ही उनकी परेशानी दिखने लगी है। पर अखबारों को नहीं दिख रही है सो महत्वपूर्ण है। अमर उजाला ने संसद का शीतकालीन सत्र शीर्षक खबर को एक कॉलम में निपटा दिया है। लेकिन यहां उत्पादन का विवरण पूरा है जैसे 20 बैठकें हुईं, 105 घंटे कार्यवाही चली। इस दौरान लोकसभा की उत्पादकता 57.87 फीसदी रही जबकि राज्यसभा की उत्पादकता 41 फीसदी रही। ठीक है कि यह भी खबर है या खबर का हिस्सा है। लेकिन मेरी दिलचस्पी यह जानने में थी कि अदाणी पर चर्चा क्यों नहीं हुई, आगे क्या हो सकता है या फिर नये से उठाना होगा। सरकार ने कोई अधिकृत कारण बताया या यूं ही बहुमत का उपयोग कर लिया। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे पाठकों को सरकार की कार्यशैली, राजनीति और रुख का पता चलता है पर अब यह सब खत्म नहीं है।

दिलचस्प यह है कि अदाणी का मुद्दा उठा, शुरुआत विपक्षी सांसदों के प्रदर्शन से हुई – यह तो बताया गया है लेकिन यह नहीं कि चर्चा क्यों नहीं हुई। अगर चर्चा की मांग थी और नहीं हुई तो यह बताना बहुत सामान्य है कि क्यों नहीं हुई। इसमें यह भी लिखा जा सकता था कि सरकार नहीं चाहती थी पर इतना भी बचाने की जरूरत नहीं है। नवोदय टाइम्स में प्रधानमंत्री की फोटो के साथ बैठकों की संख्या और उत्पादकता बचाई गई है। इससे अनुपस्थित रहने के आरोपों की धुलाई हो गई। मुख्य शीर्षक, हंगामे में खत्म हुआ संसद सत्र – पुराना है। कल सबने यह खबर सुन ली है। आज नया नहीं हो तो कम से कम पुरानी खबर से बचना चाहिये था। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, ठंडा, कड़वा अंत। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस खबर को पहले से पहले के अधपन्ने पर छापा है। शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन विरोध बनाम विरोध। खबर में यह भी उल्लेख है कि स्वतंत्र भारत में उपराष्ट्रपति को हटाने की पहली कोशिश हुई पर क्यों हुई, कौन दोषी है, भविष्य में ऐसा न हो उसके लिए क्या करना चाहिये जैसी बातें खबरों में नहीं के बराबर हैं।

संसद और संसद में चर्चा का मकसद यही होता है कि लोग उसे जानें। अंबेडकर के बारे में अमित शाह ने जो कहा उसपर अगर किसी को एतराज है तो वह खबर है और सरकार माफी नहीं मांग रही है तो वह भी खबर है। बदले में सरकार कांग्रेस पर अंबेडकर का अपमान करने का आरोप लगा रही है तो वह भी खबर है लेकिन जो हो रहा है उसे ठीक-ठीक बताया क्यों नहीं जाये। यह दिलचस्प है कि सत्तारूढ़ दल के एक बड़े मंत्री ने जो कहा उसपर विपक्ष को एतराज है और सरकार उसे मान नहीं रही है। इसे बताने में क्या दिक्कत होनी चाहिये और सत्तारूढ़ पार्टी की ऐसी सेवा की जरूरत भी क्यों होनी चाहिये कि पूरा मामला ब्लैक आउट कर दिया जाये। कहने की जरूरत नहीं है कि सांसदों के रास्ते को डंडे वाले झंडे बैनर के साथ घेरकर सत्तारूढ़ दल के सदस्य पहली बार खड़े थे। इसमें अगर कुछ लोग गिर गये और यह खबर है तो यह क्यों नहीं बताया जा रहा है कि रास्ता बंद किया गया था। बंद करने वाले सत्तारूढ़ दल के लोग थे और धक्का मुक्की में अगर कोई गिर गया, चोट लग गई तो यह कोई भी हो सकता था। ठीक है कि सत्तारूढ़ दल के आरोपो को गंभीरता दी जा सकती है पर सच भी बताया जाना चाहिये। वह नहीं के बराबर है और तब जब वीडियो उसी समय से सार्वजनिक हैं और कोई भी, कभी देख सकता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक देश एक चुनाव के लिए 39 सांसदों की जेपीसी बनाये जाने की खबर को लीड बनाया है और अराजक शीतकालीन सत्र की उत्पादकता बताई है। यह नहीं कहा है कि संसद जैसे चली उसमें अदाणी पर चर्चा नहीं हुई जबकि होनी चाहिये थी या नहीं होनी चाहिये थी। कांग्रेस ने विरोध किया तो भाजपा वाले कांग्रेस का विरोध करने लगे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने दोनों को छाप दिया पर यह चिन्ता नहीं की कि सांसदों के समूह का व्यवहार गुण्डा पार्टी से बेहतर रहना चाहिये और मांग नहीं माननी है तो उसका कारण बताना चाहिये उसके पक्ष में माहौल बनाना चाहिये। पर संसद जैसे चली उसी का नतीजा यह रहा कि पहली बार उपराष्ट्रपति को हटाने की मांग की गई लेकिन यह सब सूचना देने और पूरे सत्र का सारांश बताने की बजाय विवादस्पद मुद्दों पर चर्चा करने से बचने की कोशिश की गई है। और उत्पादकता के सरकारी रिकार्ड को बिलावजह महत्व दिया गया है।

द हिन्दू का शीर्षक भी ऐसा ही है। हंगामी सत्र खराब आउटपुट से समाप्त हुआ। इसकी जगह यह भी लिखा जा सकता था कि हंगामी सत्र में विपक्ष को मुंह की कानी पड़ी उसकी कोई मांग पूरी नहीं हुई। यह तो विपक्ष के खिलाफ था लेकिन सबको पता है कि ऐसा शीर्षक विपक्ष के खिलाफ होते हुए भी उसके पक्ष में माहौल बनायेगा और सरकार की छवि खराब होगी। इसलिए इस स्तर पर उतरकर मीडिया सरकार की सेवा कर रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने तो एक ही फोटो लगाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने सत्तरूढ़ दल के प्रदर्शन की भी फोटो लगाई है जिसके बैनर पर लिखा है, संसद का अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान। कहने की जरूरत नहीं है कि संसद में विपक्ष के उठाये और जरूरी मुद्दे पर अच्छी चर्चा नहीं करवाकर संसद का अपमान सत्तारूढ़ दल कर रहा है। अगर विपक्ष के लोग कह रहे हैं कि उपराष्ट्रपति का व्यवहार निष्पक्ष नहीं है तो संसद का अपमान कौन कर रहा है। अगर लग रहा है कि विपक्षी सांसद कर रहे हैं नारे लगाने, जुलूस निकालने की क्या जरूरत है। कार्रवाई कीजिये, सदस्यता से निलंबित कर दीजिये। अगर नहीं कर सकते हैं को सुनिये, बर्दाश्त कीजिये। पर गजब चल रहा है। और दिलचस्प यह कि इसकी रिपोर्टिंग भी नहीं हो रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा ही चलता रहा तो ढंग के लोग राजनीति में नहीं आयेंगे और यह देशहित के खिलाफ है। भाजपा चाहे राहुल गांधी पर आरोप लगाती रहे। और मीडिया उसे हवा देता रहे।

दि एशियन एज का शीर्षक है, हंगामी शीतकालीन सत्र एनडीए और इंडिया ब्लॉक के आंदोलनों के बीच समाप्त हुआ। कहने की जरूरत नहीं है कि सत्तारूढ़ गठबंधन का काम नहीं है कि वह संसद परिसर में आंदोलन करे। विपक्ष तो सरकार से मांग पूरी करने के लिए आंदोलन करता है सत्तारूढ़ दल के साथ ऐसा कुछ है ही नहीं कि उसे आंदोलन करने की जरूरत पड़े, कार्रवाई उसी को करनी है और उसी का बहुमत है। फिर भी सत्तारूढ़ दल ने यह दुलर्भ कार्रवाई की। अखबारों ने इसे रिपोर्ट किया वह तो सही है लेकिन यह नहीं लिखा कि ऐसा विरोध पहले नहीं हुआ था या आम नहीं है। अमर उजाला और हिन्दुस्तान ने जयपुर के पास सड़क हादसे में आट लगने से 12 लोगों की मौत और 28 लोगों के घायल होने खबर को लीड बनाया है। दुर्घटना एलपीजी टैंकर की टक्कर होने से हुई। नवोदय टाइम्स के अनुसार 29 ट्रक, 5 कार, 3 बाइक 2 बस और एक ऑटो जल गये हैं। समझा जा सकता है कि एलपीजी ले जा रहे ट्रक में सुरक्षा व्यवस्था पूरी नहीं थी इसलिए हादसा इतना बड़ा है। जो भी हो, संसद सत्र खत्म होने की खबर के कारण दुर्घटना की इस खबर को  कम महत्व मिला और संसद की खबर तो जो है सो है ही। इसीलिए इसे हेडलाइन मैनेजमेंट कहा जाता है।

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