
संजय कुमार सिंह
दिल्ली के दो बड़े अखबारों – हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया ने आम आदमी पार्टी की चुनावी योजनाओं से भाजपा की परेशानी की खबर को लीड बनाया है। दिलचस्प यह है कि इस विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी को कमजोर करने की भाजपाई कोशिशों में दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना भी लगे हुए नजर आ रहे हैं। उनकी पहले की चालों को छोड़ भी दें तो आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड के साथ एक खबर का शीर्षक है, “एलजी ने अतिशी को लिखा, ‘अस्थायी मुख्यमंत्री’ कहे जाने से दुखी; ‘तुच्छ राजनीति’ : उन्होंने जवाब दिया”। द हिन्दू में मुख्य खबर लीड तो नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर चार कॉलम में है। उपराज्यपाल की खबर भी शहर के खबरों के पन्ने पर है और मुझे लगता है कि जिस स्तर की बात है वैसी ही प्रस्तुति है। यहां दो कॉलम की खबर का शीर्षक तीन लाइन में है, एलजी ने अतिशी को लिखा, केजरीवाल का आपको अस्थायी मुख्यमंत्री कहना राष्ट्रपति का अपमान है। जाहिर है, अतिशी ने जवाब में जो कहा है वह तीन लाइन के शीर्षक में भी नहीं आ पाया है। दि एशियन एज में आम आदमी पार्टी की घोषणा भाजपा के जवाब के बिना है और एलजी साब की खबर शहर के खबरों वाले पन्ने पर होने की सूचना पहले पन्ने पर है। अमर उजाला में दोनों खबरें पहले पन्ने पर हैं। मूल खबर का शीर्षक है, केजरीवाल का अब पुजारियों-ग्रथियों को 18,000 रुपये प्रतिमाह देने का वादा। इसके साथ की खबर का शीर्षक है, योजना सिर्फ एक राजनीतिक स्टंट।
अमर उजाला में छोटी सी खबर पर छोटी सी प्रतिक्रिया है लेकिन उसका पहले पन्ने पर होना महत्वपूर्ण है। और गनीमत है कि सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं है वरना कुछ समय पहले तक यह भी संभव था। जहां तक अतिशी को अस्थायी मुख्यमंत्री कहे जाने से उपराज्यपाल को परेशानी की बात है, अमर उजाला में यही शीर्षक है और अतिशी का जवाब शीर्षक में तो नहीं ही है, पहले पन्ने की खबर में भी नहीं है। अमर उजाला ने अतिशी का जो कहा छापा है वह इस प्रकार है, ….महिला सम्मान योजना पर आपके फैसले से आहत हूं। मुझे लगता है कि राष्ट्रपति को भी होना चाहिये लेकिन वह खबर नहीं है। क्योंकि भाजपा की राजनीति का हिस्सा नहीं है। यहीं बता दूं कि यह भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष वीरेन्द्र सचदेव ने कहा है कि पुजारियों-ग्रथियों को 18,000 रुपये प्रतिमाह देने का केजरीवाल का वादा उनके अनुसार योजना, सिर्फ एक राजनीतिक स्टंट है। इसमें ‘ज्ञान’ की यह बात भी बताई गई है कि वह सत्ता में बने रहने के लिए लोकलुभावन घोषणा कर रहे हैं। पत्रकारिता यह होती कि कोई वीरेन्द्र सचदेव से पूछता कि भाजपा या प्रधानमंत्री ऐसी घोषणा करते हैं और उसमें बिहार का मशहूर एक लाख 25 हजार करोड़ रुपये का पैकेज ही नहीं, उसकी घोषणा का अंदाज भी बहुत लोकलुभावन था। उस पैकेज का क्या हुआ उन्हें पता है कि नहीं या वे सिर्फ दिल्ली की राजनीति देखते हैं। जो भी हो, मेरा मन उनका जवाब जानने का है। और पहले हमलोग (पाठक भी) ऐसे सवाल संबंधित रिपोर्टर या संपादक को लिखकर भेज देते थे। मित्र हुआ तो मिलकर कहते थे या फोन करके सुनाते थे कि यह क्या चल रहा है। अब जवाब मालूम है, नौकरी कर रहा हूं यार। पर पाठकों को क्या हो गया है वे जानें। दूसरी ‘खबर’ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, देवेन्द्र यादव की है। उन्होंने कहा है, यह योजना धार्मिक सहानुभूति हासिल कर वोट बटोरने का प्रयास है।
कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा जब 10 साल से ज्यादा समय से देश में यही कर रही है और उसे लोगों का समर्थन भी है और वह बार-बार चुनाव जीत रही है तो दूसरा ऐसा क्यों नहीं करे और जब नरेन्द्र मोदी खुद सत्ता नहीं छोड़ रहे हैं तो उनकी पार्टी के नेता क्यों चाहते हैं कि अरविन्द केजरीवाल को कोशिश भी नहीं करनी चाहिये। जहां तक उपराज्यपाल की चिट्ठी की बात है, इस पद पर रहकर इससे घटिया राजनीति हो नहीं सकती लेकिन भाजपा के राज्यपाल से मैं जरूर कुछ नए की उम्मीद करूंगा। वे राष्ट्रपति के अपमान से चिन्तित हों तो उन्हें क्या-क्या बताऊं। इसलिए फिलहाल रहने देता हूं। बस इतना कहूंगा कि दिल्ली का उपराज्यपाल शहर की खबरों के पन्ने पर छपे तो उसका भी अपमान है और अतिशी की यह कहना कि (आप) तुच्छ राजनीति कर रहे हैं, आपका भी अपमान है और आपने ही उन्हें खुद को अपमानित करने के लिए मजबूर किया है। वरना ऐसा नहीं है कि आप पार्टी प्रमुखों और मुख्यमंत्रियों के संबंध नहीं जानते हों। जहां तक अपमान की बात है, भोर में उठाकर शपथ दिलाने और फिर इस्तीफा हो जाने और फिर रोज नये पंगों से परेशान एक राज्यपाल इस्तीफा दे चुके हैं। उसपर किसी लाट साब ने कुछ कहा हो, ऐसी खबर नहीं है।
पाठकों की जानकारी के लिए बता दूं कि नवोदय टाइम्स ने इस खबर को और प्यार से या विस्तार से छापा है। फ्लैग शीर्षक है, पुजारी-ग्रंथी सम्मान योजना पर आप-भाजपा में ठनी। दो कॉलम की मुख्य खबर के साथ अरविन्द केजरीवाल और अतिशी की फोटो है और मुख्य शीर्षक है, “आप के जीतने पर पुजारियों, ग्रंथियों को प्रतिमाह मिलेंगे 18 हजार : केजरीवाल”। इसके साथ की खबर का शीर्षक है, “भाजपा के दबाव में केजरीवाल ने की योजना की घोषणा : सचदेवा”। उपशीर्षक है, भाजपा दो वर्षों से इस मु्द्दे पर प्रदर्शन कर रही है। इस खबर के अनुसार अगर वीरेन्द्र सचदेव की बात मान ली जाये तो केजरीवाल की घोषणा में न कुछ गलत है और ना विरोध करने लायक। अगर वे दो साल से मांग कर रहे हैं तो सबको पता होगा और बताने की जरूरत ही नहीं है और जाहिर है कि केजरीवाल सत्ता में आयेंगे तभी लागू करेंगे और आपकी मांग पूरी करेंगे। सत्ता में नहीं आये, भाजपा आ गई तो सचदेव पूरी कर सकते हैं। पर सचदेव के लिए इसे बताना शायद इसलिए जरूरी होगा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के मामले में उनकी पार्टी ने वैसे ही यू टर्न लिया है जैसे ईवीएम के मामले में। मुझे लगता है कि भाजपा की मजबूरी स्पष्ट है। महत्वपूर्ण यह है कि अखबारों को भाजपा की ऐसी सेवा क्यों करनी पड़ रही है। अगर यह पैसे के दबाव में है या ईडी-सीबीआई के डर से तो गलत है। वैसे भी अखबारों को किसी पार्टी का प्रचारक नहीं होना चहिये।
जहां तक भाजपा की बात है, वह सरकारी मुफ्त योजनाओं का विरोध करती है। नरेन्द्र मोदी रेवड़ी कह चुके हैं। इसलिए सरकार की ओर से आम लोगों के मुफ्त इलाज की व्यवस्था नहीं है। 70 साल कुछ नहीं हुआ तब भी नहीं। बीमा की दिक्कतें और उसमें बेईमानी जगजाहिर है फिर भी सरकार ने शिक्षा और इलाज जैसी बुनियादी सुविधा की व्यवस्था नहीं की। आम आदमी पार्टी को परेशान किया है और मेडिक्लेम बीमा पर 18 प्रतिशत जीएसटी जरूरत मंद जनता को लूटने की तरह है फिर भी उसमें कमी नहीं हो पा रही है। मंदिर बनाने आई सरकार ने नोटबंदी और जीएसटी से आर्थिक स्थिति इतनी खराब कर दी है कि आधी से ज्यादा आबादी मुफ्त राशन पर निर्भर है और यह रेवड़ी नहीं है। जब सरकार को राशन ही मुफ्त देना पड़ रहा है तो वह इलाज और शिक्षा की व्यवस्था कहां कर पायेगी फिर भी प्रचारित किया गया है कि यही सरकार योग्य और सक्षम है, विश्व गुरू है और अर्थव्यवस्था को तीन ट्रिलियन का कर रही है। विकास हो रहा है, अच्छा काम कर रही है। ऐसे में यह ‘खुशखबरी’ है कि मुफ्त राशन 2028 तक मिलता रहेगा और तब तक देश की आधी से ज्यादा आबादी अपने लिये राशन भी नहीं कमा पायेगी। जो भी हो, मजबूत सरकार ने ऐसे काम किये हैं कि अब वह खुद फंस गई है। दूसरी ओर, दूसरे दलों के लिए चुनाव जीतना आसान हो गया है। ऐसे में दिल्ली में भाजपा की मुश्किलें और परेशानी सबको मालूम हैं। अखबारों का सहयोग ईडी-सीबीआई का डर नहीं हो तो हिन्दुत्व का समर्थन भी हो सकता है।
अगर केंद्र की भाजपा सरकार के काम या जनसेवा की बात की जाये तो तथ्य है कि किसानों की आय दूनी करने की घोषणा से लेकर किसानों से बिना पूछे, बिना मांग उनके लिए कानून बना देने वाली सरकार ने एक साल के जबरदस्त आंदोलन के बाद भले वापस ले लिया पर किसानों की मांग पूरी करने की दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई और कार्रवाई तो छोड़िये किसानों के प्रतिनिधिमंडल से बात करने की भी व्यवस्था नहीं हुई है। अभी भी किसान दिल्ली या दिल्ली से लगने वाली डबल इंजन की सरकार वाले राज्यों की सीमा पर रोक दिये जाते हैं। 2021 में जब नरेन्द्र मोदी ने अपने किसान कानून वापस किये थे तो अखबारों ने बताया था, हम किसानों को समझा नहीं पाए…कृषि कानूनों को वापस करते वक्त भारी मन से पीएम मोदी ने कहा था, हमारी नीयत साफ थी, पवित्र थी लेकिन हम शायद समझा नहीं पाए, हमारी तपस्या में कमी रह गई। उन्होंने कहा था, ‘न जाने कितनी पीढ़ियां जिन सपनों को सच होते देखना चाहती थीं, भारत उन सपनों को पूरा करने का भरपूर प्रयास कर रहा है। साथियों, अपने 5 दशक के सार्वजनिक जीवन में मैंने किसानों की परेशानियों को, उनकी चुनौतियों को बहुत करीब से देखा और महसूस किया है। इसलिए जब देश ने मुझे 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में सेवा का अवसर दिया तो हमने कृषि विकास, किसान कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
इस भाषण के तीन साल पूरे हो चुके हैं। बाद के करीब डेढ़ महीने भी निकल गये हैं और द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार अनशन कर रहे किसान नेता ने किसानों के आंदोलन को केंद्र सरकार की मनमानी से बचाने की अपील की है। किसान नेता जगजीत सिंह दल्लेवाल 35 दिन से भूख हड़ताल पर हैं। केंद्र सरकार की ओर से किसी ने इसपर कुछ बोला हो, किसी की कोई चिन्ता हो ऐसी कोई खबर आज अखबारों में नहीं है। वह भी तब जब हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार दल्लेवाल ने किसी भी तरह की देखभाल स्वीकार करने से फिर इनकार कर दिया है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने जो टाइमलाइन तय की थी वह आज खत्म हो जायेगी। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को 31 दिसंबर तक का समय दिया था कि दल्लेवाल को अस्पताल में स्थानांतरित करने के लिए तैयार किया जाये और इसके लिए जरूरत हो तो केंद्र सरकार से मदद ली जाये। किसानों की मांगों के समर्थन में सोमवार को पंजाब बंद रहा। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का पैनल किसानों से 3 जनवरी को बात करेगा। दि एशियन एज में किसानों की खबर सेकेंड लीड है पर इसकी मुख्य लीड, काहुल वियतनाम चले गये और भाजपा-कांग्रेस के बीच नया विवाद। दूसरी ओर, किसानों का पंजाब बंद द हिन्दू में लीड है। इससे आप समझ सकते हैं कि सरकार को खुश करने वाली खबरों को चुनना कितना मुश्किल हो चुका है।
अमर उजाला की आज की लीड का शीर्षक है, भारत की अंतरिक्ष में एक और छलांग, स्पैडेक्स लॉन्च। इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड का शीर्षक है, धीमी होती अर्थव्यवस्था और उधार पर अप्रैल जून के दौरान सोने के बदले कर्ज के एनपीए (होने में) में 30 प्रतिशत का उछाल। कर्ज की किस्तें समय पर आने का मतलब होता है आम तौर पर लोगों की कमाई और खर्च का संतुलन ठीक चल रहा है। इस खबर से पता चलता है कि मंदी के कारण कर्ज लेने को मजबूर लोग किस्तें नहीं चुका पा रहे हैं। आम तौर पर नौकरी पेशा लोगों को वेतन के बदले कर्ज मिल जाता है लेकिन सोने के बदले कर्ज वो लोग लेते हैं जिनकी नियमित आय नहीं है। ऐसे लोग अगर किस्तें नहीं दे पा रहे हैं तो यह गंभीर स्थिति है और इसीलिए लीड है। दूसरे अखबारों ने राजनीति के चक्र में हल्की और सरकारी प्रचार वाली इसरो की खबर को लीड बना दिया है। असल में आज किसानों की खबर के बाद यह सबसे महत्वपूर्ण खबर है। अमर उजाला में भी ऐसी ही खबर बॉटम है।


