दिल्ली हाई कोर्ट में ANI और OpenAI के बीच चल रहे इस हाई-प्रोफाइल मामले ने भारतीय न्यायिक अधिकारिता, कॉपीराइट कानून और एआई तकनीक के उपयोग को लेकर कई कानूनी और तकनीकी सवाल खड़े किए हैं। OpenAI ने भारतीय न्यायालयों की अधिकारिता को चुनौती देते हुए यूएस कानून, सेवा शर्तों और “फेयर यूज” के दायरे का हवाला दिया है। इस मुकदमे में ANI ने OpenAI पर उनके कंटेंट के उपयोग का आरोप लगाया है, जबकि OpenAI ने इसे भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत सही ठहराने की कोशिश की है।
यह पूरा प्रकरण तकनीक और कानून के बीच एक दिलचस्प टकराव का उदाहरण बन गया है।
पढ़ें.. मामले की मुख्य बातें:
- भारतीय न्यायालय की अधिकारिता का सवाल:
OpenAI ने दिल्ली हाई कोर्ट में तर्क दिया है कि भारतीय न्यायालयों को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। कंपनी ने कहा कि उसके सर्वर और डेटा भारत के बाहर स्थित हैं, और केवल भारत में ChatGPT की उपलब्धता से भारतीय न्यायालयों की अधिकारिता स्वाभाविक रूप से नहीं बनती। - यूएस कानून के तहत डेटा संरक्षण का दावा:
ANI द्वारा OpenAI के प्रशिक्षण डेटा को हटाने की मांग पर OpenAI ने कहा कि ऐसा करना अमेरिकी संघीय कानूनों का उल्लंघन होगा, जो चल रहे मुकदमों में सबूतों को संरक्षित रखने की अनिवार्यता रखते हैं। OpenAI वर्तमान में न्यूयॉर्क टाइम्स के साथ एक समान मुद्दे पर मुकदमे में शामिल है। - कॉमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 का संदर्भ:
OpenAI ने तर्क दिया कि ANI का मामला Commercial Courts Act, 2015 की परिभाषा में नहीं आता है। उन्होंने कहा कि मुकदमे में शामिल कुछ मुद्दे वाणिज्यिक विवादों की श्रेणी से बाहर हैं, जैसे कि मानहानि का दावा। - न्यायिक क्षेत्र और मध्यस्थता की शर्तें:
OpenAI ने ANI को याद दिलाया कि ChatGPT का उपयोग करने के दौरान ANI ने OpenAI की सेवा शर्तों को स्वीकार किया था। इन शर्तों में विवाद के समाधान के लिए सैन फ्रांसिस्को, कैलिफोर्निया की अदालतों की विशेष अधिकारिता और मध्यस्थता की अनिवार्यता शामिल है। - कॉपीराइट उल्लंघन का खंडन:
OpenAI ने स्पष्ट किया कि भारतीय कॉपीराइट कानून केवल विचारों की अभिव्यक्ति पर लागू होता है, न कि तथ्यों या विचारों पर। मशीन प्रशिक्षण जैसे ट्रांसफॉर्मेटिव उद्देश्यों के लिए ऑनलाइन डेटा का उपयोग “फेयर यूज” के दायरे में आता है। - ANI की सामग्री का उपयोग:
OpenAI ने तर्क दिया कि ANI की खबरें मुख्य रूप से तथ्यात्मक हैं, जो भारतीय कानून के तहत कॉपीराइट सुरक्षा के दायरे में नहीं आतीं। - ChatGPT की सीमाएं और “हैलुसिनेशन”:
OpenAI ने ChatGPT की सीमाओं को स्वीकार करते हुए कहा कि कभी-कभी “हैलुसिनेशन” (गलत या गैर-सटीक जानकारी) उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने ANI के मानहानि के दावों को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी “हैलुसिनेशन” से कोई वास्तविक नुकसान या प्रतिष्ठा को हानि नहीं हुई। - ANI के दावे पर प्रतिक्रिया:
OpenAI ने यह भी आरोप लगाया कि ANI ने जानबूझकर ChatGPT को अपने लेखों को पुनः प्रस्तुत करने के लिए उकसाने की कोशिश की। हालांकि, एआई ने स्वतंत्र और अनूठे उत्तर दिए, जो यह दिखाते हैं कि यह मूलभूत रूप से डेटा को कॉपी नहीं करता। - AI के मानवीय लाभ पर जोर:
OpenAI ने कोर्ट को बताया कि उनकी तकनीक ने मानवता को बड़े पैमाने पर लाभ पहुंचाया है और ANI का यह मुकदमा खारिज किया जाना चाहिए।
केस की अगली सुनवाई अब 28 जनवरी को फिर से दिल्ली हाई कोर्ट में की जाएगी।
एएनआई बनाम ओपनएआई केस में सुनवाई से पहले बीच में कूदा भारतीय मीडिया
दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई से पहले एएनआई मीडिया और ओपनएआई के बीच चल रहे कानूनी मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है। डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA), जिसमें इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, और एनडीटीवी जैसे प्रमुख मीडिया हाउस शामिल हैं, ने एएनआई के समर्थन में इस मामले में हस्तक्षेप किया है।
भारतीय मीडिया की आपत्ति
भारतीय मीडिया कंपनियों ने आरोप लगाया है कि ओपनएआई ने अब तक भारत में किसी भी तरह की साझेदारी नहीं की है, जबकि दुनिया भर में मीडिया कंपनियों के साथ ओपनएआई के कई लाइसेंसिंग समझौते हुए हैं। उदाहरण के लिए, एसोसिएटेड प्रेस और न्यूज़ कॉर्प जैसी कंपनियां अपने कंटेंट के इस्तेमाल के बदले ओपनएआई से लाखों डॉलर कमा रही हैं।
इंडियन एक्सप्रेस के कार्यकारी निदेशक अनंत गोयनका ने कहा, “पिछले कुछ सालों में तकनीकी कंपनियों ने भारत में न्यूज़ कंटेंट के महत्व को समझा है, लेकिन एआई कंपनियां अभी भी भारत के साथ भेदभाव कर रही हैं।”
डीएनपीए के तर्क
डीएनपीए का कहना है कि ओपनएआई ने भारतीय कॉपीराइट कानूनों का उल्लंघन किया है और उनके सदस्यों की बौद्धिक संपदा का अनुचित लाभ उठाया है। डीएनपीए ने आरोप लगाया कि एआई मॉडल के जरिए गलत सूचना और फेक न्यूज का प्रसार बढ़ रहा है, जिससे मीडिया की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।
डीएनपीए के बयान में कहा गया, “एआई मॉडल पारदर्शिता की कमी के कारण खबरों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं, जिससे सार्वजनिक विश्वास कमजोर हो सकता है। उचित लाइसेंसिंग और कंटेंट उपयोग के नियम लागू करना बेहद जरूरी है।”
सरकार की भूमिका और उद्योग की मांगें
केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था, “एआई मॉडल बड़े डाटा सेट पर आधारित कंटेंट तैयार करते हैं, लेकिन उस डाटा को बनाने वाले मूल रचनाकारों के अधिकार और मान्यता का क्या होगा? यह सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि नैतिकता का भी सवाल है।”
आगे का रास्ता
मीडिया उद्योग के विशेषज्ञों का मानना है कि ओपनएआई और अन्य एआई कंपनियों को भारतीय मीडिया संगठनों के साथ साझेदारी करनी चाहिए। इसके तहत कंटेंट का उपयोग करने के लिए उचित शुल्क और क्रेडिट देने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
द कारवां के संपादक अनंत नाथ ने कहा, “एआई कंपनियों को मूल कंटेंट निर्माताओं के साथ व्यावसायिक समझौते करने चाहिए। यह मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि पूरे उद्योग के हित का है। अब समय आ गया है कि भारतीय मीडिया इस पर एकजुट होकर कार्रवाई करे।”
28 जनवरी को होने वाली सुनवाई में यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस मामले पर क्या रुख अपनाती है। इससे न केवल भारतीय मीडिया उद्योग बल्कि वैश्विक स्तर पर एआई और मीडिया के संबंधों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।


