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सुख-दुख

चीखता गाड़ी से निकला एक ED ऑफिसर, पूछा- छापी थी किसने घोटाले की ख़बर?

पत्रकारों की व्यथा बयां करती जयेन्द्र कुमार की ये कविता!

जयेन्द्र कुमार-

आइए महसूस करिए जर्नलिस्ट के जज़्बात को,
मैं सहाफ़ियों की बस्ती में ले चलूँगा आपको।

क़ैद में है कलम कैसे लिख दें दास्तां?
रोज़ दिखता सामने है नौकरी का ‘वास्ता’।

गुमनामी की ज़िन्दगी है बेबस और लाचार हैं,
चार बच्चे पालने है मन ये विचार हैं।

रास्ते में नंद लाल सत्ता से टकरा गया,
घर पहुंचते ही सुना चैनल से नोटिस आ गया।

आया था सिस्टम बदलने मंगल का छोकरा,
धीरे से ईमान बदला देख देखकर रोकड़ा।

जी हुजूरी में बीत गई बनवारी की ज़िन्दगी,
सत्ता की गोद में दौलत और शोहरत मिली।

एक दिन सब सहाफ़ी एका-एक थर्रा गए,
पता चला जब बस्ती में ED वाले आ गए।

चीखता गाड़ी से निकला एक ED ऑफिसर,
पूछा- छापी थी किसने घोटाले की ख़बर?

कौन है वो देशद्रोही जल्दी से जवाब दो?
घर से निकलो सब, अपनी संपत्ति का हिसाब दो।

उठ खड़े थे सब सहाफ़ी बोले ये अन्याय है,
दो वक़्त की रोटी जुटा लें उतनी भी नहीं आय है।

एक ऑफिसर ने कहा- छान मारो बस्तियाँ,
मिल जाए कुछ अगर तो मिटा दो इनकी हस्तियाँ।

सहाफ़ियों के घर से निकली कलमें और किताब,
मौन थे सब देखकर ज़्यादती बेहिसाब।

ऑफिसर ने फिर कहा सुन लो सब मेरी बात,
सत्ता से टकराओगे तो खाओगे फिर जूते-लात ।

एक सहाफ़ी ने कही थी आर्टिकल 19 की बात,
कट रही है कई दिनों से जेल में अब उसकी रात।

कौन समझाए सत्ता को लोकतंत्र का दस्तूर?
टीवी, रेडियो, अख़बार हैं सब इनसे कोसों दूर।

(अदम गोंडवी की कविता “चमारों की गली से प्रेरित”)

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