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आज के अखबार : भाजपा पर मीडिया का यह अहसान उसकी देशभक्ति पर भी सवाल उठाता है

संजय कुमार सिंह

भाजपा के प्रति अखबारों का रुख इतना नरम है कि आज के अखबारों में मुख्यमंत्री तय नहीं होना भी खबर नहीं है जो है वह लीपा-पोती। मणिपुर में जो सब हुआ और जितने समय तक चलता रहा उसमें मुख्यमंत्री बदलना शायद पहली जरूरत थी। महीनों मणिपुर जलता रहा, मुख्यमंत्री बने रहे। कई महीनों बाद उनका इस्तीफा हुआ है तो पार्टी के पास विकल्प नहीं है। भाजपा अभी तक मुख्यमंत्री का विकल्प नहीं ढूंढ़ पाई है। यही हालत दिल्ली में है। भाजपा ने किसी तरह आम आदमी पार्टी को हरा तो दिया लेकिन सरकार नहीं बना पा रही है। यह साधारण नहीं है और अमूमन ऐसा नहीं होता है लेकिन भाजपा के मामले में यह आम बात हो गई लगती है। दिलचस्प यह है कि अखबारों में इसपर खबर नहीं है। और पार्टी पर मीडिया का कोई दबाव नहीं होता है।

इस संबंध में विपक्षी नेताओं के आरोप को भी प्रमुखता नहीं दी जाती है। एन बिरेन सिंह ने इतवार को इस्तीफा दिया था जबकि दिल्ली के नतीजे आठ फरवरी को आये थे। फिर भी दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों का फैसला अभी तक नहीं हुआ है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा किसी भी तरह की मुश्किल में हो या उसकी कमजोरी हो, खबर नहीं बनती है। इस मामले में भी यही हो रहा है। मणिपुर का मामला आज टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, मुख्यमंत्री (के चुनाव में) देरी से मणिपुर भाजपा का टकराव खुल गया। इस बीच, खबर है कि राज्य विधानसभा की बैठक अगस्त में हुई थी। विधानसभा का दूसरा सत्र छह महीने के अंदर बुलाया जाना चाहिये था पर राज्यपाल ऐसा नहीं कर पाये और यह अवधि बुधवार को समाप्त हो गई। 

इस लिहाज से भी मामला गंभीर है। फिर भी मेरे आठ अखबारों में पहले पन्ने पर जो खबरें हैं उनके बारे में बताता हूं। टेलीग्राफ के अनुसार, इंफाल स्थित राजनीतिक टीकाकार और लेखक प्रदीप फांजौबम ने कहा कि रविवार से चल रहे घटनाक्रम से पता चलता है कि केंद्र और भाजपा मणिपुर को कितने हल्के में ले रहे हैं। प्रदीप ने कहा, “मुख्यमंत्री के इस्तीफे पर आम सहमति तक पहुंचने से पहले उन्हें एक परिवर्तन योजना तैयार रखना चाहिए था। उनके उत्तराधिकारी को खोजने में देरी ने न केवल राज्य भाजपा के भीतर गहरे विभाजन को सामने ला दिया है, बल्कि जातीय संघर्ष और राजनीतिक संकट से निपटने के केंद्र के तरीके पर भी सवाल उठाए हैं। इससे भाजपा की छवि अच्छी नहीं लग रही है।” उन्होंने कहा कि लोग मौजूदा स्थिति से थक चुके हैं और राज्य में शांति व सामान्य स्थिति वापस लाने के लिए एक मजबूत सरकार चाहते हैं

इंफाल के एक अन्य निवासी ने कहा कि वे इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि भाजपा मणिपुर में क्या चाहती है, साथ ही कई अनुत्तरित प्रश्न हैं। उन्होंने कहा, “लोग चर्चा कर रहे हैं कि 21 महीने के संघर्ष के बाद बीरेन सिंह को इस्तीफा क्यों देना पड़ा। उन्हें मणिपुर के लोगों को यह बताना चाहिए। उन्होंने अपने इस्तीफे का कोई कारण नहीं बताया। विधानसभा सत्र क्यों रद्द करना पड़ा? क्या यह मणिपुर में भाजपा सरकार को बचाने के लिए था?” एक अन्य निवासी ने कहा कि चल रहे जातीय संघर्ष के बीच सत्ता संघर्ष के कारण भाजपा की छवि को “नुकसान” हुआ है। हालांकि, बीजेपी के एक सूत्र ने कहा कि केंद्रीय नेतृत्व मौजूदा स्थिति और अंदरूनी कलह को देखते हुए अपना फैसला थोपना नहीं चाहता है। उन्होंने कहा, “इसलिए वह सावधानी से कदम बढ़ा रही है।” कहने की जरूरत नहीं है कि इससे भाजपा की कमजोर स्थिति का पता चलता है और यह सब तब हो रहा है जब भाजपा पर आरोप है कि वह चुनाव में गड़बड़ी करके जीतती रही है। यह स्थिति किसी भी तरह से देश हित में नहीं हो सकती है लेकिन भाजपा के लोग, समर्थक और प्रचारक तो चुप हैं ही मीडिया भी उसके समर्थन में है। उसके खिलाफ किसी मामले की जांच और रिपोर्ट शायद ही होती हो। जो होती है वह गिने-चुने संस्थानों की होती है, ज्यादातर मुंह सिले बैठे हैं या पक्ष प्रचार कर रहे हैं।

अमर उजाला में पहले पन्ने पर पांच कॉलम के बॉटम का शीर्षक यही करता लग रहा है। मुख्य शीर्षक है, “सीएम चेहरे से बड़ा सियासी संदेश देने की तैयारी में भाजपा”। उपशीर्षक है, प्रदूषण मुक्त व विकसित दिल्ली का भी पेश करेगी रोडमैप, यमुना को गंगा की तर्ज पर स्वच्छ बनाना पहली प्राथमिकता। एक और खबर का शीर्षक है, सीएम पद पर सस्पेंस क्यों। दूसरा शीर्षक है, मंत्री पद के साथ निगम बोर्ड पर भी मंथन। नवोदय टाइम्स का बॉटम इंडिया टुडे और सी वोर्ट के सर्वे का अनुमान जता रहा है और इसके अनुसार, आज चुनाव हुए तो केंद्र में बीजेपी की अपने दम पर सरकार। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा जब प्रशासनिक निर्णय नहीं ले पा रही है। जब दिखाई दे रहा है कि उसके पास काम करने वाले योग्य व सक्षम लोगों की कमी है या उनका चुनाव करने में समस्या है तब अखबार उसकी भरपाई के लिए ऐसी प्रचारात्मक खबरें छाप रहे हैं जिनकी कोई जरूरत नहीं है। दूसरी ओर जिन मामलों की पड़ताल होनी चाहिये उनपर सन्नाटा है।

यह तब है जब वास्तविकता सबको मालूम है और दि एशियन एज ने छापा भी है। दो कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, भाजपा दिल्ली मंत्रिमंडल और मुख्यमंत्री का चुनाव रविवार को करेगी। उपशीर्षक है, मोदी के लौटने पर होगी प्रमुख बैठक। जाहिर है, प्रधानमंत्री के नहीं होने के कारण निर्णय नहीं हो रहा है और हो भी कैसे? भाजपा के पास पूर्णकालिक अध्यक्ष भी तो नहीं है। जो भी हो, भाजपा, सरकार और उसके काम-काज से संबंधित मामले सामने नहीं आते हैं क्योंकि मीडिया बताता नहीं है। सरकार नहीं बताती है सो अलग। फिर भी उसकी कोई शिकायत या आलोचना नहीं है। नरेन्द्र मोदी और उनके नेतृत्व में भाजपा ने कांग्रेस सरकार की जो आलोचना की थी उसे याद कीजिये और सोचिये कि गड़बड़ी करके चुनाव जीतने के आरोपों पर भी चुप रहने वाला मीडिया देशभक्त है या भाजपा भक्त।   

यह मैं इसलिए कह पा रहा हूं कि हिन्दू में 12 फरवरी को (कल) छपी एक खबर के अनुसार महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के बाद विधासनभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि असामान्य नहीं है। द हिन्दू ने चेन्नई डेटलाइन से बाईलाइन वाली अपनी एक एक्सक्लूसिव खबर में बताया है कि ऐसा 2004, 2009, 2014, 2019 में भी हुआ था। खबर के अनुसार दिल्ली के पुराने डाटा से भी ऐसी वृद्धि के संकेत मिलते हैं। कहने की जरूरत नहीं है मतदाता सूची में यह वृद्धि भले हर पांच साल पर लोकसभा चुनाव के बाद विधान सभा चुनाव से पहले होती रही हो लेकिन अब जब भाजपा पर ऐसा करने का आरोप है और आंकड़े बताते हैं कि जो वोटर बढ़े जीत उतने ही वोटों से हुई और वोटर वहीं बढ़े तो यह सामान्य होते हुए भी रहस्यमय है।

अगर यह पहले से हो रहा है तो भाजपा पहले भी चुनाव लड़ती थी। इसलिए, माना जा सकता है कि भाजपा ने पहले भी सफलतापूर्वक किया होगा। अगर यह अभी तक किसी को पता नहीं था, इसे प्रकाश में नहीं लाया गया तो यह भी आसामान्य है और इससे इस बार की वृद्धि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है क्योंकि भाजपा के वोटों में (लगभग) उतनी ही वृद्धि का आरोप है। जो भी हो, मामला इतना सरल नहीं है पर अब जब मामला फंसता लग रहा है तो एक असामान्य वृद्धि के संबंध में 2004 और 2009 के तथ्य अब उजागर किया जाना भी असामान्य है। हालांकि, यह नये आरोपों का फॉलोअप है जो अब नहीं होता है। और अब पता चलने का मतलब है कि कई साल से (2014 के बाद से) कायदे की रिपोर्टिंग नहीं हो रही है।  

भाजपा समर्थक प्रचारकों ने आरोप लगने पर चेक नहीं किया और अगर चेक किया फिर भी सार्वजनिक नहीं किया या पहले से होता रहा है पर किसी ने ध्यान नहीं दिया – यह सब गड़बड़ी का ही संकेत है और विस्तृत जांच के बिना न तो आरोपों से इनकार किया जा सकता है और ना उसकी पुष्टि हो सकती है। आमतौर पर अखबारों की खबरों से ऐसे मामलों की पुष्टि हो जाती रही है पर इस बार यह मामला इतने समय तक दबा रहा तो यह सामान्य नहीं है, लंबे समय से साजिश चल रही होने का मामला भी हो सकता है पर खबर का खुलासा वैसे नहीं है। जैसे प्रचारकों को करना चाहिये था या वे करते रहे हैं।

यहां यह भी दिलचस्प है कि राहुल गांधी चुनाव आयोग से महाराष्ट्र की मतदाता सूची मांग रहे हैं जो नहीं दिया जा रहा है और भाजपा के लोग बचाव कर रहे हैं। यहां तक कि लोकसभा अध्यक्ष ने भी कहा कि वेबसाइट पर है। कहने की जरूरत नहीं है कि अगर कोई चीज वेबसाइट पर है तो उसकी कॉपी देने की जरूरत नहीं है। और बैंक के पासबुक से लेकर तमाम चीजों के बारे में ऐसा कहा जा सकता है। अगर कॉपी देने की जरूरत नहीं होती तो अखबार क्यों छपते और बिकते? दिलचस्प यह भी है कि द हिन्दू में खबर छपने के बाद भी इसकी चर्चा मैंने नहीं कहीं और नहीं देखी। और खबर कह रही है कि वेबसाइट पर तो 2004 में भी था।

वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का मामला राहुल गांधी की कोशिशों और आम आदमी पार्टी के आरोपों व उदाहरणों के बाद भी ‘वायरल’ खबर नहीं बन रही है। द हिन्दू की खबर का भी किसी ने फॉलोअप नहीं किया। आजकल परेशान करने वाली खबरों को गलत या झूठ करार देने का ही नहीं फैक्ट चेक का भी रिवाज है। दि हिन्दू की खबर का फैक्ट चेक भी नहीं नजर आया। हो सकता है, कुछ समय बाद नजर आये।

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