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उत्तर प्रदेश

सहारा मीडिया के कर्मचारियों का लखनऊ में बड़ा प्रदर्शन, मीडिया संस्थानों और स्वयंभू पत्रकारों में खामोशी

लखनऊ | वास्तव में यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि लखनऊ में सहारा इंडिया के खिलाफ हुए धरना-प्रदर्शन की खबर को मीडिया ने नजरअंदाज कर दिया। यह आज की पत्रकारिता का कटु सत्य है, जहां सवाल उठाने की हिम्मत करने पर बड़े-बड़े पत्रकार और स्वयं भू दिग्गज सामने आ जाते हैं, जो खुद को सच्चाई का पैरोकार बताते हैं और दावा करते हैं कि उनका कहा ही अंतिम सत्य है—चाहे वह सही हो या गलत।

सहारा समूह अपने ही कर्मचारियों की मेहनत की कमाई हड़प कर बैठा है, उनकी सैलरी का भुगतान नहीं कर रहा, और विडंबना यह है कि पत्रकारिता के कई स्तंभ और जिम्मेदार लोग, जो निष्पक्षता और सच्चाई के प्रहरी कहलाते हैं, सहारा समूह के समर्थन में खड़े नजर आते हैं।

यह देखकर हैरानी होती है कि पैकेट की ताकत कितनी प्रबल है, जो सच की आवाज को दबाने में सफल हो जाती है।

अब सवाल यह है कि सहारा समूह के कर्मचारियों की चीख-पुकार दबाने की कीमत कितनी थी? पत्रकारिता का धर्म सच्चाई और निष्पक्षता है, लेकिन क्या ये सब सिर्फ शब्द बनकर रह गए हैं? क्या पैसों के बल पर मीडिया की आवाज खरीदी जा सकती है? ऐसे में आम जनता किस पर भरोसा करे—उन पत्रकारों पर जो कभी सच्चाई के लिए लड़ते थे या उन पर जो अब पैकेट की चमक-धमक में खो गए हैं?

यह समय है कि हम अपनी आवाज उठाएं और उन सवालों का जवाब मांगें, जो सहारा समूह के कर्मचारियों के हक की बात करते हैं। वरना, यह खामोशी कहीं न कहीं हमारी जिम्मेदारी और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करेगी।

बकाया वेतन के लिए संघर्ष कर रहे मीडियाकर्मियों द्वारा भड़ास को भेजी गई सूचना पर आधारित

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