नोएडा। सहारा टीवी नेटवर्क (सहारा समूह) के कर्मचारियों द्वारा वेतन न मिलने और श्रम अधिकारों के हनन की शिकायत के बाद श्रम विभाग द्वारा की गई जांच को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि श्रम प्रवर्तन अधिकारी आर.एम. वर्मा द्वारा की गई जांच न केवल अधूरी है, बल्कि स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण भी प्रतीत होती है।
क्या है मामला?
सहारा टीवी नेटवर्क के 100 से अधिक कर्मचारियों ने दिनांक 13 मार्च 2025 को संदर्भ संख्या 40014125008416 के तहत श्रम विभाग में शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत में वेतन न मिलने और श्रम अधिकारों के उल्लंघन का मामला उठाया गया था। हालांकि, जांच के बाद श्रम प्रवर्तन अधिकारी आर.एम. वर्मा ने श्रमिकों की शिकायत को ‘झूठा और फर्जी’ बताते हुए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी।
क्यों उठ रहे हैं सवाल?
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जांच प्रक्रिया में कई गंभीर अनियमितताएँ देखी गईं:
- एकतरफा जांच – जांच अधिकारी ने केवल सहारा प्रबंधन की लीगल अधिकारी साधना रानी से बातचीत कर रिपोर्ट तैयार कर दी, जबकि शिकायतकर्ताओं से कोई संपर्क नहीं किया गया।
- साक्ष्यों की अनदेखी – शिकायत में कर्मचारियों के नाम, मोबाइल नंबर और इम्प्लॉई कोड दिए गए थे, बावजूद इसके, श्रम विभाग ने वेतन भुगतान के कोई प्रमाण नहीं मांगे।
- श्रमिकों से संवाद नहीं – स्थलीय निरीक्षण के दौरान भी शिकायतकर्ताओं से मिलने का प्रयास नहीं किया गया।
- न्याय प्रक्रिया का उल्लंघन – बिना श्रमिकों का पक्ष सुने जांच रिपोर्ट तैयार की गई, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
- पक्षपातपूर्ण रवैया – जांच अधिकारी पर जानबूझकर सहारा प्रबंधन के पक्ष में रिपोर्ट तैयार करने का आरोप लग रहा है, जिससे भ्रष्टाचार की आशंका पैदा हो रही है।
श्रम कानूनों का उल्लंघन
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, श्रम विभाग की यह कार्यप्रणाली कई श्रम कानूनों का उल्लंघन करती है:
मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 – इसके तहत नियोजकों को श्रमिकों को समय पर वेतन देना अनिवार्य है।
संविधान का अनुच्छेद 21 – श्रमिकों का समय पर वेतन प्राप्त करना उनके जीवन और सम्मान का मौलिक अधिकार है।
श्रम प्रवर्तन अधिकारियों की जिम्मेदारी – श्रम प्रवर्तन अधिकारियों को निष्पक्ष रूप से जांच करनी होती है, न कि केवल नियोक्ता के पक्ष में रिपोर्ट देना।
क्या चाहते हैं श्रमिक?
श्रमिकों ने श्रमायुक्त को ज्ञापन सौंपकर निम्नलिखित माँगें रखी हैं:
- इस पक्षपातपूर्ण जांच रिपोर्ट को अविलंब रद्द कर पुनः निष्पक्ष जांच करवाई जाए।
- एक स्वतंत्र जांच कमेटी गठित की जाए, जो प्रभावित कर्मचारियों से सीधे संपर्क कर वास्तविक स्थिति का आकलन करे।
- श्रम प्रवर्तन अधिकारी आर.एम. वर्मा के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
- सहारा प्रबंधन से सभी कर्मचारियों के वेतन भुगतान का प्रमाण लिया जाए और बकाया राशि का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
आंदोलन की चेतावनी
श्रमिकों ने स्पष्ट किया है कि यदि उनकी माँगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई, तो वे श्रम विभाग के समक्ष अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल करने को बाध्य होंगे।
इस पूरे मामले में अब तक श्रम विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन सवाल यह है कि जब श्रमिकों की शिकायतों में इतने स्पष्ट साक्ष्य हैं, तो फिर जांच अधिकारी ने इसे झूठा कैसे ठहरा दिया? क्या श्रम विभाग वाकई श्रमिकों के हितों की रक्षा कर रहा है, या फिर प्रभावशाली कॉरपोरेट्स के आगे झुक रहा है?
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