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आज के अखबार : सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, क्या चाहते हैं? कार्यपालिका में दखल दें….और हेडलाइन मैनेजमेंट चूर

हर विरोधी को धमकाने और सरकारी एजेंसियों या अदालतों के जरिये नियंत्रित करने की भाजपा सरकार की रणनीति का खुलासा कल सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी से हुआ। आज सभी अखबारों ने हेडलाइन मैनेजमेंट भूलकर इसे खूब महत्व दिया है।

संजय कुमार सिंह

सुप्रीम कोर्ट और मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ सत्तारूढ़ दल के सांसद की टिप्पणी, पार्टी अध्यक्ष का उससे पल्ला झाड़ना और फिर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सांप्रदायिक टिप्पणी – गंभीर मामला है। खासकर इसलिए कि सत्तारूढ़ दल अपने सांसद को काबू नहीं कर रहा है। उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है और खबर भी नहीं छप रही है। कल मैंने यहां इस बारे में लिखा था। उसके बाद इस क्रम में दो बातें हुई हैं। एक तो यह कि राहुल गांधी ने अमेरिका में कहा है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र नहीं है। आज यह खबर दि एशियन एज में दो कॉलम में छपी है और उपशीर्षक है – भाजपा का पलट वार, उन्हें (राहुल को) ‘देशद्रोही’ कहा। यह दिलचस्प है कि देश बेचने का आरोप झेल रहे सत्तारूढ़ दल के लोग विपक्ष के नेता को ‘देशद्रोही’ कह रहे हैं। मेरे आठ अखबारों ने तो नहीं, बाकी के कई अखबारों ने इसे खूब प्रचार दिया है। इसके जवाब और प्रतिक्रिया में जो सब हो रहा है (और हो रहा होगा या होना चाहिये) पर्याप्त दिलचस्प होगा लेकिन सरकार का समर्थन करने वाले एक ही पक्ष की खबर छापते हैं और दूसरे पक्ष की खबर छापने से डरने वाले दूसरे पक्ष को छापते ही नहीं है। मैं यहां यही सब बताने की कोशिश करता हूं। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट की कल की एक टिप्पणी से सरकार की कोशिशों और चाहत का खुलासा हो गया और सुखद यह है कि सभी अखबारों ने इस समझते हुए भी प्रमुखता से छापा है।

आप जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में कुछ हो जाये तो केंद्र सरकार और भाजपा का पूरा इको सिस्टम आसमान सिर पर उठा लेता है और बंगाल सरकार को नीचा दिखाने तथा बदनाम करने की हर संभव कोशिश की जाती है। इसमें जज को सांसद बना देना शामिल है। वक्फ कानून का मकसद और उसमें हुई जल्दबाजी सब लोग समझ रहे हैं। मुर्शिदाबाद में उसे लेकर हिंसा हो गई तो भाजपाई राज्यपाल मुख्यमंत्री के आग्रह के बावजूद लाउड स्पीकर लेकर घूम रहे हैं जो निश्चित रूप से राज्यपाल का काम नहीं है। ममता बनर्जी ने भी भाजपा पर मामले को तूल देने और बदनाम करने की कोशिशों का आरोप लगाया है। इसी क्रम में हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी जिसपर सुरक्षा बलों की तैनाती का आदेश आया था। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। अनुच्छेद 355 पर तुरंत सुनवाई की मांग की गई है। दैनिक भास्कर ने अपनी इस खबर में बताया है कि अनुच्छेद 355 क्या है और यह अनुच्छेद 356 से अलग कैसे है।

इस खबर के अनुसार अनुच्छेद 356 यानी राष्ट्रपति शासन लगने पर राज्य सरकार बर्खास्त हो जाती है, जबकि अनुच्छेद 355 लगाने पर ऐसा नहीं होता है। राज्य की सरकार बरकरार रहती है, लेकिन राज्य की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के लिए कदम उठाने के सारे अधिकार केंद्र के पास चले जाते हैं। राज्य की पुलिस सीधे केंद्र के आदेश पर काम करती है। कहने की जरूरत नहीं है कि अदालत में इस अपील का क्या मकसद है और किन लोगों ने यह अपील की होगी। ये भाजपा के प्रचारक न भी हों तो ममता सरकार के विरोधी होंगे ही। केंद्र की भाजपा सरकार पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए तीसरी बार मुकाबले में आने वाली है और केंद्रीय चुनाव आयोग पर नियंत्रण जमाने के बाद सरकार की कोशिशें तेज हो गई दिख रही हैं। वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल और आदेश के बाद सरकार के प्रतिनिधियो की प्रतिक्रिया आप जानते हैं और ऐसे में अनुच्छेद 355 के तहत याचिका का उद्देश्य बताने की जरूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कल कहा, हमपर पहले से ही कार्यपालिका में दखल का आरोप है क्या चाहते हैं….. कार्यपालिका में दखल दें। जाहिर है, मामला दिलचस्प है और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने इसे न सिर्फ समझ लिया खुलकर बता भी दिया। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, दो सुनवाइयों में अगले मुख्य न्यायाधीश ने कहा, हमपर यह आरोप लग रहा है कि हम सरकार के कार्यक्षेत्र में घुसपैठ कर रहे हैं। हिन्दी अखबारों ने भी इसे प्रमुखता से छापा है और इससे सरकारी रणनीति की पोल खुलती लग रही है। दैनिक भास्कर में तो आज यह खबर लीड है। मुख्य शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – क्या चाहते हैं… कार्यपालिका में दखल दें। किरेन रिजिजू और निशिकांत दुबे के आरोपों के बाद इस सवाल या बयान का खास मतलब है। दिलचस्प यह कि अखबारों ने इसे प्रमुखता दी है। जनसत्ता में यह खबर पांच कॉलम की लीड है। एक लाइन का फ्लैग शीर्षक है, न्यायमूर्ति बीआर गवई ने न्यायपालिका को निशाना बनाये जाने का जिक्र करते हुए कहा, ( दो लाइन का मुख्य शीर्षक है) हमारी आलोचना हो रही है कि हम संसदीय व कार्यपालिका के काम में दखल दे रहे हैं।

कहने की जरूरत नहीं है कि किरेन रिजिजू और निशिकांत दुबे का बयान और भाजपा का उससे पल्ला झाड़ना तथा कार्रवाई न करना पार्टी (या परिवार) की रणनीति का हिस्सा है और दिलचस्प यह कि भावी मुख्य न्यायाधीश ने इसे सार्वजनिक रूप से बता दिया। निश्चित रूप से आने वाला समय दिलचस्प होगा। वह इसलिये भी कि सोशल मीडिया पर पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा नेता अरुण जेटली का एक पुराना बयान घूम रहा है। इसमें उन्होंने कहा था, रिटायरमेंट के बाद जजों की पद की चाहत रिटायरमेंट से पहले के उनके फैसलों को प्रभावित करती है। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा है। इससे असहमत होने का कोई कारण नहीं है लेकिन सरकार ने पिछले 10 साल के अपने शासन में क्या किया है? इसके बावजूद सरकार के प्रतिनिधियों की हाल की टिप्पणी और प्रचारकों (इनमें पुरस्कृत और सम्मानित भी है) द्वारा इसका समर्थन निश्चिच रूप से देश को मुश्किल स्थिति में ले जायेगा या ले आया है।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मामला, चुनाव आयोग का काम और सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की स्थिति के बाद राहुल गांधी द्वारा इसका उल्लेख भर करने के लिए उन्हें देशद्रोही कहना पार्टी के असली रंग-रूप को दिखाने में मदद कर रही है और इस एक खबर से यह काम अच्छे से हुआ है। ने अगर महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में धांधली की बात कह ही दी तो गलत क्या है। दिलचस्प यह कि इसपर बवाल करने से राहुल गांधी की बात आज कई अखबारों में छप गई जो यहां कहने से ऐसे नहीं छपती है। हिन्दुस्तान में इस खबर का शीर्षक है, चुनाव पर राहुल के बयान से सियासी बखेड़ा लेकिन चार कॉलम की जो खबर पहले पन्ने पर है उसमें राहुल की बात ही है। दैनिक जागरण में यह दो कॉलम की खबर है, राहुल ने अमेरिका जाकर भी चुनाव आयोग पर सवाल उठाये। दैनिक जागरण ने इसके साथ संबित पात्रा का बयान छापा है। बेशक, संबित को अभिव्यक्ति की आजादी है और भाजपा ने उनको बोलने देने के लिए प्रोफेसर गौरव बल्लभ को कांग्रेस टिकट पर दो चुनाव हारने के बाद भी भाजपा में शामिल कर लिया है। इसलिए उनका कहा भी छपना ही चाहिये।

अमर उजाला में सुप्रीम कोर्ट वाली खबर टॉप पर आठ कॉलम में है। शीर्षक है, हम पर कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण का आरोप, आप परमादेश जारी करने को कह रहे (हैं)। ऐसे में आज खबर यह भी है कि निशिकांत दुबे के खिलाफ अवमानना याचिका दायर करने की तैयारी है। अमर उजाला में छपी खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसके लिए उसकी अनुमति की जरूरत नहीं है। अखबार ने बताया है कि याचिकाकर्ता को इसके लिए अटार्नी जनरल की अनुमति लेनी होगी। जाहिर है, इस मामले में अटार्नी जनरल का फैसला महत्वपूर्ण होने वाला है खासकर इसलिए कि भाजपा ने बयान से पल्ला तो झाड़ लिया है पर कोई कार्रवाई नहीं की है। अटार्नी जनरल की अनुमति के बाद अगर मामला सुप्रीम कोर्ट जाता है तो सुप्रीम कोर्ट को अपनी आलोचना करने वाले को खुद ही सजा देनी होगी और यह थोड़ा मुश्किल काम हो सकता है लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है अटार्नी जनरल मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दें।

सरकार अपने विरोधियों से कैसे पेश आती है उसका एक उदाहरण यह है तो दूसरा राहुल गांधी के अमेरिका में दिये बयान पर भाजपा की प्रतिक्रिया है जो आज मेरे अखबारों के अलााव भी कई अखबारों में प्रमुखता से छपी है। इससे और कुछ हो न हो, भाजपा के खिलाफ बोलने वाले एक बार ज्यादा सोच कर बोलेंगे। दूसरी ओर, आज दैनिक जागरण की लीड भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी है। शीर्षक है, “हमपर तो पहले ही दखलंदाजी के लग रहे हैं आरोप : सुप्रीम कोर्ट”। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, बंगाल में राष्ट्रपति शासन की अपील पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई, ‘महत्वाकांक्षी’ होने के दावे का उल्लेख किया। द हिन्दू में यह खबर पांच कॉलम में छपी है। दो लाइन के शीर्षक के साथ छपी खबर में न्यायमूर्ति बीआर गवई की तस्वीर है और उनकी टिप्पणी हाईलाइट की हुई है, आप चाहते हैं कि केंद्र सरकार को हम आदेश जारी करें कि वह अर्धसैनिक बल तनात करे… क्या यह विधायी और कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं होगा? हम पर तो वैसे ही संसदीय और कार्यपालिका के काम-काज में हस्तक्षेप करने का आरोप लग रहा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सेकेंड लीड है। इसका शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा हम पर संसद के कार्यक्षेत्र में घुसपैठ करने का आरोप है। इस खबर का इंट्रो है, बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने का निर्देश देने की अपील। अखबार में इसके साथ छपी सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, “भाजपा चाहती है कि अदालत स्वतंत्र रहे : हिमंत”। दूसरी ओर, द टेलीग्राफ ने आज अपनी खबर में बताया है कि निशिकांत दुबे सुप्रीम कोर्ट और एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अपने आरोपों पर कायम हैं और उनकी पार्टी ने अभी तक कोई अनुशासनिक कार्रवाई नहीं की है हालांकि शीर्ष अदालत पर उनके हमले से खुद को अलग कर लिया है। इसमें आगे कहा गया है, दुबे ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को बेड़ियों में जकड़ा आदमी कहकर मजाक उड़ाया है क्योंकि उन्होंने चार बार के सांसद के आरोपों पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाया है। आप जानते हैं कि दुबे ने देश में धार्मिक युद्ध के लिए सुप्रीम कोर्ट को जिम्मेदार ठहराया है। वैसे तो टाइम्स के पहले पन्ने की खबर में दुबे के खिलाफ कुछ नहीं है लेकिन दुबे की इस प्रतिक्रिया से लगता है इस मामले में भाजपा में भी मतभेद है। हालांकि, ऐसा हुआ तो दो-चार दिनों में पता चल ही जायेगा। आज यह खबर नवोदय टाइम्स में भी है। यहां इसका शीर्षक है, राष्ट्रपति को हम कैसे आदेश दे सकते (हैं हम पर) पहले ही दखल देने के आरोप लग रहे हैं।  

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