
अनेहस शाश्वत-
आजम खान को जेल से छूटे अभी कुछ ही दिन हुए हैं और मीडिया में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो मुसलमानों का मसीहा लौट आया है और अब उनके बेहतर दिन लौटने वाले हैं। कई वीडियो देखने के बाद मुझे लगा अब आप लोगों को कुछ पुरानी बातें याद दिलानी चाहिए।
बात है 1987-88 के आस-पास की। राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और भाजपा ने बाबरी मस्जिद विवाद को हवा दे रखी थी। उत्तर प्रदेश में उस समय मुलायम सिंह बड़े नेता थे, हालांकि मुख्यमंत्री नहीं बने थे, लेकिन मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे आगे थे। उन्होंने भांप लिया कि बाबरी मस्जिद विवाद में मुसलमानों का वोट लेने की बहुत संभावना है। इसलिए उन्होंने मुसलमानों का पक्ष रखने के लिए आजम खान को आगे किया। आजम खान उग्र हिंदुत्व का सामना करने के लिए उग्र मुस्लिम चेहरा बने। भाजपा और आजम खान दोनों ने जहरीली भाषा के प्रयोग में कोई कसर नहीं छोड़ी।
नतीजा सामने आया, मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री। यह घटना घटी 1989 में।
दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद आंदोलन चल ही रहा था। मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बन चुके थे और भाजपाई कारसेवक मस्जिद गिराने के लिए बार-बार अयोध्या में इकट्ठा होते थे। ऐसे में भाजपा नेताओं और आजम खान के जहरीले बोल उग्र से उग्रतर होते जा रहे थे। नतीजा सामने आया—1990 में उग्र भाजपाई कारसेवकों का हुजूम बाबरी मस्जिद गिराने के लिए अयोध्या में इकट्ठा हुआ। मस्जिद को नुकसान न पहुंचे, इसलिए तब के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने गोली चलवा दी, जिसमें कई कारसेवक मारे गए।
अब आंदोलन का पहला चरण पूरा हुआ। हालांकि मस्जिद बच गई लेकिन मुलायम सिंह की सरकार चली गई और मुलायम सिंह “मुल्ला मुलायम सिंह” के तौर पर मुसलमानों के मसीहा बनकर उभरे। उसके बाद उन्होंने लंबी राजनीतिक पारी खेली। अखिलेश यादव को भी पिता की विरासत का फायदा हुआ और वे भी पूरे पांच साल मुख्यमंत्री रहे। इस पूरी कवायद में आजम खान के जहरीले बोलों का भी खासा योगदान रहा। नतीजे में उत्तर प्रदेश की जागीर में से रामपुर का मुरब्बा मुलायम सिंह ने आजम खान के नाम कर दिया। इसके अलावा मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की सरकारों में भी आजम खान वजीर रहे।
इतनी सफलता आजम खान पचा नहीं पाए और सत्ता-मद में मदमस्त हो गए।
मुलायम सिंह को भी लगातार मुसलमान वोटों की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने भी आजम खान को बेलगाम छोड़ दिया और आजम ने भी इसका पूरा फायदा उठाया। जाति-धर्म की राजनीति के इस दौर में रामपुर के लिए बगैर कुछ किए वे चुने भी जाते रहे। साथ ही किसी भी साधारण नेता की तरह उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे को भी सांसद-विधायक बनवाया। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इसके लिए जितने भी धतकरम आजम खान को करने पड़े, उन्होंने किए।
इतना होने के बाद आजम खान ने सर सैयद अहमद खान बनने की सोची, लेकिन बनाई “जौहर यूनिवर्सिटी” नाम की एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी। जो दरअसल उन्होंने अपनी पुश्तें सुधारने के लिए बनाई, लेकिन नाटक किया कि मजलूम बच्चों के हाथ में कलम पकड़ाने के लिए यूनिवर्सिटी बनवाई।
सब कुछ बढ़िया चल रहा था और आजम खान को भी लग रहा था कि अब वे दूसरे सर सैयद अहमद खान बन चुके हैं। इतने में किस्मत ने पलटा खाया। भाजपा पावर में आई, मुलायम सिंह नहीं रहे और बाबरी मस्जिद तो बहुत पहले ही ढहा दी गई थी, जिसकी कमाई बहुत लोगों ने बहुत तरह से खाई। आजम खान भी उनमें से एक रहे।
जाहिर सी बात है, बदले निज़ाम में मुसलमानों का उग्र चेहरा रहे आजम खान को भी लपेट में आना था और वे आए भी। वे सारे धतकरम सामने आने लगे जो आजम खान ने सत्ता में रहने के दौरान सत्ता-मद में किए थे। यहां एक बात और सोचने वाली है—समाजवादी पार्टी में बहुत से बड़े मुसलमान नेता हैं, तो गाज आजम खान पर ही क्यों गिरी?
जाहिर सी बात है, कहीं न कहीं कुछ तो आजम खान ने ऐसा किया है जो उन पर मुकदमा चलाने का प्रथम दृष्टया आधार बने।
बहरहाल फिलहाल आजम खान जेल से बाहर हैं। मुलायम सिंह अब नहीं हैं और मुलायम सिंह की विरासत में मुसलमानों के नेता अब अखिलेश यादव हैं। साथ ही आजम की जेल यात्रा के दौरान न तो मुस्लिम नेताओं में और न ही आम मुसलमानों में कोई सुगबुगाहट दिखी। सुगबुगाहट तब होती जब आजम खान मुसलमानों के नेता होते, जो वे नहीं हैं।
आजम खान मुसलमानों के नेता मुलायम सिंह के एक प्यादे भर हैं, जिनको बड़े दिल के मुलायम सिंह ने जरूरत से ज्यादा इज्जत दी—कुछ वैसे ही जैसे एक ज़माने में मुलायम सिंह के एक और प्यादे अमर सिंह हुआ करते थे, लोगों को याद भी होगा।
आजम खान भी इस सच्चाई को समझ लें तो बुढ़ापा शांति से बीतेगा। मुझे लगता है शातिर दिमाग आजम खान भी इतनी सी बात तो समझते ही होंगे।
अनेहस शाश्वत लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.


