
यशवंत सिंह-
भारत में सत्ता और पूँजी का गठजोड़ कोई नई बात नहीं, पर इस बार कहानी कुछ ज़्यादा ही खुलकर सामने आई है। अमेरिकी अख़बार द वाशिंगटन पोस्ट की हालिया रिपोर्ट ने जो दस्तावेज़ और ईमेल उजागर किए हैं, वे बताते हैं कि कैसे नरेंद्र मोदी सरकार के संरक्षण में सार्वजनिक एजेंसियों को अडानी समूह में अरबों रुपये झोंकने के निर्देश दिए गए।
रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी बीमा कंपनी LIC और अन्य वित्तीय संस्थानों से कहा गया कि वे अडानी समूह में बड़े पैमाने पर निवेश करें, ताकि “बाज़ार में भरोसा दिखे।” सवाल ये है कि किसके भरोसे की बात हो रही थी — जनता के पैसे की, या प्रधानमंत्री के ‘मित्र’ उद्योगपति की?
अडानी समूह पर अमेरिका में धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी के आरोप पहले से दर्ज हैं, लेकिन इसके बावजूद भारतीय टैक्सपेयर्स के पैसे को उस समूह की ओर मोड़ना, सीधे-सीधे क्रोनी कैपिटलिज़म का नमूना है। यानी सत्ता और पूँजी का ऐसा मेल, जिसमें सरकार नीतियों से नहीं, ‘मित्रों’ के हितों से चलती है।
एलआईसी पहले ही अडानी कंपनियों में निवेश से हज़ारों करोड़ गँवा चुकी थी, फिर भी उसे दोबारा उसी दिशा में झोंका गया। यह निर्णय आर्थिक विवेक का नहीं, राजनीतिक वफ़ादारी का प्रदर्शन था। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में दर्ज संवादों से यही झलकता है कि सरकारी फाइलों में “अडानी में भरोसा बनाए रखना” खुद एक नीति बन चुका था।
भारत के करोड़ों निवेशकों और बीमा धारकों के पैसों को इस तरह निजी साम्राज्य की ढाल बनाना, लोकतंत्र के साथ धोखा है। यह वही दौर है जहाँ सवाल पूछना ‘राष्ट्रविरोध’ और पूँजीपतियों को बचाना ‘राष्ट्रनिर्माण’ कहलाता है।
सत्ता की गोद में बैठे ये कॉरपोरेट साम्राज्य शायद भूल रहे हैं — जनता की चुप्पी स्थायी नहीं होती। जब एक दिन ये चुप्पी टूटेगी, तो न गोदी बचेंगी, न मीडिया की परतें — बस सच सामने रह जाएगा।



पढ़ें भविका कपूर की प्रतिक्रिया-
वॉशिंगटन पोस्ट ने मोदी सरकार की अपने पूंजीपति मित्र को दिए गए ₹32,370 करोड़ के बेलआउट का खुलासा किया।
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में बताया गया है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने अमेरिकी धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी के आरोपों के बावजूद अडानी समूह को लगभग 3.9 अरब डॉलर (₹32,370 करोड़) का बेलआउट देने का निर्देश दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी बीमा कंपनी LIC और अन्य सार्वजनिक संस्थानों को आदेश दिया गया कि वे अडानी कंपनियों में बड़े पैमाने पर निवेश करें ताकि “भरोसा दिखाया जा सके,” जबकि एलआईसी पहले ही अडानी समूह में निवेश से अरबों रुपये गँवा चुकी थी।
रिपोर्ट इसे क्रोनी कैपिटलिज़्म (मित्र पूँजीवाद) का उदाहरण बताती है — जहाँ सार्वजनिक धन का उपयोग प्रधानमंत्री के करीबी उद्योगपति की सुरक्षा के लिए किया गया, जिससे राजनीतिक नीतियों और निजी लाभ के बीच की रेखा धुंधली हो गई।
यह खुलासा भ्रष्टाचार, करदाताओं के पैसों के दुरुपयोग और पारदर्शिता की कमी को लेकर गंभीर चिंताएँ उठाता है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि मोदी के शासन में राजनीतिक वफ़ादारी को जनता के हित से अधिक महत्व दिया जा रहा है।
-भविका कपूर
Must read: How the Modi govt forced LIC to invest >30K Cr in Adani to bail them out in the wake of Hindenburg exposes of Adani’s share price manipulation through shell companies & money siphoned off to tax havens. ये है पूरी स्टोरी-






