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सुख-दुख

यकीन नहीं होता… दुनिया की सबसे प्यारी, जिंदादिल, जिद्दी, भावुक और स्नेहिल लड़की विभा नहीं रही!

विनोद कापड़ी-

दुनिया की सबसे प्यारी लड़की विभा के लिए…

पता नहीं क्या वक्त रहा होगा, जब कल सुबह मोबाइल पर एक मैसेज आया- आपको पता चला विभा के बारे में? मैसेज पढ़ा। बार-बार पढ़ा। लेकिन पूछने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि क्या हुआ? और फिर कुछ देर के बाद एक-एक करके तमाम पुराने साथियों के मैसेज आने लगे- विभा नहीं रही। फिर कुछ घंटों बाद विभा के अंतिम संस्कार के बारे में मैसेज आने शुरू हो गए। दो दिन होने को हैं और मैं अब तक इस सच को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा हूँ कि दुनिया की सबसे प्यारी लड़की, दुनिया की सबसे ज़िंदादिल लड़की, दुनिया की सबसे ज़िद्दी लड़की, दुनिया की सबसे भावुक लड़की, दुनिया की सबसे स्नेहिल लड़की विभा कौल नहीं रही।

टेलीविज़न के बेहद शुरुआती दिनों में.. 1998-2001 में.. जब मेरे पास Zee TV के ब्रेकफास्ट शो Morning Zee की ज़िम्मेदारी थी, उस वक्त टीम के 16-17 लोगों में एक विभा भी थी। कितने साल की रही होगी तब वो? मुश्किल से 23-24 साल की। लेकिन वो पूरी टीम की माँ भी थी, बहन भी थी, दीदी भी थी और दादी भी थी और पूरी टीम में वो अकेली थी- जो किसी भी वक्त मुझ से बहस कर सकती थी। किसी भी वक्त मुझ से लड़ सकती थी और किसी भी वक्त मुझे डाँट सकती थी। शो का प्रोड्यूसर मैं था लेकिन पूरी टीम को ये एहसास हो गया था कि God mother तो विभा ही है।

उस दौर में भी विभा entertainment ही देखती थी और शो में विभा की ज़िम्मेदारी होती थी कि फ़िल्म, संगीत, कला क्षेत्र से जुड़े बड़े-बड़े लोग वो मेहमान के तौर पर ले कर आएगी और फिर जितेंद्र राम प्रकाश और शिवानी वज़ीर उनका इंटरव्यू करेंगे।

मुझे याद नहीं है कि विभा ने कभी निराश किया हो। मशहूर तबला वादक ज़ाकिर हुसैन को तो वो दो घंटे के नोटिस पर कभी भी शो में ला सकती थी। बॉलीवुड का कोई कलाकार ऐसा नहीं रहा होगा, जिसे विभा उस दौर में शो में ना लाई हो। लेकिन जब विभा निराश करती थीं तो ज़ाहिर है उसे डाँट भी सुनने को मिलती थी। पूरी डाँट खाने के बाद विभा सहज भाव में बस इतना ही कहती थीं – “बस इतना ही? और डाँट लो विनोद”

और मैं उसे hug कर लेता था। ऐसा ना जाने कितनी बार हुआ होगा। फिर धीरे-धीरे वो भी मेरी सबसे अच्छी दोस्त, सबसे प्यारी बहन, सबसे प्यारी बच्ची और सबसे प्यारी माँ बन गई। मुझे याद नहीं आता कि उस दौर में भी और आज तक भी और ताउम्र मैंने किसी लड़की से इतना निश्चल, इतना निःस्वार्थ प्यार किया होगा और मुझे ही नहीं, पूरी टीम को भी पता था कि वो भी मुझे उतना ही निश्चल प्यार करती है और अंत तक करती रही। कुछ ही वक्त में वो पूरी टीम की god mother हो चुकी थी। मतलब टीम और मेरे बीच की दीवार। टीम के किसी भी सदस्य ने कोई बहुत बड़ी गलती की है और अगर उसे मैंने दो दिन के लिए छुट्टी पर भेज दिया है तो मामला सीधे विभा के पास पहुँच जाता था और थोड़ी देर बाद जब मैं देखता था कि विभा मेरे केबिन के बाहर खड़ी है तो मुझे समझ आ जाता था कि अब मुझे अपना फ़ैसला बदलना पड़ेगा।

“Nhi Vinod .. ye galat bat hai”

ये था विभा का रुतबा.. जो शायद उस वक़्त अपने जीवन का पहला टेलीविजन जॉब कर रही थी। शो में कोई गलती हो जाती थी तो मुझे बहुत ग़ुस्सा आता था। टीम का कोई ना कोई सदस्य डाँट खा ही जाता था बेचारा और तब विभा बन जाती थी Agony aunt!

“अरे विक्रांत, विनोद तो ऐसे हैं, उनकी बात का बुरा नहीं मानते, अभी देखना आ कर hug करेंगे”

“विनोद ने अभी तुम्हें डाँटा है ना अलका, देखना थोड़ी देर के बाद सबके सामने सॉरी बोलेंगे”

“तुमने डाँट नहीं खाई है पराग, प्रसाद खाया है, अब तुम लाइफ में कुछ कर लोगे”

“तुम्हें ज़्यादा डाँट पड़ी है ना अनिमेष, देखना आज रात तुम्हें दारू पिलाएँगे”

पूरी टीम को मुझे लेकर जो भी छोटी मोटी, खट्टी मीठी शिकायतें होती थी, वो सारा भार सिर्फ़ और सिर्फ़ विभा के कंधों पर था।

विभा की शादी हम सबके लिए एक अविस्मरणीय पल था। मुझे आज भी याद है.. मैंने फिल्मी अंदाज़ में अपनी टीम से कहा था- “हमारी लड़की की शादी है, पैसा पानी की तरह बहा देंगे”

पैसे तो ख़ास होते नहीं थे लेकिन पूरी टीम उसकी शादी की तैयारियों में जुट गई थी। हर किसी ने कुछ न कुछ ज़िम्मेदारी ले ली थी और जब विभा की विदाई हुई तो मुझे याद है .. हम सबकी आँखों में आँसू थे.. टीम का एक-एक सदस्य रो रहा था। जैसे घर की बेटी जा रही हो।

फिर विभा मुंबई चली गईं। एकाध साल बाद मैं भी 2004 में Star News मुंबई चला गया। विभा एक बार फिर मेरी टीम का हिस्सा थी लेकिन उसके तेवर जस के तस थे। वो कभी मुझ से सवाल पूछ सकती थी। कभी भी मुझे डाँट सकती थी। उस दौर में वो बर्फ बहुत खाने लगी थीं। ये नई आदत मुझे बड़ी अजीब लगी। उसका पूरा गिलास बर्फ से भरा होता था। कितनी बार उसे समझाया। गिलास उठाकर फेंक भी दिया। फिर वो कहती थी- खाने दो ना विनोद। मुझे अच्छा लगता है।

ना जाने कितनी बार विभा ने अपने मुंबई वाले घर में कश्मीरी खाने के लिए बुलाया लेकिन काम की व्यस्तता ऐसी थी कि कभी जा ही नहीं पाए।

“विनोद घर आइए ना। कपिल आपको याद करते हैं “ “विनोद घर आओ ना। घर में ख़ुशी आई है”

मेरे जीवन का ये सबसे बड़ा दुर्भाग्य और दुख है कि मैं विभा की ये इच्छा कभी पूरी नहीं कर सका। इसके बाद हमारे रास्ते अलग हो गए। मैंने टीवी छोड़ दिया लेकिन विभा तो टीवी की मल्लिका थी। Star News ( बाद में ABP News ) के पॉपुलर शो “सास बहू और साज़िश” की प्रोड्यूसर, सर्वेसर्वा। लेकिन हम दोनों लगातार संपर्क में रहे। मिलते रहे।

कोई जन्मदिन ऐसा नहीं गया, जब विभा ने फ़ोन ना किया हो। आख़िरी मुलाक़ात मुझे याद नहीं.. लेकिन शायद एक साल पहले होगी .. मुंबई में.. और आख़िरी संवाद… आख़िरी संवाद.. या संवादहीनता ..

इसका तो मुझे मरते दम तक अफ़सोस रहेगा.. पिछले महीने उसने मुझे तीन चार बार फ़ोन किया… उन दिनों मेरी मनोदशा ऐसी थी कि मैं किसी से भी बात नहीं कर रहा था.. मैंने विभा का भी फ़ोन नहीं उठाया और ना ही कॉलबैक किया.. फिर उसने एक मैसेज भेजा था मुझे.. आख़िरी मैसेज –

“ I am so disturbed with your certain posts. aap kahan ho ? Talk to me. Ye galat bat hai. Love you”

काश मैंने विभा का फ़ोन उठाया होता। काश मैंने विभा के मैसेज का जवाब दिया होता। हम इंसानों की सबसे बड़ी समस्या ये है कि जो हमें प्यार करते हैं, उन्हें हम taken for granted ले लेते हैं और सोचते हैं कि ये तो ही .. कहाँ जाएगा .. कहाँ जाएगी? फ़ोन कर लूँगा जल्दी लेकिन फिर परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि ना मैं विभा को कॉल कर सका, ना मैसेज का जवाब दे सका। सॉरी विभा।

विभा के जाने से मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत क्षति पहुँची है। ऐसा लग रहा है कि मेरे शरीर का एक हिस्सा टूट चुका है। मुझे निश्चल, निःस्वार्थ प्यार करने वाला एक इंसान दुनिया में कम हो गया है। मेरी फ़िक्र करने वाला एक इंसान दुनिया में कम हो गया है।

मुझे कभी भी डाँट सकने वाला एक इंसान दुनिया में कम हो गया है – “Nhi Vinod. Ye galat bat hai”

लेकिन इस बार मैं कहूँगा – “Nhi Vibha . Ye galat bat hai” Love you Vibha


उज्जवल त्रिवेदी-

ऐसे शुरू हुआ था स्टार न्यूज़ पर सास बहू और साजिश

साल 2004 तारीख़ चार अक्तूबर की बात है उन दिनों मैं स्टार न्यूज़ में काम करता था – हमारे नये संपादक जी शाज़ी साहब ने एक मीटिंग रखी मैं, विभा कौल भट्ट और कुछ साथी जो entertainment team में काम कर रहे थे – उनको बुलाया और पूछा कि आने वाले दिनों में entertainment में क्या ख़ास होने वाला है तो उनको बताया गया कि सात दिन बाद ग्यारह अक्टूबर को अमिताभ बच्चन का जन्मदिन है – उन्होंने बोला ठीक है तो उस दिन हम एक शो लांच करेंगे नाम होगा सास बहू साजिश –

ये सुनते ही मैं विभा और बाक़ी सब लोग एक दूसरे के चेहरे तकने लगे कि ये क्या होने वाला है – क्या होगा इस शो में – फिर बताया गया कि टी वी सीरियल्स के चर्चित चेहरों के इंटरव्यू और खबरें हमें दिखानी होंगी –

विभा को ये ज़िम्मा सौंपा गया। हम सब काम में लग गये। मुझे याद है पहला इंटरव्यू स्मृति इरानी का लाइनअप किया गया। मैं उनसे मिलने गोरेगांव पश्चिम के एक लोकेशन पर गया जो फ़िल्मिस्तान के पास था – स्मृति ईरानी हैरान थी क्योंकि उन दिनों कोई टीवी चैनल टी वी सितारों की शूटिंग कवर नहीं करता था।

उस दौर में हमने कई सारे कवरेज किये – मैंने विभा के साथ जब वो शो शुरू किया था तो अंदाज़ा भी नहीं था कि दोपहर के स्लॉट में शुरू हुआ ये शो इतनी बुलंदियों तक जायेगा।

आज विभा की बातें हो रही हैं तो ये सब भी बहुत याद आ रहा है। हालाँकि कुछ समय बाद मेरा स्टार न्यूज़ से साथ छूटा तो सास बहू और साजिश से भी साथ छूटा लेकिन विभा कौल भट के साथ काम करने के अनुभव ने बहुत कुछ सिखाया – आगे भी बात करता रहूँगा कि और क्या क्या सीखा विभा के साथ।

सच में बहुत याद आ रहे हैं वो पुराने दिन। यहां तस्वीर में आप विभा को उनके पति कपिल भट्ट के साथ देख रहे है।

हर साल विभा तेरह अक्टूबर को अपना जन्मदिन मनाती थी और उससे ठीक दो दिन पहले उस शो का जन्मदिन होता था जिसने टी वी मनोरंजन की दुनिया को एक नयी परिभाषा दी। कुछ लोग सच में अपने काम से ऐसी पहचान बना जाते हैं जिसकी मिसाल आने वाली कई पीढ़ियाँ देती रहती हैं। ऐसी थी विभा की शख़्सियत।


शिवेंद्र कुमार सिंह-

अभी इस बात को मानने में मुझे बहुत समय लगेगा कि विभा कौल भट्ट हमारे बीच नहीं हैं। सुबह से दर्जनों लोगों के फोन आ चुके हैं। जितनी जानकारी मेरे पास थी सभी को दे चुका हूँ- खुद अपने मुंह से कई बार कह चुका हूँ कि विभा जी नहीं रहीं। लेकिन अब भी खुद को यकीन नहीं दिला पा रहा हूँ।

25-26 बरस पहले इलाहाबाद अमर उजाला छोड़कर टीवी की नौकरी के लिए दिल्ली आया था। टीवी पर मेरी पहली स्टोरी विभा और लवीना जी ने बनवाई थी। विभा और लवीना का जन्मदिन भी एक ही दिन होता है। आज लवीना को ये बताते हुए मन बैठ गया कि विभा हमें छोड़कर जा चुकी हैं।

विभा का तकिया कलाम था- कान के नीचे लगाऊंगी एक। आज जी न्यूज और एबीपी के कई साथियों के कान में ये लाइन गूंज रही है। मैं बाद में विभा को माँ कहता था। वो थी भी माँ ही जैसी, बड़ी बहन जैसी।

दूसरों की खुशी में खुश होने वाली और दूसरों की तकलीफ़ में परेशान होने वाली… विभा ने छोटे बड़े अपने सभी सहकर्मियों को बहुत प्यार से रखा – बप्पा आप उन्हें भी बहुत प्यार से रखना.. लव यू विभा, वी विल मिस यू ऑलवेज

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