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आज के अखबार : पचपन लाख की आबादी वाले ओमान को करोड़ों के निर्यात का सपना और सरकार का प्रचार

संजय कुमार सिंह

दैनिक भास्कर की लीड आज मेरे नौ अखबारों में से किसी में नहीं है। लीड दिल्ली के संकट पर है। फ्लैग शीर्षक से बताया गया है कि दिल्ली में पांचवें दिन भी हवा बेहद खराब रही, एक्यूआई 373 रहा। मुख्य शीर्षक है, (इस कारण) स्मॉग यानी कोहरा….. (और एक दिन में) 27 उड़ानें रद्द, 80 ट्रेन और 100 विमान लेट। अखबार ने बताया है कि प्रदूषण कई कारणों से है और इनमें ट्रैफिक सबसे बड़ी वजह है। अखबार ने लिखा है कि विभिन्न कारकों के साथ एनसीआर के जिले भी प्रदूषण में योगदान दे रहे हैं। और समस्या सिर्फ दिल्ली में नहीं, पूरे एनसीआर में है। सच्चाई यह है कि देश के कई शहरों में है। प्रधानमंत्री संसद सत्र के दौरान विदेश में हैं, इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार क्या कर रही है, नहीं बताया गया है लेकिन हाल में दिल्ली सरकार के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा था, ‘दिल्ली में प्रदूषण बढ़ाने के लिए आम आदमी पार्टी जगह-जगह कूड़ा जला रही है’। सिरसा ने यह भी कहा कि ये आज की बीमारी नहीं है। ये पुरानी सरकारों की दी हुई बीमारी है, जिसपर हम काम कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रदूषण का मामला सिर्फ दिल्ली का नहीं है तो कार्रवाई केंद्र सरकार को (भी) करनी है और केंद्र में वर्षों से भाजपा की ही सरकार है लेकिन दोष आम आदमी पार्टी के सिर मढ़ने की कोशिश चल रही है। यह एंटायर पॉलिटिकल साइंस की राजनीति और उसका स्तर हो सकता है। मीडिया का एक वर्ग इसका प्रचार तो कर ही रहा है। मोदी सरकार की योग्यताओं और उपलब्धियों का प्रचार करता रहता है। भले देश हित से उनका कोई नाता न हो या किसी को बताया नहीं गया हो। आज भी अखबारों में यही सब है।

दैनिक भास्कर की लीड, शीर्षक के मुकाबले मौसम पर अमर उजाला की आज की खबर टॉप पर सात कॉलम में है, मौसम का सबसे ठंडा दिन…घने कोहरे में लिपटी राजधानी। यह शीर्षक आभास देता है कि ठंड के कारण कोहरा है। इस खबर के साथ, डेढ़ कॉलम में प्रदूषण पर सख्ती के तहत सूचना है, बिना पीयूसी वाले वाहनों के रिकार्ड 3746 चालान कटे। जाहिर है, प्रदूषण में जनता का भी योगदान है। इतने लोगों ने शहर में प्रदूषण ज्यादा होने की खबरों के बावजूद अपने वाहनों का प्रदूषण नियंत्रण में रखने की परवाह नहीं की और सरकार तब सक्रिय हुई जब खबरों से दबाव बना। वह भी तब जब सक्रियता का मतलब वसूली या कमाई है। कुल मिलाकर यह समाज और व्यवस्था का मामला है। सरकार प्रदूषण नियंत्रित करने के उपाय तो नहीं ही कर रही है हम अपना योगदान भी नहीं कर रहे हैं। दैनिक भास्कर की खबर है, सख्ती से एक दिन पहले 76 प्रतिशत तक ज्यादा पीयूसी बने। खबर के अनुसार, 17 दिसंबर को 31197 पीयूसी बने जबकि 16 दिसंबर को 17732  ही बने थे। एक हफ्ते का औसत लगभग इतना ही है। वहीं पिछले दो महीने में बिना पीयूसी वाहन चलाने पर 1.56 लाख से अधिक चालान किए गए। जाहिर है, प्रशासन अपना काम कर रहा है पर नागरिक ही बेपरवाह हैं। प्रशासन का यह काम भले कमाई के कारण या कमाई के लिए होता हो पर हो रहा है तो दोष जनता का भी है। जो भी हो, यह तथ्य है कि इस स्थिति में भी इतने लोग बिना प्रदूषण प्रमाणपत्र के वाहन चलाते चालान किए गए। यह सामाजिक स्थिति है जो रेखांकित करने लायक है।     

ऐसे में आज टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड और हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड एक ही है। खबर यह है कि गैर बीएस 6 वाहनों पर दिल्ली में प्रतिबंध का नतीजा यह हुआ कि सड़कों पर अव्यवस्था, भ्रम और भीड़ रही। लेकिन यह प्रदूषण कम करने के लिए किए जाने वाले उपायों में एक या बहुत छोटा हिस्सा है। ऐसे में प्रदूषण कम करना बहुत बड़ा काम है लेकिन जरूरी है तो सरकार के साथ मीडिया और आम लोगों को भी ध्यान देना होगा और यह मीडिया के सक्रिय हुए बिना नहीं हो सकता है। अभी की स्थितियों में नहीं लगता है कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग इस मामले में पर्याप्त गंभीर है। नागरिकों के तो कहने ही क्या। दूसरी ओर, तथ्य यह भी है कि प्रदूषण से समस्या उन्हें ही है और सख्ती किए जाने या कोई भी उपाय किए जाने का नुकसान भी उन्हें ही होना है। ऐसे में यह काम यूं ही नहीं होने वाला है और काफी सोच-विचार की जरूरत है जो नहीं हो रहा है। दूसरी ओर, सरकार का प्रचार जारी है। इंडियन एक्सप्रेस समेत कई अखबारों की लीड आज ओमान के साथ भारत के मुक्त व्यापार करार की खबर है। अमर उजाला और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड भी यही है। दूसरे अखबारों में भी पहले पन्ने पर है लेकिन मुद्दा यह है कि निर्यात तो हम तब करेंगे जब उत्पादन होगा और अभी तक ऐसी समस्या तो नहीं सुनी गई। अमेरिका ने जब टैरिफ लगाया, निर्यात महंगा हुआ तो हम स्वदेशी की बात करने लगे थे।

देश में हालत यह है कि लोग प्रदूषण से परेशान हैं। बीमारियां बढ़ रही हैं। दिल्ली के भाजपाई मंत्री इसके लिए पहले की सरकारों को दोषी ठहरा रहे हैं और इंडियन एक्सप्रेस में खबर है कि, दिल्ली के सबसे बड़े सरकार अस्पताल में इस समस्या से निजात दिलाने वाली जरूरी दवाइयां नहीं है। अखबार ने बताया है कि लोगों से दवाइयां बाहर से खरीदने के लिए कहा गया है। खबर के साथ दवाइयों के काउंटर के बाहर लगी कतार या भीड़ की तस्वीर भी है। लेकिन दिल्ली के अखबारों के लिए खबर, 55 लाख की आबादी वाले ओमान से मुक्त व्यापार करार है। मुझे लगता है कि जिन अखबारों ने सिरसा का पिछला बयान छापा था उन्हें इस खबर को भी उतनी ही प्रमुखता से छापना चाहिए और सिरसा से इसका कारण पूछ कर उनका पक्ष भी रखना चाहिए। पर मीडिया यह काम नहीं करता है और यही समस्या है या मेरी चिन्ता का विषय। क्योंकि 56 ईंची सीने से लेकर विश्वगुरू होने तक का प्रचार ही है और वह काम में नहीं दिखता है। दूसरी ओर वोट चोरी के आरोपों में दम नहीं दिखता है और इसे चुनाव आयोग को बदनाम करने की कोशिश कहा जाता है जबकि चुनाव आयोग सरकारी सुरक्षा और कवच में आंख, कान, नाक, मुंह सब बंद किए बैठा है। सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेना तो छोड़िए शिकायतों पर भी चिन्तित नहीं है या कार्रवाई की जरूरत नहीं समझ रहा है। कार्रवाई तो इस बात पर भी होनी चाहिए कि दवाइयों के लिए इतनी भीड़ या लाइन क्यों लगती है, कैसे नहीं लगेगी।

देशबन्धु, नवोदय टाइम्स और दि एशियन एज की लीड जी राम जी विधेयक संसद में पास होने की खबर है जबकि हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक है, विधेयक पास किए जाने का विरोध। देशबन्धु का शीर्षक है, भारी विरोध के बीच विधेयक पास जबकि नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, जी राम जी को संसद से मंजूरी। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, Centre rams through RAM G हिन्दी में इसके लिए जो सबसे करीबी अभिव्यक्ति होगी वह है, केंद्र ने (इस वाले) राम जी को पार करा लिया या बचा ले गई। शीर्षक के इन उदाहरणों से मैं बताना चाहता हूं कि अक्सर सरकार की तारीफ तो होती ही है उनसे जनता को होने वाला लाभ भी बताया जाता है लेकिन आलोचना नहीं होती है। तारीफ का मौका हो तो लपक लेना भी एक विशेषता है जैसे, अमर उजाला ने लिखा है, भारत ओमान समझौते से, अरबों का शुल्क मुल्क निर्यात होगा। 55 लाख की आबादी के लिए कितना आयात होगा राम जानें। तथ्यात्मक रूप से यह भले सही हो पर इधर का निर्यात उधर हो जाए तो क्या लाभ और क्या निर्यात के लिए नया उत्पादन होगा। स्थितियां ऐसी नहीं हैं और मुझे नहीं लगता है कि इससे ऐसा लाभ होगा जैसा प्रचार है। जाहिर है कि होना होता तो सभी अखबारों में खबर होती, सब बताते लेकिन नहीं बताया है तो कारण यह भी हो सकता है। एसआईआर की जबरदस्ती पर जब सबने समर्पण कर दिया है और मीडिया या सरकार ने भी यह नहीं बताया है कि एसआईआर में साल 2003 क्यों महत्वपूर्ण है तब द हिन्दू की लीड एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट की खबर है। इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा है (आदेश या निवेदन है, समझना मुश्किल है), भिन्न राज्यों में जमीनी वास्तविकताओं पर विचार किया जाए। संसद में, सुप्रीम कोर्ट में और सार्वजनिक तौर पर जब कई बार कहा गया है कि चुनाव आयोग अपने स्तर पर इस तरह एसआईआऱ नहीं कर सकता है, कानून नहीं है और बिहार में एसआईआर के दौरान नियमों का उल्लंघन किया गया है, शुद्ध मतदाता सूची में ढेरों खामियां हैं और देश या जनता को नहीं भाजपा को लाभ हुआ है तब भी एसआईआर चल रहा है तो यह खबर है भी और नहीं भी। अकले द हिन्दू ने इसे लीड बनाया है।  

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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