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आज के अखबार : अरावली पर्वतमाला की परिभाषा, ‘पहाड़ी वह भू-आकृति है’ लिखना-कहना गौरतलब है

संजय कुमार सिंह

अरावली मामले में केंद्र सरकार विवाद में है। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक यही कहता है। तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, अरावली पर खनन के नए पट्टे नहीं दिए जाएंगे : विवादों के बीच केंद्र सरकार (ने कहा)। अंग्रेजी में शीर्षक है, No new Aravalli mining leases: Centre amid row इसके साथ सिंगल कॉलम की खबर है, परिभाषा पर केंद्र और राज्यों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस (SC notice to Centre,states on definition)। आज के अखबारों की खबर यही है कि कोई भी अखबार इस बात को साफ-साफ नहीं कहते। कांग्रेस के जयराम रमेश ने परिभाषा बदलने के लिए जोर लगाने पर सवाल किया है। हिन्दुस्तान टाइम्स में मुख्य खबर के साथ छपी सिंगल कॉलम वाली खबर कहती है, अरावली को परिभाषित करने का विवादित मुद्दा 7 जनवरी को फिर खुलेगा। सुप्रीम कोर्ट पूर्व वन अधिकारी आरपी बलवान की याचिका पर सुनवाई करेगी। टीएन गोदावरमन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और चार राज्यों को नोटिस जारी किए गए हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की विज्ञप्ति पर आधारित है और इस प्रकार है, …. मंत्रालय ने कहा कि उसने इंडियन काउंसिल ऑफ़ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन (आईसीएफआरई) को पूरे जियोलॉजिकल रिज में सस्टेनेबल माइनिंग के लिए एक मैनेजमेंट प्लान तैयार करने का निर्देश दिया है, जो गुजरात से नेशनल कैपिटल रीजन तक फैला हुआ है। ये निर्देश सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर के फैसले को लागू करते हैं, जिसमें प्लान तैयार होने तक नई लीज़ पर रोक लगाने की ज़रूरत है, और इसका मकसद पूरी रेंज में सभी अनरेगुलेटेड माइनिंग एक्टिविटीज़ को रोकना है।

जाहिर है, इस मामले में सरकार यही खबर छपवाना चाहती थी और संभवतः इसी विज्ञप्ति में कहा गया है और इसीलिए हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर भी कहती है, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने बुधवार को हरियाणा, राजस्थान और गुजरात को अरावली रेंज में नई माइनिंग लीज़ पर सख्त रोक लगाने का निर्देश दिया। विशेषज्ञों ने कहा कि यह निर्देश नवंबर में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का पालन करने का हिस्सा है, जिसमें इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला के लिए एक व्यापक प्रबंधन ब्लूप्रिंट को अंतिम रूप दिए जाने तक विस्तार को रोकने के लिए कहा गया था। शीर्षक मैं पहले बता चुका हूं और जाहिर है, शीर्षक यह नहीं है – अलग है और गलत नहीं है। यह इस मामले में सरकार की स्थिति बताता है जो अब नहीं बताई जाती है। अब सरकारी विज्ञप्तियां अमूमन किसी अगर मगर के बिना जस के तस छप रही हैं और सरकार का प्रचार हो रहा है। इस तरह, सब चंगा सी के बावजूद प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना की सीएजी रिपोर्ट उसमें घपले की खबर देती है जो अखबारों में नहीं के बराबर छपी है। कुछ साल पहले एक और मामले में सीएजी की प्रतिकूल खबर आई थी। वह भी एक ही अखबार में छपी थी बाद में पता चला कि संबंधित अधिकारी का तबादला कर दिया गया था। हमेशा की तरह उसे प्रशासनिक बताया गया। इस तरह मैं यह बताना चाहता हूं कि मुख्य धारा की मीडिया का बड़ा वर्ग न सिर्फ सरकार के प्रचार में लगा है उसके घपले-घोटालों की खबरों को ध्यान ही नहीं देता है। वरना, बहुचर्चित प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में गड़बड़ी की खबरें पहले भी आती रही हैं और इसके तहत प्रशिक्षण देने के लिए खोले गए केंद्र बंद होने, काम या पैसे न मिलने की शिकायतें आती रही हैं और पहले तो खबर नहीं ही हुई अब भी इन पुराने तथ्यों को मिलाकर कौशल विकास के नाम पर देश के साथ की गई धोखाधड़ी और भारी राशि के गोलमाल पर कोई विशेष खबर मुख्य धारा की मीडिया ने नहीं की है। दूसरी ओर, सरकार ने मनरेगा में घोटाले के आरोप में गरीबों को काम देने की गारंटी योजना को ठीक से लागू नहीं होने दिया और अब तो उसकी शर्तें बदल कर उसे खत्म करने का काम किया है। मुझे लगता है कि शर्तें बदलने से भविष्य में इस योजना के जरिए राज्य और केंद्र सरकारों के लिए मिलकर कमाना संभव होगा पर वह बाद की बात है।

अरावली पर सरकार की विज्ञप्ति और जमीनी स्थितियों के मद्देनजर द हिन्दू का शीर्षक भी दिलचस्प है। केंद्र ने राज्यों से कहा कि अरावली मामले में सर्वोच्च अदालत के आदेश को ‘लागू’ करे (Centre tells States to ‘enforce’ apex court orders on Aravalis)। खबर इस प्रकार है,  पर्यावरण कार्यकर्ताओं की आलोचना और इन आरोपों के बीच कि अरावली पर्वतमाला के बड़े हिस्से को खनन के लिए खोला जा सकता है, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने बुधवार को हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के मुख्य सचिवों को निर्देश जारी किए कि वे सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश को लागू करें जो एक मैनेजमेंट प्लान फाइनल होने तक पूरे क्षेत्र में नई माइनिंग लीज देने से रोकता है। इस क्रम में अमर उजाला की खबर सरकारी कार्रवाई का अच्छा प्रचार करती है। शीर्षक है, सभी राज्यों में अरावली क्षेत्र में खनन पट्टे निरस्त, संरक्षित क्षेत्र का भी बढ़ेगा दायरा। उपशीर्षक है – केंद्र सरकार ने कहा, प्रतिबंध पूरे अरावली भूभाग पर लागू होगा, पर्वतमाला की रक्षा व अवैध खनन को रोकना मकसद। अमर उजाला की लीड के साथ रिवर्स शीर्षक वाली एक खबर है, 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को परिभाषा से बाहर रखने का विरोध। इसमें बताया गया है, नवंबर में पर्यावरण मंत्रालय के नेतृत्व वाली समिति की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और अरावली पर्वतमाला की एक समान कानूनी परिभाषा को स्वीकार किया। इस परिभाषा के अनुसार, अरावली पहाड़ी वह भू-आकृति है, जो एक दूसरे से 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित हों। जिसकी ऊंचाई उसके आसपास के भूभाग से कम से कम 100 मीटर अधिक हो। इस खबर में पहले पर्वतमाला और फिर ‘पहाड़ी वह भू-आकृति है’ गौर करने लायक है। कहने की जरूरत नहीं है कि खेल साफ दिखाई दे रहा है। इंडियन एक्सप्रेस ने कल की अपनी खबर में इसे स्पष्ट किया था। उसके साथ छपी यह तस्वीर आज इस खबर के साथ गौर करने लायक है।

इसमें ऊपर लिखा है, अदालत को एमिकस का नक्शा हरी और नीली रेखाओं के बीच का क्षेत्र 100 मीटर के नियम के तहत सुरक्षा खो देगा। मंत्री जी ने इसे दो प्रतिशत ही कहा था पर तस्वीर से आप अनुमान लगा सकते हैं कि इतने बड़े क्षेत्र में खनन की अनुमति से कितने लोगों की कितनी कमाई हो सकती है और इससे मिलने वाले चंदे में कितने प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। सरकार को अगर ऐसे काम करने (और इससे कमाने) का अधिकार है तो आम आदमी पार्टी कैसे भ्रष्ट थी। यहां दिलचस्प यह है कि इस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से ऐसा करवा लिया है। आम आदमी पार्टी ने तो शराब नीति बदल कर अगर खेल किया भी हो तो अपने ही अधिकार क्षेत्र में थी। हालांकि वह अलग मुद्दा है।

अमर उजाला की खबर के अनुसार, पर्यावरणविद बोले-बढ़ेगा असंतुलन – अरावली पर्वतमाला की 100 मीटर ऊंचाई वाली नई परिभाषा का पर्यावरणविद लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे अरावली का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है। साथ ही, खनन बढ़ने से जल संकट, मिट्टी कटाव और पारिस्थितिकी असंतुलन बढ़ सकता है। अरावली 650 किमी में फैली 2 अरब साल पुरानी पर्वत माला है, जिसका प्रसार दिल्ली से राजस्थान और गुजरात तक है। अरावली पर्वतमाला दो या दो से अधिक ऐसी पहाड़ियों का समूह है। इस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को इस परिभाषा से बाहर करने की स्वीकृति दे दी है।

इंडियन एक्सप्रेस में अरावली पर्वतमाला पर आज पहले पन्ने की जो खबर है उसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में जिस बात पर हां कहा है उसी पर 2010 में ना कहा था। एक अन्य खबर के अनुसार, कांग्रेस के जयराम रमेश ने पूछा है, सरकार पवर्तश्रृंखला की घातक तौर पर दोषपूर्ण पुनर्परिभाषा पर क्यों जोर दे रही है। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर को स्पष्ट करते हुए बताया है  कि सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की 100 मीटर वाली परिभाषा को खारिज कर दिया था। आज की खबर का उपशीर्षक है, एफएसआई ने कोर्ट के निर्देश पर राजस्थान में 3 डिग्री के स्लोप का नियम बनाया था। कहने की जरूरत नहीं है कि इस क्षेत्र को जैसा है वैसा ही नहीं रहने दिया गया तो बीच की जगहों को खनन के बाद समतल करके फार्म हाउस बनाने के लिए बेचा भी जा सकता है और अच्छी कीमत मिल सकती है। समुद्र के किनारे जमीन के उपयोग और पहाड़ों में खनन के बाद भूमि के ऐसे उपयोग के खुलासे भी इंडियन एक्सप्रेस ने किए हैं। आंध्र प्रदेश में विशाखापत्तनम के पास रूशीकोंडा हिल्स पर ऐसा हो चुका है। सरकारें जनहित में या निजी लाभ के लिए अथवा किसी को लाभ पहुंचाने के लिए ऐसा करती रही होंगी लेकिन भाजपा के राज में यह कुछ ज्यादा ही लग हाँ है। इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर के गहरे मायने हैं और यह सब निष्पक्ष व स्वतंत्र पत्रकारिता से ही उजागर हो सकता है। भाजपा राज में यह सब न सिर्फ बंद है, इमरजेंसी से भी बुरी स्थिति में है। आज जब मैं पुरानी खबरों में रूसीकोंडा हिल्स की कहानी ढूंढ़ रहा था तो एक खबर मिली। इसमें कहा गया है,  टीडीपी के नेतृत्व वाली एनडीए गठबंधन सरकार जल्द ही विशाखापत्तनम में विवादित रूशीकोंडा टूरिज्म रिसॉर्ट्स पर आखिरी फैसला लेगी। मंत्रियों पय्यावुला केशव और कंदुला दुर्गेश ने बुधवार को कहा कि “जो भी फैसला लिया जाएगा, वह जनता के फायदे को ध्यान में रखकर लिया जाएगा, साथ ही राज्य के लिए स्थायी रेवेन्यू भी जेनरेट किया जाएगा।”

टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड का शीर्षक है, अरावली में खनन मुक्त क्षेत्र बढ़ाए जाएंगे : केंद्र। राज्यों को निर्देश दिया गया कि नए पट्टे जारी न करे। खबरों के साथ खास बातों के बॉक्स का शीर्षक है, ऐक्टिवस्ट्स के अनुसार यह नई बोतल में पुरानी शराब का मामला है। इसमें बताया गया है कि खनन के नए पट्टों पर पूरी तरह प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर के आदेश के अनुसार है। जाहिर है, सरकार ने इसे लागू करने में एक महीने से ज्यादा निकाल दिए और जैसा जयराम रमेश ने कहा है, सरकार दोषपूर्ण परिभाषा को लागू करने पर जोर दे रही है। देशबन्धु की खबर के अनुसार, जयराम रमेशन ने एक्स पर लिखा है, अरावली मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव लोगों को  गुमराह कर रहे हैं। उन्होंने यह भी पूछा है, उच्चतम न्यायालय ने जो व्यवस्था दी थी उसमें  किस वजह से बदलाव किया जा रहा है। आज जब ज्यादातर अखबारों में अरावली मामले में सरकार का पक्ष लीड है तब देशबन्धु ने कांग्रेस के सवाल को प्रमुखता दी है जो सामान्यतौर पर ज्यादातर अखबारों में खबर होनी चाहिए थी। सरकार का पक्ष तो लोग समझ ही रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में जिस काम से मना कर दिया था वह काम 2025 में कराने की कोशिश की जा रही है। इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर यही है। दि एशियन एज में आज अरावली पर्वत माला की खबर नहीं है जबकि द टेलीग्राफ में अंदर होने की सूचना भर है। नवोदय टाइम्स में यह पहले पन्ने पर चार कॉलम में है। टॉप की इस खबर का शीर्षक है, केंद्र ने अरावली के नए खनन पट्टों पर प्रतिबंध लगाया। अखबार ने लिखा है कि इससे पहले कांग्रेस (के जयराम रमेश) ने उसपर निशाना साधा। हेडलाइन मैनेजमेंट की इन जरूरी खबरों में आज मेट्रो की तीन नई लाइनों की मंजूरी वाली खबर भी रह गई है। यह नवोदय टाइम्स और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड है। द टेलीग्राफ की लीड बलात्कार के मामले में कुलदीप सेंगर की सजा निलंबित होने और जमानत मिलने की खबर है। हालांकि, उनपर और भी मामले हैं तथा सबमें जमानत नहीं मिलने तक सेंगर जेल से बाहर नहीं आ सकता है।   

फोटो मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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