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दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट गाली गलौज प्रकरण: जनता तो जनता वकील लोग भी गुस्से में हैं, आत्ममंथन करे सर्वोच्च न्यायालय!

Collage of a formal meeting: two judges at a bench on top left, audience seated on top right, and attendees raising papers in a conference room below.

प्रशांत टंडन-

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिकाकर्ता द्वारा कागज़ उछालने और चीफ़ जस्टिस को अपशब्द कहने की घटना निंदनीय है, जजों ने जिस तरह संयम बरता वो सराहनीय है.

लेकिन वक़्त है कि सुप्रीम कोर्ट आत्ममंथन भी करे.

“बेरोजगार युवा कॉकरोच की तरह, कुछ मीडिया में गए कुछ RTI एक्टिविस्ट बने”
“लुधियाना जाकर तीन चार स्वेटर और बेच लो”
“इस बार नहीं तो अगली बार वोट दे देंगे”

इस तरह के तमाम ऑबसर्वेशन और जजमेंट्स इशारा करते हैं कि देश के आम नागरिक के प्रति कोर्ट का रवैया पिछले कुछ सालों में बदला है.

किसी मुकदमे में सरकार या बीजेपी का हित जुड़ा है उसका फैसला क्या आयेगा इसका आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है.

अब तृणमूल कांग्रेस में दलबदल मामले को ही लीजिये. संविधान में स्पष्ट है संसदीय दल के किसी बागी गुट का विलय नहीं हो सकता.

मामला स्पीकर ओम बिड़ला के पास विचाराधीन है.

तृणमूल से निकले सांसदों ने मोदी सरकार को समर्थन दिया है तो ओम बिड़ला इस अलग गुट को मान्यता दे ही देंगे.

जाहिर है तृणमूल कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट आयेगी और बेंच Subhash Desai Vs Principal Secretary, Govt of Maharashtra पर अपने ही फैसले को ताक पर रख कर स्पीकर के फैसले को सही ठहरा देगी – क्योंकि इसका उलटा फैसला बीजेपी को सूट नहीं करेगा.


सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ वह दुखद है। माननीय जस्टिस ने संयम और उदारता का परिचय देते हुए उचित ही कोई एक्शन नहीं लिया। यह बात तारीफ़ के क़ाबिल है। सुप्रीम कोर्ट का कंधा चौड़ा होना चाहिए और दिल बड़ा। इस बात को भी संज्ञान में लेना चाहिए कि समाज में न्याय को लेकर हताशा फैलती जा रही है। उसकी निष्पक्षता पर संदेह बढ़ता जा रहा है। अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं होती। कोई किसी का एनकाउंटर कर दे रहा है, किसी का घर गिरा दे रहा है। नागरिक अपने सवालों को लेकर कोर्ट की सीढ़ियाँ चढ़ता है लेकिन दीवारों से टकरा जा रहा है। इन्हीं कारणों से हताशा बढ़ती जा रही है। उम्मीद है, ऐसी घटना दोहराई नहीं जाएगी। यह भी कि न्याय व्यवस्था अपनी उदारता के साथ साथ विश्वसनीयता को बेहतर करेगी। उम्मीद की आख़िरी मंज़िल कोर्ट है और उस मंज़िल का बने रहना ही हताशा का इलाज है।
-रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार


धीरज फूलमति सिंह-

इस चित्र को देखिए – वकील जैसे दिखने वाले इस युवा का आक्रोश से भरा तमतमाया हुआ चेहरा .. सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों के लिए “मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट” जैसे बेहद कठोर शब्दों का उपयोग

Man in a dark suit speaks into two microphones while another man supports him in a courtroom setting.
prabal pratap

और फिर बुरी तरह आक्रोशित होकर डॉक्यूमेंट्स को बेंच की ओर उछालते हुए, चीफ जस्टिस को अभद्र व अश्लील गाली देते हुए कहना कि “दिखा देना उसे ..”

ऐसी ही घटना छह अक्टूबर 2025 को हुई थी, जब एक वृद्ध वकील ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अपना जूता उतारकर पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई पर फेंकने की कोशिश की। सुरक्षाकर्मी उसे पकड़कर कोर्ट से बाहर ले गए। बीसीआई ने उसका लाइसेंस सस्पेंड कर दिया और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने उसकी सदस्यता खत्म कर दी। बाद में पूर्व सीजेआई ने कहा कि आरोपी वकील के खिलाफ कोई भी कार्रवाई ना की जाए…

और अब … लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने प्रबल प्रताप नाम का ये व्यक्ति पेश हुआ। वह इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से अपनी रिट याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ अपील कर रहा था। उसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत अपनी अर्जी को निजी शिकायत मामले में बदलने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

जब मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो याचिकाकर्ता ने बेंच से अजीब बात कही, “मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट (न्यायिक सेवक), मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के एसीपी विकास नगर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दें।” जस्टिस विश्वनाथन ने पूछा, “आप मुझे आदेश दे रहे हैं? आप हमें आदेश दे रहे हैं?”

इसके बाद ही उक्त नाटकीय घटनाक्रम घटित हुआ! लाइव लॉ के अनुसार यह कोई “सामान्य व्यक्ति” है जो अपनी शिकायतों की लगातार अनसुनी होने से तंग आकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था पर यूनिफॉर्म को देखकर ऐसा नहीं लगता..

यह दृश्य दिखाता है कि आम आदमी से लेकर मेरिट के आधार पर काम करने वाले वकीलों तक की वर्त्तमान व्यवस्था में क्या हैसियत रह गई है! गिनती के “फिक्सर्स” के काम चुटकियों में हो जाते हैं और बाकी के प्रतिभाशाली वकील, जूनियर्स ..सभी झक मारते हैं!

निम्न स्तर से लेकर सर्वोच्च स्तर तक यही हो रहा है… इन सबके लिए जनता भी दोषी है जो सबको एक ही तराजू में तौलती है.. वह भी भ्रष्टों में ही अपना कल्याण खोजती है और भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा देती है..

जो भी हो, ये सामान्य व्यक्ति हो या कोई वकील पर इसका आचरण बेहद आपत्तिजनक था ..

दूसरी ओर ये दृश्य यह भी दिखाता है कि अन्याय सहते सहते, लंबी, थकाऊ तथा खर्चीली न्यायिक प्रक्रिया झेलते झेलते अब लोगों की सहनशक्ति जवाब दे चुकी है …

अब तक आम जनता कहती थी कि उनका सरकार पर भरोसा नहीं है, प्रशासन पर भरोसा नही है, मीडिया से भरोसा उठ गया है। भारत में नेता लोग तो हमेशा से ही अविश्वास के कठघरे में खड़े रहे है। अब जज भी सवालों और अविश्वास के घेरे में आ गए है।

न्यायालय का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील तक न्याय व्यस्था पर खुल कर सवाल उठा रहे है। अदालत में न्यायाधीश पर जुते फेंक रहे है, अपशब्द बोल रहे हैं, गाली दे रहे हैं। न्याय पालिका पर जब वकीलों का ही भरोसा नहीं रहा तो आम जनता अपनी फरियाद लेकर कहां जाये?

क्या अब लोगों का न्यायपालिका से भी विश्वास उठ गया है? आम जनता का भरोसा लोकतंत्र के चारों आधार स्तंभों से उठ गया है, तो अब भारत में लोकतंत्र कैसे बचेगा? लोकतंत्र की रक्षा कौन करेगा? अब वह दिन दूर नहीं जब जनता सड़कों पर उतर कर इनके गिरहबान पकड़ेगी।

लोगों की सहनशक्ति का लावा अब उबलने लगा है.. समय रहते इसके निराकरण का कोई उपाय नहीं किया गया तो प्रबल जनाक्रोश में सारी व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाएंगी!

मूल खबर…

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