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सुख-दुख

भड़ास को ब्रांड नहीं बनना था, व्यवस्था की छाती पर सवाल बनकर जीना था!

Tweet criticizing the 'Cockroach Janta Party'; logo shows a cockroach above the words 'Cockroach Janta Party' in orange and green.

यशवंत-

भड़ास4मीडिया का जिक्र आया है! पर इसे तो अच्छा नहीं बल्कि बुरा बनाने के लिए ही शुरू किया गया था। मीडिया मालिकों-संपादकों-प्रबंधकों के पत्रकारिता विरोधी अनैतिक गठजोड़ को ध्वस्त करने के लिए।

डील का शिकार बना अंधेरे में फेंक दी गई ख़बरों को रोशन करने के लिए। तो इसका अंजाम गुड कहाँ होना था। तो इसे ब्रांड कहाँ बनना था। भड़ास को तो मर मिटना था एक दिन। व्यवस्था द्वारा इसका गला घोंट दिया जाना था। हर रात आख़िरी रात है के अंदाज़ में जीते थे।

नार्मल लाइफ जी ही नहीं सकता था इतने पंगे इतने तनाव लेकर, इसलिए एब्नार्मल लाइफ जीने के वास्ते रोज़ शाम खूब पीते थे।

पर होता वो नहीं है जो हम ठान मान लेते हैं। विद्रोह के बरगद से अध्यात्म के कोंपल फूटेंगे, किसे पता था। भड़ास धीरे धीरे सिस्टम का पार्ट बनने लगेगा, किसे पता था। एक दिन शराब छूट जाएगी, किसे पता था। एक कामरेड अंततः भाग्यवादी हो जाएगा, किसे पता था।

भड़ास का होना एक नकारात्मक भाव भंगिमा का होना नहीं बल्कि मीडिया में डेमोक्रेसी और ट्रांसपेरेंसी के लिए लड़ने वालों का ज़िंदा होना है। अभी मीडिया में ही भड़ास निकाल पाना संभव है। ब्यूरोक्रसी और जूडिशीएरी बंद डिब्बे में बंद किए जा चुके हैं।

सत्ता से सवाल पूछना तो कबका बंद किया जा चुका है। तो नेता अब आलोचना सुनने सहने से ऊपर उठ चुका है। मतलब शेष तीनों स्तंभों में भड़ास की गुंजाइश खत्म है।

बस मीडिया ही है जहाँ थोड़ा स्पेस ज़िंदा है। इस स्पेस को मुहैया कराने के लिए भड़ास इसके लिए ज़िंदाबाद था ज़िंदाबाद रहेगा।

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भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

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