सीजीआई को गाली पड़ी, कार्रवाई नहीं कर पाए और खबर शेख हसीना समर्पण करेंगी। वह भी आज-कल नहीं दिसंबर में। फिर भी हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है। खबरों के इस अकाल में भी सीजेआई को गाली वाली खबर याद नहीं आई। कुल मिलाकर, अखबारों ने शेख हसीना के समर्पण की योजना से लेकर डबल इंजन वाले गुरुग्राम में 10 करोड़ की वसूली और मुठभेड़ में चार मौतों की खबर को लीड बनाया है। जाहिर है, मीडिया की तरह अदालतें भी सरकार की सेवा करती लगती हैं। संभव है, गुस्सा इसीलिए फूटा हो। हमेशा की तरह मीडिया ने इस खबर को भी महत्व नहीं दिया। हालांकि आज अदालतों की कई खबरें हैं और एक देश-एक चुनाव से 2029 की तैयारी की भी। लेकिन तब तक जनता के गुस्से का क्या होगा उसका कोई अंदाजा नहीं है।
संजय कुमार सिंह
आज अमर उजाला की सेकेंड लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट में अभद्रता, सीजेआई को वकील ने अपशब्द कहे, फाइल फेंकी। उपशीर्षक है, पीठ को ही आदेश देने लगा आरोपी, कोर्टरूम से जबरदस्ती बाहर निकाला गया। इसके साथ एक खबर है, जज बोले हमें उससे सहानुभूति। खबर के अनुसार, … हम उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना चाहते। जहां तक मामले की बात है, हमें विवादित आदेश में दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं मिला। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह सेकेंड लीड है – कैंसर मरीज का निधन, दवा के लिए उसकी याचिका सुनवाई के लिए 57 बार सूचीबद्ध की गई। यह मामला 21 जनवरी 2023 से चल रहा था। पर सुनवाई नहीं हुई। खबर से जो मैं समझ पाया वह यह कि सरकार की इजाजत से इस दवा को स्थानीय तौर पर बनाया जा सकता था जिससे यह जरूरतमंद लोगों को सस्ते में मिल सकती थी और जरूरतमंद लोगों की संख्या काफी है। सरकार की राय में स्तन कैंसर का मामला राष्ट्रीय आपदा नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में आज ही छपी खबर के अनुसार, पेट्रोल में इथेनॉल मिलाना जारी रहेगा। ई20 बेचना बंद नहीं किया जाएगा और उपभोक्ताओं को विकल्प देना संभव नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सरकारी जबरदस्ती है। लगभग वैसे ही है जैसे एसआईआर और लॉजिकल डिसक्रिपेंसी या बाद में वोट दे लेंगे के जरिए तृणमूल कांग्रेस को हराया गया या भारतीय जनता पार्टी को जीतने दिया गया। अगर आपको इसमें अदालत की भूमिका कम लगे तो आम आदमी पार्टी और केजरीवाल को दिल्ली की सत्ता से बाहर करने के लिए मुकदमा, उस पर कार्रवाई सुनवाई और रिक्लूज करने की मांग, उसपर प्रतिक्रिया से सब साफ हो चुका है। अदालतों की व्यवस्था सत्तारूढ़ पार्टी के लिए काम कर रही है।
इसमें सोनम वांगचुक और उमर खालिद का मामला जोड़ सकते हैं। कैंसर की दवा पर वर्षों सुनवाई न होने, 57 बार सूचीबद्ध होने पर भी जरूरतमंदों को कोई लाभ न होने की खबर के साथ टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज सीजेआई को गाली देने वाली खबर सिंगल कॉलम में छापी है। इस खबर के अनुसार, अदालत में अभद्रता और सीजेआई को गाली देने के बावजूद संबंधित अधिवक्ता के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई। अदालत ने जो कहा, पहले लिख चुका हूं, सार्वजनिक है। आज खबर यह होनी चाहिए थी कि अदालत में अभद्रता करने वाले के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, अदालत ने उसे हताश कहा, उसका मामला यह था या है। वीडियो से यह स्पष्ट है कि उसे अदालत से कार्रवाई की उम्मीद नहीं थी, उसने कार्रवाई की अपील की ही नहीं, वह आदेश दे रहा था और संबंधित दस्तावेज भी उसने हवा में उड़ा दिए, सौंपे नहीं। गाली देते हुए कहा सीजेआई को दे देना। ऐसा व्यक्ति अदालत में आया क्यों, आने क्यों दिया गया – बहुत सारे सवाल हैं। इसका जवाब इस खबर से मिल सकता था कि उसका मामला क्या है। यह सही है कि कार्रवाई नहीं होने से हताशा होती है, सुप्रीम कोर्ट ने उसने मांग की ही नहीं तो कार्रवाई कहां होती और अदालत ने अभद्रता तथा गाली देने के लिए कार्रवाई नहीं करने का निर्णय किया तो यह उसका विशेषाधिकार है लेकिन मीडिया वालों का काम था कि उससे मिलते बात करते और पाठकों के लिए चीजों को स्पष्ट करते।
मुझे लगता है कि देश में कानून का राज नहीं के बराबर है और अदालतें जनता से ज्यादा सरकार का काम कर रही हैं। संभव है, ऐसा हताशा इस कारण हो लेकिन शिकायतों पर कार्रवाई हो रही होती, विकल्प होते जो शायद यह स्थिति नहीं आती। पहले शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती थी तो अखबारों में खबर छप जाती थी। आधा गुस्सा इससे ही शांत हो जाता था और खबर छपने से कार्रवाई भी होती थी। अभी खबर नहीं छपती है और छप भी जाए तो कार्रवाई नहीं होती है। शिकायत के लिए जो लोग सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकते हैं उन्हें जो सब सुनाया गया है, जो कार्रवाई हुई है वह सर्वविदित है। हालत यह है कि कॉक्रोच जनता पार्टी बन गई, उसका आंदोलन चल रहा है लेकिन शिक्षा मंत्री को हटाया नहीं गया है। पेपर लीक होना जारी है, रुका नहीं है। कार्रवाई तो पहले के लिए होनी है और मांग इसलिए की जा रही है कि बच्चे आत्म हत्या कर ले रहे हैं। सरकार (व्यवस्था) ने मंत्री को नहीं हटाया तो यह सलाह भी नहीं दी है कि बच्चे हताशा में आत्महत्या नहीं करें। डॉक्टर नहीं बनने के अलावा भी जिन्दगी है या मां-बाप की पहली इच्छा यह होगी कि उनका बच्चा स्वस्थ रहे, जीता रहे, डॉक्टर न बने तो मंत्री बनने की कोशिश करे, आसान है। पर मंत्री बनकर भी सिस्टम को ठीक करना संभव नहीं है इसलिए हताशा है और सुप्रीम कोर्ट इसे खत्म करने के लिए कुछ करे या नहीं करे, मीडिया भी कुछ करता नहीं दिख रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के साथ एक 2015 की एक याचिका का जिक्र है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कछुआ भी इसकी रफ्तार पर सवाल करेगा। एक और खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से कहा हम आपकी पोल खोल देंगे। अब सुप्रीम कोर्ट भी राज्य सरकार की पोल न खोले और चेतावनी दे, मौका दे तो मामला समझा जा सकता है। खासकर तब जब जज लोया की संदिग्ध मौत की जांच नहीं हुई, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद भेजे गए जज साब के घर पर दिल्ली में मिले या जले या देखे गए नोटों का राज नहीं खुला और उसमें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की नौकरी कैसे गई, उन्हें दाढ़ी वालों से क्यों डर लगने लगा जैसी कई खबरें नहीं हुई हैं और हों भी कैसे जब छह सैनिकों के शहीद होने की खबर छुपाई जा सकती है।
कहने की जरूरत नहीं है कि मध्य प्रदेश के मंत्री के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेने वाले जज का तबादला हो गया और मंत्री के खिलाफ कार्रवाई नहीं ही हुई। ऐसी हालत में चढ़ावा चोरी का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। देशबन्धु की लीड है, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा राम मंदिर चंदा विवाद। उपशीर्षक है – राम मंदिर ट्रस्ट में कथित वित्तीय गड़बड़ियों पर 13 को शीर्ष अदालत सुनवाई करेगी। इसके साथ एक खबर और खबर है, राम मंदिर में चढ़ावा गिनने वाले 20 कर्मचारियों ने इस्तीफा दिया। नवोदय टाइम्स में आज यह खबर तीन कॉलम में है। खबर के अनुसार, यह अयोध्या में चढ़ावा चोरी से संबंधित मामला है और नौकरी छोड़ने वालों ने मेहनताना घटाने, नियमों में बदलाव का विरोध करने के लिए इस्तीफा दिया है। दैनिक भास्कर ने सुप्रीम कोर्ट में हंगामे की खबर या अदालतों की अन्य खबरों से अलग चंदा चोरी मामले में खास खबर छापी है। इसके अनुसार, मंदिर के 54 दान पात्रों की चाबी टिन्नू यादव के पास रहती थी और हुंडियों के ताले दो चाबियों से खुलते थे। आज इस खबर का चाहे जो महत्व हो, दैनिक भास्कर के पहले पन्ने की एक और खबर का शीर्षक है, एक देश-एक चुनाव 2029 से लागू हो सकता है। द हिन्दू की लीड आज मद्रास हाईकोर्ट की खबर है। इसके अनुसार, मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के पांच विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव पर रोक लगा दी है। यह कदम एक ऐसी याचिका के बाद उठाया गया है जिसमें कहा गया था कि चुनाव से जुड़ी लंबित याचिकाओं का निपटारा होने से पहले उपचुनाव की घोषणा करने से अजीब स्थिति पैदा हो सकती है; प्रतिवादियों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए 31 जुलाई तक का समय दिया गया है। दिलचस्प है कि ये पांच सीटें जीतने वालों के इस्तीफे से खाली हुई हैं और जीतने वालों पर यह आरोप है कि इनलोगों ने अवैध तरीकों से चुनाव जीता है। आमतौर पर हमने देखा है कि चुनाव के मामले में अदालते हस्तक्षेप नहीं करती हैं। भाजपा के खिलाफ अदालती हस्तक्षेप का एक मामला चंडीगढ़ का चर्चित रहा जिसमें अनिल मसीह के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। तमिलनाडु में चुनावी याचिकाएं कई हैं और उनपर फैसला अपने समय से होगा। लेकिन जो सीटें खाली हैं उनपर उपचुनाव कराना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। बीच में जो हो रहा है वह किसी एक राज्य का मुद्दा नहीं है। इसलिए चुनाव याचिकाओं के त्वरित निपटारे की व्यवस्था भी जरूरी है। सरकार क्या करे और अदालतें क्या-क्या करे।
आज की दूसरी महत्वपूर्ण खबरों में एक अमर उजाला में चार कॉलम का बॉटम है। इसके अनुसार आगामी उपचुनावों के लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को अपने उम्मीदवार बदलने पड़े या जिन्हें टिकट दिया उनका विरोध हो रहा है। आप जानते हैं कि बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया में उपचुनाव हो रहे हैं। खबरों के अनुसार, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर भाजपा ने अभिषेक सिन्हा को उम्मीदवार बनाया था। सिन्हा ने गाजे-बाजे और तमाम नेताओं के साथ नामांकन भी भर दिया था। अगले ही दिन पारिवारिक कारणों से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। यहां अब नीरज कुमार सिन्हा उम्मीदवार घोषित किए गए हैं। जनसुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर पटना से चुनाव लड़ने वाले हैं और उम्मीदवार बदलने पर उन्होंने कहा है, “अब तक हमने देखा है कि बीजेपी के डर से दूसरी पार्टियों के उम्मीदवार ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स के डर से भागते हैं, लेकिन आज ऊपर वाले ने इनके साथ इंसाफ किया है कि इनका उम्मीदवार मैदान छोड़कर भागा है।” दूसरा मामला मध्यप्रदेश के दतिया का है। पार्टी ने पूर्व गृहमंत्री और कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को टिकट देकर सबको चौंका दिया है। बदले में भाजपा में जबरदस्त गुस्सा है। जिला अध्यक्ष समेत कई नेताओं ने इस्तीफा दे दिया है। भाजपा में ऐसा होता नहीं है और होता है तो खबरों को प्रमुखता नहीं मिलती है। आज अमर उजाला में यह खबर प्रमुखता से है। आज हिन्दी के मेरे चारो अखबारों की लीड अलग है। 1) अमर उजाला – प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा, भारत न्यूजीलैंड एफटीए को मिलेगी मंजूरी रक्षा समेत कई समझौतों पर भी लगेगी मुहर। 2) दैनिक भास्कर – मानसून की खबर। खेती वाले इलाके में सूखे का खतरा बरकरार। 3) नवोदय टाइम्स – गुरुग्राम में 4 शूटर ढेर और 4) देशबन्धु की लीड का शीर्षक बता चुका हूं – चंदा विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ की लीड आज भी बता रही है कि पश्चिम बंगाल यूपी के रास्ते पर बढ़ निकला है। खबर, निर्माणाधीन चर्च में तोड़फोड़ की है। बदमाश बंगाल के चर्च तक पहुंचे शीर्षक के साथ बताया गया है कि हमलों में एक पैटर्न है और इसमें पुलिस उत्पीड़न शामिल है। 6) दि एशियन एज की लीड भी प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा है। इसके अनुसार प्रधानमंत्री की न्यूजीलैंड वार्ता आज होगी, व्यापार और आर्थिक संपर्कों पर केंद्रित होगी। इसमें एक खबर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हवाले से है, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस हिन्दुओं का सम्मान नहीं करती है। 7) टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड वही है जो नवोदय टाइम्स में है। वहां शीर्षक छोटा है यहां डबल इंजन वाले गुरुग्राम की हालत है और खबर मुठभेड़ में चारे लोगों के मारे जाने की है। इसलिए यह यूपी के मुठेभेड़ जैसा नहीं हो सकता है। शीर्षक के अनुसार 60 गोलियां चली हैं। तीन पुलिस वाले भी घायल हैं। मामला 10 करोड़ की वसूली का बताया जा रहा है। 8) हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड शेख हसीना के वापस बांग्लादेश जाने की खबर है। उनकी योजना दिसंबर में समर्पण करने की है। 9) द हिन्दू की लीड तमिलनाडु विधानसभा उपचुनाव रोकने से संबंधित मद्रास हाईकोर्ट की खबर है और 10) इंडियन एक्सप्रेस की लीड ई20 की खबर है। इसके अनुसार सरकार ग्राहकों को विकल्प देने के लिए तैयार नहीं है। इस मामले में सरकार के आधिकारिक और गैरआधिकारिक तर्क चाहे जो हों, घुलनशीलता की परिभाषा से समझने वाले किसी भी व्यक्ति को समझ में आएगा कि समस्या ई10 से नहीं थी, ई20 से है तो क्यों है और क्यों ई20 पेट्रोल की जो बोतलें सार्वजनिक हैं उनमें पेट्रोल और इथेनॉल की मात्रा 80:20 की बजाय 40:50 या 40:60 दिखाई देती है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



