प्रधानमंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को हटा नहीं रहे हैं और उधर डबल इंजन वाले उड़ीशा के मुख्यमंत्री ने पाठ्य पुस्तकों की गलतियों की आपराधिक जांच के आदेश दिए हैं।
संजय कुमार सिंह
अखबारों और खबरों की हालत वाकई बहुत बुरी है। कहा, बताया और समझा यही जाता है कि सरकार ने मीडिया को खरीद रखा है, जो खिलाफ लिखता-बोलता है उसे परेशान किया जाता है फिर भी तथ्य यह है कि खबर लिखने और संपादित करने वाले तमाम मीडिया कर्मी गुलामी की भाषा लिखते और जानते हैं। सच कहिए तो बहुतों को खबर लिखना ही नहीं आता है, खबर लिखने का जज्बा और जुनून तो बहुत बाद की बात है। वे जनता से सरकार के युद्ध की रिपोर्ट करते लगते हैं। सीजेआई को गाली पड़ी बहुत बड़ी बात है। मुझे लगता है कि खबर जितनी बड़ी थी वैसे छपी नहीं और गाली पड़ी तो इसलिए भी कि मीडिया की रीढ़ ही नहीं है। प्रबल प्रताप ने जो कोर्ट में कहा उसे किसी अखबार ने छाप दिया होता तो उसका गुस्सा (या हताशा) कम हो जाता, उसका काम हो जाता या अपेक्षित कार्रवाई हो जाती – इसकी संभावना पहले तो होती ही थी। तमाम उदाहरण और खबर हैं जिससे पता चलता है देश की आम जनता भिन्न कारणों से बेहद परेशान है। जो परेशानी शिकायत और कार्रवाई से दूर हो सकती है उसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है और इसमें धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा शामिल है। मैंने कल लिखा था कि सभी अखबारों की लीड लगभग अलग थी, कोई बड़ी, महत्वपूर्ण या जरूरी खबर नहीं थी फिर भी सीजेआई को गाली वाली खबर को प्रमुखता नहीं मिली। आज वियतनाम में 15 भारतीय पर्यटकों की मौत या फिर प्रधानमंत्री के दौरे की खबर लीड है। जो रोज छपता है वह तो अपनी जगह है ही, प्रधानमंत्री के प्रेस कांफ्रेंस करने का मामला फिर उठा है और उसका जवाब निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है और उसपर चर्चा होनी चाहिए लेकिन आज वह खबर भी गंभीरता से नहीं है। आज खबर यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट में गाली गलौज वाला वीडियो पोस्ट करने वालों पर कार्रवाई की मांग की गई है।
आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई का सीधा प्रसारण होता है और उसमें गाली दी गई तो उसका वीडियो सबने देखा और खबर देने वालों ने खबर दी क्योंकि वह खबर थी। वैसे ही जैसे 15 लोगों का मरना बहुत बुरा और दुखद है फिर भी खबर है। इसलिए खबर के बारे में मेरी राय अलग है। दूसरों की राय अलग हो सकती है। मेरा मानना है कि खबरों के मामले में फैसला संपादक (या संपादकों की संस्था) को ही करना चाहिए लेकिन देश में तमाम फैसले अदालतें करती रही हैं। अब देखा जा रहा है कि चुनाव आयोग से संबंधित फैसले सरकार नहीं कर रही है। मामला चुनाव आयोग के अधिकार का है और जो सब हुआ या होने दिया गया उसका नतीजा सब हम जानते हैं। देख रहे हैं। उसी क्रम में आज इंडियन एक्सप्रेस में खबर है, चुनाव आयोग ने नए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 में परिवर्तन किया है, एसआईआर में अभिभावकों के बारे में पूछने का सेक्शन जोड़ दिया है। अखबार ने यह भी बताया है कि चुनाव से संबंधित नियमों में परिवर्तन केंद्र सरकार कर सकती है, चुनाव आयोग ने नहीं। पर चुनाव आयोग करता रहा है। कई बार लगता है कि चुनाव आयोग और केंद्र सरकार एक ही हैं। वैसे भी चुनाव आयोग का बचाव केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के प्रचारक और समर्थक करते रहे हैं। मुझे लगता है कि यह सब खबर है लेकिन ऐसी खबरें कम छपती हैं और संभव है इससे जो नाराजगी हो वह संबंधित लोगों तक नहीं पहुंच रही है इसलिए लोगों में हताशा या निराशा हो। निश्चित रूप से यह परेशानी दूर नहीं होने के कारण होगा। अखबार अपना कोई भी काम किसी भी तरह नहीं कर रहे हैं। हालांकि वह अलग मुद्दा है।
आज बताना यह है कि प्रधानमंत्री अगर विदेश में सवालों के जवाब नहीं देते हैं, प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते हैं तो यह मुद्दा बन रहा है और फिर इसपर सवाल किया गया है। जब एक सरकारी अधिकारी राजनयिक से था जवाब देना उनकी नौकरी का हिस्सा था। उन्होंने जो जवाब दिया वह खबर हो सकती है लेकिन यह कहना कि जवाब से बोलती बंद हो गई, दो टूक जवाब दिया, पुरजोर जवाब दिया – लिखने कहने वाले के विचार हैं। पर आज ज्यादातर मीडिया संस्थानों ने इस जवाब पर अपने विचार थोप दिए हैं। मुझे नहीं लगता है कि ऐसा कहा गया होगा और कहकर जो करवाया जाता है वह कॉपी पेस्ट के रूप में दिखता रहा है। इसलिए पहले तो आप देखिए कि किसने क्या कहा। आप पाएंगे कि कइयों ने अपनी राय को खबर का हिस्सा बना दिया है और जवाब को सही कह रहे हैं जबकि खबर यह है कि सवाल किया गया या प्रेस कांफ्रेंस नहीं करना मुद्दा बन रहा है। दोहराया गया आदि। सवाल पूछने का मतलब यह नहीं होता है कि पूछने वाले को जवाब मालूम नहीं है। वह सवाल करता है सार्वजनिक तौर पर दिए जाने वाले जवाब के लिए और वह जो था, जैसा था दुनिया के सामने है। उसमें राय देने की कोई जरूरत ही नहीं थी। सरकारी अधिकारी का जवाब विपक्ष के नेता का जवाब नहीं हो सकता है, किसी सरकारी मीडिया के पत्रकार से भी अलग हो सकता है और मित्र पत्रकार, विरोधी पत्रकार का जवाब भी अलग हो सकता है। होना नहीं चाहिए – यह अलग मुद्दा है और कायदे से जवाब एक ही होना चाहिए और वही होना चाहिए जो सबको पता है। यहां देशबन्धु की यह टिप्पणी संपादकीय की है और विचार ही है। मुझे ज्यादातर मीडिया के विचार नहीं मिले और जो मिले उसे देखकर समझिए कि मीडिया क्या कर रहा है। जवाब की खबर ढूंढ़ते हुए मुझे द टेलीग्राफ की खबर भी दिखी। यहां उसका अनुवाद भी दे रहा हूं ताकि समझा जा सके कि इस मामले में खबर वाला हिस्सा मीडिया खा गया और जो दिया है वह प्रचार है – एक सरकारी अधिकारी के काम या उसकी योग्यता प्रतिभा का। टेलीग्राफ की खबर से समझ सकते हैं कि मामल क्या है और देश में पाठकों को क्या बताया जाना चाहिए।
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी छवि चमकाने के लिए चाहे कई करोड़ रूपए खर्च कर दें या प्रचार के नए तरीकों का सहारा लें, दुनिया उन्हें अब एक ऐसे कमजोर नेता के तौर पर देख रही है,
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पत्रकार के सवाल पर विदेश मंत्रालय ने यूं बंद की बोलती। विदेश मंत्रालय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक सर्वोत्तम भारतीय राजनीतिज्ञ हैं, लोगों के साथ सीधे संवाद करना पसंद करते हैं और मध्यस्थों के माध्यम से बात किए जाने को पसंद नहीं करते हैं।
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पीएम नरेंद्र मोदी के प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करने पर MEA सचिव ने कहा कि प्रधानमंत्री सीधे जनता से जुड़ना पसंद करते हैं और उन्होंने इस शैली में महारत हासिल की है।
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भारतीय राजनयिक रुद्रेन्द्र टंडन ने करारा जवाब देते हुए पीएम की सीधी संवाद शैली का पुरजोर बचाव किया।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते? न्यूजीलैंड दौरे के दौरान उठे इसी सवाल पर विदेश मंत्रालय ने दो टूक जवाब दिया है।
मुझे लगता है कि द टेलीग्राफ ने इसे खबर की तरह पेश किया है। यह पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन अखबार में है कि नहीं मैं यह भी नहीं देख पाया। असल में आज मेरा इंटरनेट खराब है और हॉट स्पॉट से काफी स्लो चल रहा है। इंटरनेट पर मिली द टेलीग्राफ की खबर इस प्रकार है, पीएम मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते? न्यूज़ीलैंड से एक नया नज़रिया सामने आया है। खबर इस प्रकार है यह सवाल कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता पत्रकारों के (बिना स्क्रिप्ट वाले) सवालों का जवाब क्यों नहीं देते हैं – नॉर्वे के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ऑस्ट्रेलिया और उसके आगे भी बना हुआ है। प्रेस के साथ बिना स्क्रिप्ट वाली कॉन्फ्रेंस का सामना न करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लंबे समय से चले आ रहे रवैये ने ऑस्ट्रेलिया की हालिया यात्रा और न्यूज़ीलैंड की मौजूदा यात्रा के दौरान फिर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा है। नॉर्वे की ही तरह, न्यूज़ीलैंड के ऑकलैंड में भी भारतीय राजनयिकों को इसी सवाल का सामना करना पड़ा। इससे पहले एक पत्रकार ने सार्वजनिक रूप से पूछा था कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता दुनिया के सबसे स्वतंत्र प्रेस के बिना स्क्रिप्ट वाले सवालों का जवाब क्यों नहीं देते। विदेश मंत्रालय में सचिव (पूर्व) रुद्रेंद्र टंडन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मेरे लिए पीएम के राजनीतिक तरीके पर सवाल करना सही नहीं है क्योंकि मैं एक सिविल सर्वेंट हूँ।” “वह एक बहुत सफल राजनेता हैं।” इसके बाद उन्होंने न्यूज़ीलैंड के पत्रकारों को “संदर्भ समझाया” और दावा किया कि पीएम मोदी ज़्यादातर “खास भारतीय राजनेताओं” की तरह अपने मतदाताओं के साथ सीधा संपर्क पसंद करते हैं। राजनयिक ने दावा किया, “आपको याद रखना चाहिए कि भारतीय मतदाता मुख्य रूप से ग्रामीण लोग हैं जो सीधा संपर्क चाहते हैं। उन्हें यह पसंद नहीं है कि उनसे बिचौलियों के ज़रिए बात की जाए।” उन्होंने कहा, “श्री मोदी ने अपने मतदाताओं के साथ सीधे संपर्क की कला में महारत हासिल कर ली है और ऐसा लगता है कि वह बहुत अच्छा काम कर रहे हैं,” साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले प्रधानमंत्रियों में से एक हैं। कुछ दिन पहले, मोदी की यात्रा पर रिपोर्टिंग कर रहे एक ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार ने टीवी पर कहा था: “यह [ऑस्ट्रेलियाई पीएम] अल्बानीज़ के साथ उनकी यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी के सबसे करीब पहुँचने का मौका है। वह [मोदी] बिना स्क्रिप्ट वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचते हैं और इसके बजाय पहले से तय कार्यक्रमों में शामिल होना पसंद करते हैं।”
कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों में उनकी लोकप्रियता का भारी प्रचार होता रहा है और अब सब सार्वजनिक है। भारतीय मीडिया में भले न हो। इनमें पुरस्कार मिलना शामिल है। दूसरी ओर, भारतीय मीडिया विपक्ष को महत्व ही नहीं देता है जबकि सरकार का तो अंदाज ही कांग्रेस मुक्त भारत वाला है। ऑकलैंड डेटलाइन से दैनिक भास्कर की एक खबर के अनुसार, मोदी ने कहा है कि कोई भी देश आबादी के लिहाज से छोटा नहीं होता है, बस भावना अच्छी हो। अमर उजाला की एक खबर के अनुसार, नृपेन्द्र मिश्र ने कहा है कि चढ़ावा चोरी कलंक के कारण हम छोटा महसूस कर रहे हैं। इसमें खबर क्या है और कलंक तो है ही। चिन्ता पहले की जानी चाहिए थी पर मामला पकड़े जाने के बाद भी प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं कहा है (या जो कहा है वह नहीं के बराबर है)। मुद्दा यह है कि सरकार ने या ट्रस्ट ने ऐसा कुछ किया ही नहीं है जिससे लगे की चोरी रोकने के लिए कुछ किया गया था। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, सात साल की बच्ची से गैंग रेप, हत्या। यह गाजियाबाद की खबर है और अपराधी यूपी छोड़कर भाग गए जैसे दावों के बावजूद है। हालांकि, अखबार ने इसके साथ मोदी को भी बराबर महत्व में छापा है – विकास का नया मॉडल दे रहा है। देशबन्धु की खबर के अनुसार, चढ़ावा चोरी मामले में कांग्रेस ने भाजपा व चौतरफा हमला किया है। इसके मुकाबले अमर उजाला के शीर्षक को संघ की भावुक अपील मान सकते हैं। द टेलीग्राफ की लीड पश्चिम बंगाल सरकार की खबर है। प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा की खबर अंदर है। आज इससे संबंधित एक महत्वपूर्ण जानकारी है कि चार साल में द्विपक्षीय कारोबार दूना करने का लक्ष्य है। कैसे होगा, कौन करेगा – जैसे तमाम सवाल हैं। यह खबर दि एशियन एज में भी लीड है। कुछ और जानकारियां हैं। कुल मिलाकर कई अन्य सूचनाओं के साथ यह खबर अमर उजाला, इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया में दोनों खबरें प्रमुखता से हैं। द हिन्दू में डबल इंजन वाले उड़ीशा में पाठ्य पुस्तकों की गलतियों की आपराधिक जांच के आदेश दिए जाने की खबर है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



