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लंदन जाकर आमिर ख़ान ने जो झूठ बोला है, उसका पर्दाफ़ाश वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ला की ये पोस्ट करती है!

पंकज शुक्ला-

अपनी लागत से सात गुना कमाई करने वाली फ़िल्म ‘थ्री ईडियट्स’ के लिए आमिर खान ने इसकी रिलीज़ के वक़्त जो किया था, उसे शाह रुख़ ख़ान ने तब ‘छिछोरापन’ माना था, और, अब आमिर ख़ान ने लंदन जाकर जो तथाकथित ‘ख़ुलासा’ किया है, उसके भी बताते हैं कि पैसे वसूले गए हैं!

सिनेमा की दुनिया में एक अजीब सच है। फ़िल्में परदे पर जितनी कहानियाँ सुनाती हैं, उनसे कहीं ज़्यादा कहानियाँ उनके इर्द-गिर्द पैदा हो जाती हैं। कुछ अफ़वाहें दर्शक गढ़ते हैं, कुछ मीडिया पालता है और कुछ ऐसी होती हैं जिन्हें ख़ुद फ़िल्म वाले समय के साथ मरने नहीं देते।

लेकिन, जब 17 साल बाद किसी अफ़वाह को ख़ारिज करने के लिए बाक़ायदा टिकट बेचकर मंच सजाया जाए, तब सवाल उठना लाज़िमी है कि यह सच का उत्सव था या स्टारडम का कारोबार?

लंदन इंडियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में आयोजित ‘आमिर खान इन कन्वर्सेशन’ कार्यक्रम में आमिर खान ने एक ‘सवाल’ के जवाब में साफ़ कहा, “फ़िल्म ‘थ्री ईडियट्स’ लिखते और बनाते समय उन्हें या फ़िल्म के लेखकों को सोनम वांगचुक के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।”

यानी, वर्षों से चली आ रही यह धारणा कि रैंचो का किरदार वांगचुक से प्रेरित था, उनके अनुसार ग़लत है। दिलचस्प बात यह है कि यह कोई प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं थी।

ब्रिटिश फ़िल्म इंस्टीट्यूट की वेबसाइट पर आमिर खान के इस कार्यक्रम की टिकटें बीते एक महीने से बिकती रही हैं। जानकारी के मुताबिक़, इस कार्यक्रम में प्रवेश के लिए दर्शकों ने लगभग 10 से 18 पाउंडतक की क़ीमत चुकाई। इस समय एक पौंड की कीमत करीब 130 रुपये है।

Stage with a man in a navy polo holding a microphone, two hosts behind him, and bold Hindi text on a black backdrop announcing a comedy show.",

यानी इस ‘ख़ुलासे’ के भी बाक़ायदा टिकट बिके। लेकिन, सवाल यह भी है कि क्या यह सचमुच कोई नया ख़ुलासा था?

असलियत यह है कि इस विवाद पर वर्षों पहले ही लगभग सभी संबंधित पक्ष अपनी-अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुके थे।

ख़ुद सोनम वांगचुक कई बार कह चुके हैं कि उनसे फ़िल्म बनाने के दौरान कभी औपचारिक सलाह नहीं ली गई थी और रैंचो सीधे तौर पर उन पर आधारित पात्र नहीं था। उन्होंने यह भी माना कि लोगों ने उनकी शैक्षिक पहल और फ़िल्म के विचारों के बीच समानता देखकर यह निष्कर्ष निकाला।

उधर, निर्देशक राजकुमार हिरानी भी कई बार कह चुके हैं कि रैंचो किसी एक व्यक्ति का चित्रण नहीं है। उनके अनुसार यह किरदार मुख्यतः चेतन भगत के चर्चित उपन्यास ‘फ़ाइव प्वाइंट समवन’ से विकसित हुआ, जिसमें उन्होंने एफटीआईआई के अपने कुछ सनकी और प्रतिभाशाली सहपाठियों के अनुभव भी मिला दिए।

वैसे भी जिसने ‘फ़ाइव प्वाइंट समवन’ पढ़ी है, वह जानता है कि उपन्यास का नायक रयान ओबेरॉय और फ़िल्म का रैंचो एक जैसे नहीं हैं। उपन्यास तीन दोस्तों के आईआईटी जीवन, परीक्षा व्यवस्था और रटंत शिक्षा प्रणाली के ख़िलाफ़ संघर्ष की कहानी है। फ़िल्म ने उसी मूल विचार को आगे बढ़ाते हुए रैंचो जैसा ऐसा पात्र रचा जो डिग्री नहीं, जिज्ञासा का प्रतिनिधि बन गया।

‘कामयाबी के पीछे नहीं, क़ाबिलियत के पीछे भागो’ और ‘ऑल इज़ वेल’ जैसे संवाद उसी सिनेमाई विस्तार का हिस्सा थे।

यानी यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि रैंचो सिर्फ़ किताब से निकला और यह कहना भी ग़लत होगा कि वह केवल सोनम वांगचुक थे। सिनेमा अक्सर कई स्रोतों से प्रेरणा लेकर अपना नया सत्य गढ़ता है। लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प अध्याय शायद फ़िल्म की रिलीज़ से पहले लिखा गया था।

आज जब फ़िल्मों की मार्केटिंग सोशल मीडिया पोस्ट और ट्रेलर लॉन्च तक सीमित दिखाई देती है, तब याद करना चाहिए कि 2009 में आमिर खान ने भारतीय फ़िल्म प्रचार का पूरा व्याकरण बदल दिया था।

वह अलग-अलग भेष बदलकर देशभर में घूमे। छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों तक पहुँचकर आम लोगों के बीच रहे। किसी को पता नहीं था कि अगली बार आमिर कहाँ मिलेंगे। इसे उन्होंने अपना ‘भारत दर्शन’ कहा।

मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और जयपुर जैसे शहरों में लगभग दस हज़ार ऑट रिक्शाओं पर “Capacity: 3 Idiots” वाले स्टिकर लगाए गए। इंटरनेट पर ‘गुमशुदा आमिर‘’ को खोजने का खेल शुरू हुआ जिसमें विजेता को नए साल की पूर्व संध्या पर आमिर खान के साथ डिनर का इनाम रखा गया। इडियट्स एकेडमी नाम की वेबसाइट कॉलेज कैंपस की तरह तैयार की गई और फ़ेसबुक पर आमिर द पक्का ईडियट नाम से उनकी सक्रिय मौजूदगी उस दौर में डिजिटल प्रचार का नया अध्याय बन गई।

यही वह अभियान था जिसे उस समय शाह रुख़ ख़ान ने एक टीवी बातचीत में हल्के व्यंग्य के साथ “छिछोरापन” कहा था। दरअसल दोनों सितारों के बीच उस दौर में पेशेवर प्रतिस्पर्धा अपने चरम पर थी और आमिर की आक्रामक मार्केटिंग शैली ने पूरी इंडस्ट्री को चौंका दिया था।
विडंबना देखिए कि उस समय प्रचार का जो तरीका चर्चा का विषय था, आज वही फ़िल्म भारतीय सिनेमा में मार्केटिंग केस स्टडी मानी जाती है। और, 17 साल बाद भी उसी फ़िल्म से जुड़ा एक पुराना भ्रम टिकट बेचकर चर्चा का विषय बन सकता है।

शायद यही किसी बड़ी फ़िल्म की सबसे बड़ी जीत होती है।

फ़िल्में सिनेमाघरों से उतर जाती हैं, लेकिन उनके पात्र लोगों की स्मृति में अपनी अलग ज़िंदगी जीने लगते हैं। कभी रैंचो सचमुच सोनम वांगचुक बन जाता है, कभी फ़ुन्सुख वांगडू वास्तविक व्यक्ति समझ लिया जाता है और कभी सत्रह साल बाद अभिनेता को मंच पर आकर यह बताना पड़ता है कि कहानी की जड़ें वास्तव में कहाँ थीं।

सच्ची जैसी लगने वाली झूठी कहानी ही सिनेमा है। सिनेमा का परदा दो-ढाई घंटे में गिर जाता है, लेकिन उसके मिथक कई बार पीढ़ियों तक चलते रहते हैं। शायद, इसलिए सच सुनने के लिए भी कभी-कभी टिकट खरीदनी पड़ती है! है ना? जै जै..!

इस तफ़्तीश के दूसरे भाग में पढ़िए, सोनम वांगचुक की ज़ुबानी, आमिर के झूठ की कहानी..!!


लंदन जाकर आमिर ख़ान ने जो झूठ बोला है, उसका पर्दाफ़ाश मेरी ये पोस्ट करती है।

ये पोस्ट दरअसल, ‘जोश टाक्स’ के लिए सोनम वांगचुक की एक रिकॉर्डिंग के उस हिस्से का ट्रांसक्रिप्शन है, जिसमें वह आमिर ख़ान, फ़िल्म ‘थ्री ईडियट्स’ और फ़िल्म की कहानी लिखे जाते समय उनके स्कूल पहुँची फ़िल्म की टीम की जानकारी दे रहे हैं..!

सोनम ने पूरी बात हिंदी में कही है और इस बात के लिए उनकी तारीफ़ भी की जानी चाहिए। लद्दाख निवासी होने के बाद भी वह हिंदी में बोल रहे हैं, लिहाजा उनकी हिंदी में व्याकरण, वर्तनी आदि की दिक्कतें हो सकती हैं, मैने पूरी कोशिश की है कि जैसा वह बोल रहे हैं, उसे वैसा ही लिखा जाए..!

टाइम लाइन बहुत ध्यान से पढ़िएगा, उसी में सारा सार है..!! तो पढ़िए ‘ताकि सनद रहे विद पंकज शुक्ल’ में आमिर ख़ान के बयान की तफ़्तीश का भाग-दूसरा

‘जोश टाक्स’ की इस रिकॉर्डिंग में सोनम वांगचुक कहते हैं,

“बात 2008 की है। लद्दाख में हमारे शिक्षा में जो काम हो रहे थे उसको सम्मान देते हुए एक चैनल सीएनएन आईबीएन ने हमें रियल हीरोज़ अवार्ड से पुरस्कृत किया। और, उस अवार्ड को लेने के लिए मैं बंबई (मुंबई) पहुंचा। और, वहां उस समारोह में मेरी मुलाक़ात आमिर ख़ान साहब से हुई।”

“अब वैसे मैं फिल्में ज्यादा देखता नहीं हूं। मगर उनकी जो ‘तारे ज़मीन पर’ फ़िल्म है, उसका मैं बड़ा फ़ैन रहा हूं। तो, बातों-बातों में उनसे मैंने एक प्रस्ताव रखा। कहा कि ये जो भारत और पाकिस्तान, खासकर लद्दाख और बलूचिस्तान जो कि सीमा पर हैं। यहां जो सियाचिन को लेकर झगड़ा चल रहा है, पागलपन चल रहा है। एक बर्फ़ के टुकड़े के लिए जिस पर कि पांच से सात करोड़ दिन का ख़र्च होता है।”

“क्या एक फ़िल्म के माध्यम से ये दिखाया जा सकता है कि अगर यहां की जनता और वहां की जनता सरकार ही नहीं, फौज नहीं, जनता मिलके बात करें और कहें हट जाइए। और, ये जो पैसा आप जला रहे हैं, उसे शिक्षा में ख़र्च कीजिए। तो क्या पता ऐसा एक आंदोलन सच में चले, और क्या ही पता ये सच हो जाए? तो, उन्होंने गौर से सुना।”

“और उसके बाद उस समारोह में मेरे काम के बारे में एक छोटी सी डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई गई। और, बात लगभग वहां ख़त्म हो गई। मैं आपको इस वक़्त दिखाना चाहूंगा एक छोटी सी क्लिप जो कि उस समारोह की है।”

(यहां सोनम वांगचुक एक क्लिप चलाते हैं, जिसमें सोनम वांगचुक, मुकेश अंबानी से पुरस्कार लेते हुए दिखाई दे रहे हैं। राजदीप सरदेसाई कार्यक्रम संचालक की भूमिका में दिख रहे हैं। नीता अंबानी उन्हें एक भेंट देती नज़र आती हैं। दर्शकों में सुनील गावस्कर दिखते हैं।)
इस क्लिप में सोनम वांगचुक का भाषण इस प्रकार है,

“बचपन में सुना करते थे, पढ़ा करते थे कि देश के लिए जान देनी चाहिए। मगर लद्दाख में बढ़ते हुए ये देश के लिए जान देने का कारोबार बहुत देखा। और, जहां एक तरफ़ मैं सलाम करता हूं, उन लोगों के लिए, उन लोगों को जिन्होंने देश के लिए जान दिया।

(यहां आमिर ख़ान अपनी फ़िल्म ‘गज़नी’ के लुक में दिखाई देते हैं, उनके साथ उनकी तब की पत्नी किरण राव भी नज़र आती हैं)

सोनम कहते हैं, “मगर, इस 21वीं सदी में मेरा ख़्याल है कि देश के लिए जान देने की नहीं, ज़िंदगी देने की ज़रूरत है।”

(‘ताकि सनद रहे विद पंकज शुक्ल’ के लिए इस भाषण को लिखते समय इस वाक्य के दौरान जावेद अख़्तर साथ में बैठी अपनी पत्नी शबाना आज़मी से कुछ कहते नज़र आते हैं, उन्हें शायद इस वाक्य में बहुत दम नज़र आया और शबाना भी दोनों हाथ अपने गालों से लगाए विस्मित सी नज़र आती हैं।)

“हमारे लद्दाख में जहां सियाचिन ग्लेशियर है, मैं आपको बताऊं वहां पर बहुत सारे हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी माँओं ने अपने बेटे गँवाए हैं। और इसके लिए क्या क़ीमत अदा करते हैं हम, आप सब अपने कमाई से सुरक्षा का ख़र्चा, रोज़ाना पांच करोड़ है, ऐसा कहा जाता है।”

“और दूसरी तरफ शिक्षा की हालत ऐसी है कि शायद हमारा सर नीचे झुके, अगर हम अपने सरहदी इलाकों के स्कूलों की हालत देखें तो। तो मेरी उम्मीद है, एक ख़्वाब है कि ऐसे हम एक हालात पैदा करें हम, आप सब मिलके सरहद के उस तरफ़, इस तरफ़ के लोग मिलके कि ये पांच करोड़ रोज़ाना का जो ख़र्चा है वो इस सरहदी इलाकों के रक्षा में नहीं, शिक्षा में जाए। और वही हमारी सबसे बड़ी सुरक्षा होगी।”

“मैं ये किस तरह से हम इस देश में ऐसा और पाकिस्तान में ऐसा हालात पैदा करें कि हम अपने जो बहुत कम हमारे वसाईल हैं, पैसे हैं उसे हम शिक्षा में खर्च करें। इसको कैसे देश के सामने रखा जाए सोचता रहा हूं और ये ‘तारे ज़मीन पर’ देखके मुझे एक उम्मीद जागी कि इसे हम एक फिल्म के जरिए दिखा सकते हैं लोगों को, कि ये मुमकिन है।”

“और मुझे यही उम्मीद रहेगी कि ऐसा अगर हम दिखा सकें और ऐसा एक अगर दिन आए तो, दैट विल बी ए डे आई वुड लाइक टू गिव माय लाइफ फॉर और लिव माय लाइफ।”

यहां पर क्लिप में संचालक राजदीप सरदेसाई बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहते हैं, “डायलॉग दैट सोनम वांगचुक गेव, आई थिंक जावेद भाई यू गॉट टू रेस्पोंड टू दैट।”

जावेद अख़्तर जवाब देते हैं, “ज़िंदगी और जान में जो उन्होंने फ़र्क बताया वो मैं कभी भूलूंगा नहीं। बहुत खूबसूरत जुमला था और बड़े दिल से निकला हुआ था।”

यहां क्लिप ख़त्म होती है, और सोनम वांगचुक फिर से अपने जोश टॉक्स की रिकॉर्डिंग शुरू करते हैं..

“तो इस समारोह के बाद, कुछ ही महीनों बाद मैं अर्थ आर्किटेक्चर यानी कि मिट्टी के भवनों की वास्तुकला सीखने फ्रांस चला गया। और, फिर 2009 के दिसंबर के अंत में मुझे ढेर सारे ईमेल्स आते हैं दोस्तों से, पत्रकारों से कि आपके बारे में जो फ़िल्म निकली है वो बहुत अच्छी है। मैं परेशान, ये क्या फ़िल्म है?”

“और, आपके स्कूल को दिखाया गया है। मैं फ़ोन करता हूं, अपने विद्यालय में कि ऐसा कोई फ़िल्म बनाया। तो वो कहते हैं कि हां, फ़िल्म बनाने वाले आए थे मगर कुछ रहस्य रख रहे थे, बता नहीं रहे थे क्या फ़िल्म है और हमने देखा कि वो लोग बहुत प्लास्टिक का कचरा लाने वाले हैं और हमने मना कर दिया। तो, उन्होंने फ़िल्म पास के किसी और स्कूल में बना दिया।”

“और, फिर पता करता हूं तो पता चलता है कि ये जो वाक़या था, ये अप्रैल 2008 की थी। जबकि उस फ़िल्म की कहानी को बंद किया जा रहा था और शूटिंग अगस्त 2008 में शुरू होने वाली थी। तो, ये मैं आप पे छोड़ता हूं कि कितना इससे रिश्ता है, इस फ़िल्म से। मगर मैं फ़िल्मों के जीवन में नहीं रहना चाहता। इस देश को फ़िल्मों की ज़रूरत नहीं है।”

“हम अपने इस देश में बॉलीवुड और क्रिकेट को कुछ अधिक ही महत्व देते हैं। हम अपने जीत भी फिल्मों में जीतना चाहते हैं। हम अपने आविष्कार भी फिल्मों में करना चाहते हैं। जबकि वास्तविक जीवन में ज़रूरत है इनकी। तो, मैं मेरे पास इतना वक़्त भी नहीं कि इनके इर्द-गिर्द घूमूं। हां, मैंने ये ज़रूर सोचा जब ये मुझे ईमेल्स आए कि मैं उनको लिखूं।

“मगर, फिर क्या सुनता हूं कि उस फ़िल्म के रिलीज़ होने की कुछ ही देर बाद एक घमासान सा हुआ। चेतन भगत जी के और फिल्म निर्माताओं के बीच में कि ये क्या है, कहानी किसकी है। और मैंने सोचा, भाई इस वक़्त तो ना लिखूं। कहीं ये ना सोचे कि मैं भी कुछ पैसा मांगने के लिए आ रहा हूं।”

“तो मैंने न लिखना ही ठीक समझा और दो साल तक मैंने इंत़जार किया क्योंकि ऐसे क्लेम करने के लिए दो साल के अंदर करना होता है। जब वो ख़त्म हुआ तब मैंने ज़रूर एक चिट्ठी लिखी कि ऐसा-ऐसा हमारी मुलाक़ात हुई थी और ऐसा एक फ़िल्म निकला है और मुझे कोई जवाब नहीं आया और जवाब का मैं इंतज़ार नहीं कर रहा हूं क्योंकि काम और हैं.. ”

जै जै…!

Two men stand side by side in front of a mural of mountains and a lake with a Hindi quote overlaid: “देश के लिए जान देने की नहीं, जिंदगी देने की जुर्रत है.”

(यहां जो चित्र है, वह अमर उजाला फाउंडेशन के चंडीगढ़ में साल 2019 में हुए कार्यक्रम के बाद का है, जहां सोनम वांगचुक अतिथि वक्ता के तौर पर आए हुए थे।)

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