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इंडियन एक्सप्रेस में सौरभ द्विवेदी की टीम से जुड़े पत्रकार आयुष प्रजापति!

Two men stand arm in arm indoors, the younger in a bright red patterned shirt and white shorts, the older in a dark blue shirt and light pants, smiling at the camera.

युवा पत्रकार आयुष प्रजापति को लेकर सूचना है कि उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस हिंदी में सौरभ द्विवेदी की टीम को ज्वाइन किया है। आयुष ने इसे लेकर इंस्टाग्राम पर जो कुछ लिखा है, पढ़ें-

अब इंडियन एक्सप्रेस हिंदी | Express hindi थैंक्यू फॉर एवरीथिंग saurabhtop | वन मैन वन बॉस.

एक पौध. महज़ बीस बसन्त की. उम्र की मिट्टी भी पूरी नहीं सनी. मानो उम्र का एक टुकड़ा हो. हथेली पर रखी एक मुट्ठी मिट्टी भर. न कम. न ज्यादा. न धूप की संगत. न छांव की तासीर. बारिश की परख नहीं. मौसम की आबोहवा से परिचय भर मात्र. बस मिट्टी पर भरोसा करना सीखा था. सीखने की प्यास सूखी नहीं होने दी.

अभी कॉलेज की देहरी से उतरा ही था कि एक रोज़, एक माली ने उस पर यक़ीन किया. साथ बढ़ने को कहा. तब, जब मिट्टी के भीतर से निकल रहा था. अंकुरण अभी बाकी था. खाद-पानी मिल रहा था. जड़ें मिट्टी के भीतर अपना रास्ता टटोल रही थीं. मिट्टी से उभर आने का कोई आश नहीं था. उग आने का कोई यक़ीन नहीं था. सब कुछ धुंधला सा था. फिर भी माली ने हिस्से की ज़मीन बचाकर रखी.

अब पहली बार नई मिट्टी में रोपा गया है. मिट्टी नई है. हवा ताज़ी. कोपलें नई हैं. आसपास खड़े पेड़ नए हैं. और अनुभवी भी. धूप भी दूसरी है. पर भीतर थोड़ी-सी नमी है. थोड़ा डर है. बहुत-सी कृतज्ञता भी. एक लंबी-सी चुप्पी के साथ. शायद हर पौध की यह प्रकृति होती है.

ख़ैर, मौसम अपना काम करेगा. मिट्टी अपना. माली अपना.

अपन की कोशिश है अपनी पहली क्यारी में उतरने की. पत्तियों से पहले जड़ों तक पहुंचने की. अंकुरण के उसी अंधेरे में उतरने की है. दबने की. तपने की. फिर कहीं जाकर उगने की. क्योंकि मैं अभी एक बीज हूं.

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