यशवंत सिंह-
जंतर मंतर जाना चाहिए। मैं आज गया था। दलित नेता और सांसद चंद्रशेखर जी भाषण दे रहे थे। भीड़ खचाखच थी। पेपर लीक मुद्दे पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफे की माँग के लिए चल रहा अनशन अब निर्णायक दौर में प्रवेश कर गया लगता है।
तानाशाही की तरफ़ बढ़ रहे देश को बचाने के लिए लोकतंत्र और पारदर्शिता के लिए चिंतित सभी आवाज़ों को बिना शर्त एकजुट हो जाना चाहिए। छोटे छोटे मतभेद से ऊपर उठने का दौर है। कांग्रेस को ये आंदोलन लीड करना चाहिए। लेकिन कांग्रेस के नेता को विदेश के दौरे से ही फुर्सत नहीं है। उनकी सोशल मीडिया टीम सोनम वांगचुक को ही घेरने में जुटी है। ग़ज़ब हाल है।
कभी कभी लगता है कांग्रेस ही बीजेपी की बी टीम है। वैसे आपको क्या लगता है? राहुल गांधी को जंतर मंतर जाना चाहिए या नहीं? जैसे अन्ना आंदोलन में आरएसएस ने अपने आदमी घुसा कर फुला दिया था उसी तरफ़ सोनम वांगचुक काक्रोच आंदोलन में कांग्रेस को अपने आदमी घुसाकर इसे फुला देना चाहिए।
प्रदीप चौधरी-
कांग्रेस और बीजेपी में कोई अंतर नहीं है। दोनों पब्लिक प्रोटेस्ट को बराबर से इग्नोर करते हैं। उदाहरण से समझते हैं।
प्रोफेसर जी. डी. अग्रवाल, जिन्हें बाद में स्वामी सानंद के नाम से जाना गया, देश के सबसे बड़े पर्यावरणविदों में थे। IIT कानपुर के पहले सिविल इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष रहे, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सदस्य सचिव रहे, गंगा पर दशकों तक शोध किया, कई रिसर्च पेपर लिखे। मतलब ऐसा नहीं था कि कोई सड़क छाप एक्टिविस्ट आकर धरने पर बैठ गया हो। आदमी अपने विषय का अथॉरिटी था।
उन्होंने कहा कि गंगा को “साफ़” करने से पहले “बहता” रहने दीजिए। नदी का पानी ही रोक देंगे तो नदी बचाएँगे कैसे? बिना अविरल हुए गंगा निर्मल नहीं होगी।
मनमोहन सिंह की सरकार में उन्होंने भागीरथी पर बन रहे बांधों के विरोध में भूख हड़ताल शुरू की। मांग थी कि लोहारी नागपाला, पाला मनेरी जैसी परियोजनाएँ रोकी जाएँ, गंगा का प्राकृतिक प्रवाह बचाया जाए और उसे केवल एक जल संसाधन नहीं, जीवित नदी की तरह देखा जाए।
अनशन के बाद सरकार झुकी। लोहारी नागपाला परियोजना रद्द हुई, अन्य परियोजनाओं पर भी रोक लगी। फिर 2014 में सरकार बदल गई।
अब सोचा गया कि गंगा तो अब “माँ” बन चुकी है, अब तो प्रोफेसर साहब को आंदोलन नहीं करना पड़ेगा। लेकिन उन्हें फिर भूख हड़ताल करनी पड़ी।
इस बार उन्होंने प्रधानमंत्री को कई पत्र लिखे। मांग लगभग वही थी। गंगा अविरल रहनी चाहिए, नए बांधों पर रोक लगे, अवैध खनन रुके, गंगा संरक्षण के लिए मजबूत कानून बने।

पत्र लिखते रहे। जवाब नहीं आया। तो अनशन करने लगे। सरकार नहीं झुकी।
111 दिन बाद उनका निधन हो गया। इसलिए मैं कहता हूँ कि कांग्रेस और बीजेपी में कोई अंतर नहीं है। दोनों जन आंदोलनों को इग्नोर करती हैं। प्रोफेसर अग्रवाल को विनम्र श्रद्धांजलि।



