अनेहस शाश्वत-
सन २०१४ में एक चमत्कार तो हुआ ही, एक ऐसी सरकार आई जो देश के लगभग सत्तर साल पुराने लोकतंत्र पर भारी पड़ी। हम लोगों ने पढ़ा था कि अपने देश के संविधान में चेक और बैलेंस की ऐसी नायाब व्यवस्था की गई है कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था हमेशा बनी रहेगी। ऐसा लंबे समय तक हुआ भी। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि मोदी सरकार के आते ही सारे चेक और बैलेंस उसके सामने नतमस्तक हो गए? मुझे लगता है कि यह एकदम उचित समय है कि इस बात की पड़ताल की जाए। आखिर ऐसा क्या और क्यों हुआ कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था घुटनों के बल बैठ गई? तो आइए, शुरुआत करते हैं।
हमारे यहां यह कहने का फैशन है कि हमारा समाज तो शुरू से ही लोकतांत्रिक रहा है। लेकिन फिलहाल जो लोकतांत्रिक व्यवस्था हमारे यहां स्वतंत्रता के बाद लागू हुई, वह इंग्लैंड की देन है। कहने के लिए ब्रिटेन के खिलाफ बहुत-सी बातें हैं, क्योंकि हम उसके अधीन थे, लेकिन ब्रिटेन का शासन कानून का शासन था। उसी क्रम में सिलसिलेवार तरीके से इंग्लैंड ने भारत में ऐसी व्यवस्था लागू की कि जब भी देश आजाद हो, वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का देश बने। उसके पीछे भी एक वजह थी। उस समय ब्रिटेन समेत यूरोप के ज्यादातर देश फ्रांस की क्रांति से प्रभावित थे, जिसके प्रमुख उद्देश्य स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा थे। इसलिए ब्रिटेन चाहता था कि भारत जब भी स्वतंत्र हो, वहां लोकतंत्र ही हो।

जिस विषय पर चर्चा हो रही है, उसके लिए जरूरी है कि थोड़ा भारत का इतिहास भी खंगाला जाए। वैसे तो अंग्रेज भारत आ गए थे मुगल सम्राट जहांगीर के समय ही, लेकिन भारत पर कब्जा कर उसे ब्रिटेन का उपनिवेश बनाया जाए, इसको लेकर वे गंभीर हुए सन १७५७ में हुई प्लासी की लड़ाई जीतने के बाद। इस समय को याद रखिए। यह वह समय था जब औरंगजेब को मरे पचास साल बीत चुके थे और पूरा हिंदुस्तान राजाओं, नवाबों और पेशवाओं की आपसी लड़ाइयों से लगभग बर्बाद हो चुका था। नादिरशाह देश को लूटकर जा चुका था और अहमद शाह अब्दाली समेत तमाम आक्रांता भारत पर आए दिन हमला कर भारत को लूट रहे थे। नाम मात्र का मुगल बादशाह दिल्ली में बैठा रहता था, जिसकी कोई नहीं सुनता था। संक्षेप में कहें तो भारत सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह बिखर चुका था। पूरे देश में चोर-डकैतों के पिंडारी गिरोह घूमते रहते थे, जो लोगों को मारकर लूट लेते थे। और कई बार इन गिरोहों को स्थानीय राजा, नवाब या जागीरदार का संरक्षण प्राप्त होता था। ऐसे अराजक देश को अपने कब्जे में लेने का प्रयास अंग्रेज कर रहे थे। इतिहास का यह भी एक पक्ष है, जिस पर चर्चा कम होती है।
ऐसे में उनके सामने दो उद्देश्य थे। पहला, भारत को उपनिवेश बनाया जाए और दूसरा, उस समय यूरोप में उत्पन्न हुई राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के तहत भारत को एक राष्ट्र के तौर पर विकसित किया जाए। ये दोनों काम अंग्रेजों ने काफी सफलता से पूरे किए। लेकिन भारत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य बनाने के क्रम में एक काम ऐसा हो गया, जो भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ था। भारत की सैकड़ों साल पुरानी सामाजिक संरचना बदलने लगी। यह काम करना तो मुगल शासक भी चाहते थे, लेकिन शुरुआती प्रयास के बाद कई वजहों से उन्होंने ऐसा नहीं किया। मसलन, सती प्रथा पर अकबर महान ने रोक लगाने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में उसने ऐसे प्रयास रोक दिए। लेकिन अंग्रेजों ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि भारत राष्ट्र-राज्य के रूप में बदल सके, इसके लिए पुरानी सामाजिक संरचना बदलनी जरूरी थी। इसलिए अंग्रेजों ने सामाजिक संरचना को बदलने का काम जारी रखा। बात चली है, इसलिए यह बता दें कि भारतीय समाज में बदलाव का श्रेय जिन्हें भी दिया जाता है, वे सब ब्रिटिश हुकूमत द्वारा संरक्षण प्राप्त थे, क्योंकि सत्ता के संरक्षण के बगैर ये परिवर्तन संभव ही नहीं थे।
एक-दो उदाहरण देता हूं। सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों पर रोक लगवाने वाले राजा राममोहन राय हों, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी बनाने वाले सर सैय्यद अहमद खान हों या फिर बीएचयू बनाने वाले मालवीय जी हों, इन सबके प्रयासों को उस समय की अंग्रेज सरकारों का आशीर्वाद मिला हुआ था। यहां तक कि जिन बाबा साहब अंबेडकर को अपना बताने की होड़ आज के नेताओं के बीच मची है, वे अंबेडकर भी महाकाय अंग्रेजी सत्ता के आशीर्वाद से ही बने।
इन्हीं सब प्रयासों के साथ देश आजाद हुआ, लेकिन विभाजन की त्रासदी के साथ। बहरहाल, आजादी के बाद जैसा अंग्रेजों ने प्रयास किया था, देश एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के तौर पर वैश्विक राजनीति में तेजी से उभरा। लेकिन यहीं पर थोड़ा रुक जाया जाए। प्रकृति या ईश्वर, जो भी कहिए, उसका विधान है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया जरूर होती है। सो, अंग्रेजों के इस प्रयास की भी हुई। देश पुराने ढर्रे पर लौटे और पुरानी सामाजिक संरचना फिर से बहाल हो, इसके प्रयास कई बार किए गए, लेकिन अलग-अलग वजहों से वे सफल नहीं हुए। तब उन असफल ताकतों में से कई ने मिलकर नए सिरे से संगठित प्रयास किया और सन १९२५ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बना।
इस संगठन ने पुरानी गलतियों से सबक तो सीखा ही, साथ ही अंतिम सफलता मिलने तक लचीलेपन और गोपनीयता पर अतिरिक्त ध्यान दिया। सफलता मिल सके, इसलिए जो भी जरूरी था, वह सब काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने किए। उस समय अंग्रेजों की सत्ता का संरक्षण उन्हें मिलता रहे, इसलिए तत्कालीन सत्ता ने जो भी चाहा, संघ ने किया। संघ पर आरोप लगता है कि स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने हिस्सा नहीं लिया। तो वे लेते भी क्यों? उन्हें मालूम था कि स्वतंत्रता के बाद जो भारत होगा, वह संघ को चाहिए ही नहीं था। अपने उद्देश्य का अगला चरण संघ ने स्वतंत्रता मिलने के तत्काल बाद ही शुरू कर दिया।
कई वजहों से आधुनिक राष्ट्र-राज्य बने भारत के प्रमुख शिल्पकारों में महात्मा गांधी महानतम थे। उनके रास्ते से हटने पर स्वतंत्रता के उस शुरुआती दौर में राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को धक्का मिलता, इसलिए महात्मा गांधी की हत्या हुई। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए संघ झूठ और हत्या जैसी चीजों को सैद्धांतिक मान्यता देता है, यह बात अब खुलकर सामने आ भी चुकी है।
दूसरा बड़ा काम संघ ने यह किया कि भारत की राजनीति में हिस्सा लेने के लिए जनसंघ का निर्माण किया, क्योंकि तब संघ अपने विस्तार के लिए समय चाहता था और उस तरह खुलकर सामने नहीं आना चाहता था, जैसे खुलकर वह इस समय देश की राजनीति में हस्तक्षेप करता है। लेकिन, बावजूद अपने विस्तार, छिपी रणनीतियों और षड्यंत्रों के, संघ और भाजपा को देश में बहुत मान्यता नहीं मिली। मोटे तौर पर सन १९९० तक अटल और आडवाणी की जोड़ी ही देश में संघ और भाजपा की पहचान बनी रही।
संघ और भाजपा की सफलता का दौर शुरू हुआ राजीव गांधी के कार्यकाल से, क्योंकि राजीव परिपक्व राजनीतिज्ञ नहीं थे और सत्ता बनी रहे, इसलिए उनके इर्द-गिर्द जुटे लोग कुछ भी करने पर आमादा थे। ऐसे ही लोगों की सलाह पर शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा गया। यह आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा पर पहली कड़ी चोट थी।
दूसरी बड़ी चोट बाबरी मस्जिद का ताला खोलना रही। कोर्ट का काम जब राज्य ने किया, ऐसे ही समय का इंतजार संघ और भाजपा कर रहे थे, जो उनको मिल गया। बाबरी मस्जिद का ताला खोलने से यह संदेश मिल गया कि अब राष्ट्र-राज्य की धारणा से परे, जो स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे और कानून के राज्य पर आधारित है, राज्य धर्म को भी आधार बनाकर शासन करने का पक्षधर होने लगा है।
साथ में ही एक काम और हुआ, जिसकी नींव सन १९६७ में ही पड़ गई थी। जाति के आधार पर राजनीति करने की शुरुआत तभी हुई थी, जिसको इंदिरा गांधी ने परवान नहीं चढ़ने दिया। लेकिन राजीव गांधी की मौत के बाद राजनीति की ऐसी बयार बही कि भारत की राजनीति जाति और धर्म के आधार पर ही संचालित होने लगी। यह राष्ट्र-राज्य की अवधारणा से एकदम विपरीत स्थिति बन गई। साथ ही, इस कोढ़ में खाज की तरह क्षेत्रीय दल बने, जो शासन करने के लिए कुछ भी करने पर उतारू हो गए। दो उदाहरण पर्याप्त होंगे। मायावती ने अपने कार्यकाल में आरक्षण में आरक्षण लागू कर सरकारी नौकरों में खलबली पैदा कर दी और सीनियर-जूनियर बन गए। लोगों को याद होगा। मुलायम सिंह ने स्वकेंद्र प्रणाली लागू कर दी, जिसमें परीक्षा केंद्र लाखों में बिके और धड़ल्ले से नकल हुई। यह भी आप लोगों को याद ही होगा। वोट के लिए मुसलमानों को भी चने के झाड़ पर चढ़ाया गया और सवर्ण जातियों को खूब गालियां दी गईं।
कुल मिलाकर माहौल ऐसा बन गया कि सवर्ण और संपन्न लोगों को लगा कि उनका तो अस्तित्व ही खतरे में है। उनको लगा कि इससे अच्छे तो पुराने दिन थे, जब उनका वर्चस्व था। ये सब स्थितियां भाजपा के अनुकूल थीं और उनकी सरकार बन गई।
अब यहां से आखिरी विरोधाभास शुरू होता है। मोदी सरकार अयोग्य है, लेकिन वह डराकर, लालच देकर और दंडित कर शासन करने में माहिर है। दूसरी तरफ व्यवस्था में सवर्ण वर्चस्व फिर से स्थापित तो हो ही रहा है। ऐसे में व्यवस्था पर काबिज सवर्ण जातियां मोदी के पक्ष में लामबंद होने में ही अपना हित देख रही हैं। व्यवस्था में बेईमानी तो है ही, लेकिन सवर्ण जातियों की लामबंदी भी है। न्यायपालिका और कार्यपालिका पर अभी भी सवर्ण वर्चस्व है और विधायिका मोटे तौर पर अयोग्य और भ्रष्ट है, जो फिलहाल मोदी के जादू पर टिकी है। इसलिए अस्तित्व और श्रेष्ठता बनी रहे, इस मानसिकता से सवर्ण मोदी के हित में लामबंद हैं। आज की सच्चाई यही है।
लेकिन, जैसा विधि का विधान है, हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। मोदी, अडानी, अंबानी काल और सवर्ण वर्चस्व के इस दौर में अयोग्यता, षड्यंत्र और बेईमानी की वजह से भारत अराजकता का शिकार बन चुका है। इस अराजकता से देश कैसे बाहर निकलेगा, यह बताना फिलहाल थोड़ा मुश्किल काम है। आप लोग भी इस विषय पर सोचिएगा और बताइएगा। इंतजार रहेगा।
अनहेस शाश्वत लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई बड़े अख़बारों में पदस्थ रहे हैं। उनसे संपर्क +91 6388 563 479 के ज़रिए किया जा सकता है।



somesh shukla
July 20, 2026 at 8:14 am
totally disagree with the points raised by Anhesh ji