Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

वेब-सिनेमा

शेयर बाज़ार की पस्ती दे रही आर्थिक सुनामी का संकेत!

अनिल सिंह-

शेयर बाज़ार कभी झूठ नहीं बोलता। कुछ समय के लिए उसे सायास नचाया जा सकता है। लेकिन लंबे समय के लिए नहीं। फिर यह विसंगति या विरोधाभास कैसे कि जब हमारा जीडीपी इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है तो शेयर बाज़ार गिरा ही जा रहा है? क्या सरकार का जीडीपी झूठ बोल रहा है? आईएमएफ तक यह कह चुका है। उसके दबाव में भारत सरकार को जीडीपी से लेकर मुद्रास्फीति और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक तक को नापने का तरीका बदलना पड़ा। लेकिन नीयत में खोट हो और सारा इको-सिस्टम ही झूठ की मुनादी करने लगा हो तो देश का आर्थिक सच अपने प्रत्यक्ष अनुभवों या प्रज्ञा के आधार पर ही महसूस किया जा सकता है।

वैसे, किताबें कहती हैं कि शेयर बाज़ार अर्थव्यवस्था नहीं है। इसलिए इस समय न तो देश का जीडीपी झूठ बोल रहा है और न ही शेयर बाज़ार। प्रत्यक्ष अनुभव की भी अपनी सीमा है। फिर देश के सम्पूर्ण आर्थिक सच तक कैसे पहुंचा जाए? इसमें प्रेस और मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनकर अहम भूमिका निभा सकता है। लेकिन अपने यहां 99% प्रेस व मीडिया सरकार को बिक चुका है, जबकि सोशल मीडिया अर्थव्यवस्था पर महज छिछली खिलाता जा रहा है। आईएमएफ का प्रोजेक्शन है कि भारत का जीडीपी 2026 या वित्त वर्ष 2026-27 में 4.15 ट्रिलियन डॉलर का हो सकता है, जबकि अभी 2025-26 में 3.92 ट्रिलियन डॉलर का रहा है। मगर सोशल मीडिया के दिग्गज देश के जीडीपी को अभी से 4.15 ट्रिलियन का बताए जा रहे हैं।

हम इसे आगे जानने-समझने की कोशिश करेंगे। अभी तो शेयर बाज़ार की पस्ती के मर्म को समझते हैं। कहा जाता है कि शेयर बाज़ार के करेक्शन या गिरावट की सैकड़ों वजहें हो सकती हैं और इसका इससे कोई रिश्ता नहीं कि फैक्ट्रियों, दफ्तरों व खेल-खलिहानों में क्या चल रहा है। करोड़ों निवेशकों व ट्रेडरों के डूबते दिल को बहलाने के लिए यह ख्याल अच्छा है। लेकिन जॉर्ज सोरोस के रिफ्लेक्सिविटी के सिद्धांत के अनुसार शेयर बाज़ार अर्थव्यवस्था को रिफ्लेक्ट ही नहीं करता, बल्कि वो अर्थव्यवस्था की सीटी-स्कैनिंग भी कर सकता है। जॉर्ज सोरोस का नाम तो आपने सुना ही होगा। वही जॉर्ज सोरोस, जो दुनिया में शेयर बाज़ार ही नहीं, करेंसी बाज़ार तक की हर ऊंच-नीच में अरबों डॉलर कमाने के उस्ताद रहे हैं। लेकिन भारत में सरकार उन्हें हर राजनीतिक विरोध की फंडिंग करने वाला षड़यंत्रकारी ठहरा देती है।

जॉर्ज सोरोस अगले महीने 12 अगस्त को 96 साल के हो जाएंगे। उनकी नेटवर्थ अभी 7.5 अरब डॉलर (करीब 72, 215 करोड़ रुपए) है, जबकि इसकी लगभग चार गुना रकम 32 अरब डॉलर वे डोनेट कर चुके हैं। 1987 में जब वे 57 साल के थे, तब उन्होंने एक किताब लिखी थी – द एलकमी ऑफ फाइनेंस। उस वक्त वे एक हेज फंड ट्रेडर थे। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की थी। हालांकि उनका रुझान दर्शन की तरफ ज्यादा था। उन्होंने अपना कोर्स एक साल पहले ही पूरा कर लिया। मगर डिग्री पाने के लिए उन्हें यह वक्त काटना था तो दार्शनिक कार्ल पॉपर के सानिध्य में ज्ञान प्राप्त करने में जुट गए। पॉपर के लेखन से वे पहले से काफी प्रभावित थे।

अर्थशास्त्र में सोरोस ने संपूर्ण प्रतिस्पर्धा से सब कुछ दुरुस्त हो जाने के बारे में पढ़ा था। वहीं, पॉपर का मानना था कि हमारे आसपास की दुनिया आधी-अधूरी है। यहां तक कि वैज्ञानिक नियम भी अंतिम व संपूर्ण नहीं है। सोरोस ने अपनी किताब ‘द एलकमी ऑफ फाइनेंस’ में वित्तीय बाज़ारों के बाबत अपने दार्शनिक रवैये को पेश करने की कोशिश की। उन्होंने तर्कसंगत अपेक्षा व कुशल बाज़ार की मानक अवधारणा में चूक की पूरी गुंजाइश का अपना सिद्धांत स्थापित किया। इस सिद्धांत को उन्होंने रिफ्लेक्सिविटी का नाम दिया।

चूक या रिफ्लेक्सिविटी की धारणा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि जिन परिस्थितियों में सोचने वाले लोग शामिल होते हैं, उनमें इन भागीदारों का नज़रिया कभी भी वास्तविक स्थितियों से पूरी तरह मेल नहीं खाता। हालांकि लोग अलग-अलग तथ्यों की पूरी व सही जानकारी हासिल कर सकते हैं। लेकिन इनके आधार पर जब सिद्धांत निकालने या समग्र नज़रिया बनाने का मसला आता है तो उनके परिप्रेक्ष्य या तो पूर्वाग्रही या असंगत या दोनों ही तरह की त्रुटियों के शिकार होते हैं। आसान शब्दों में कहें तो दुनिया इस कदर जटिल है कि हमारे पास उसे पूरी तरह समझने की क्षमता नहीं है। इसलिए हम चीज़ों को सरल बनाने की कोशिश में सरलीकरण या सामान्यीकरण का आसान व सुविधाजनक रास्ता पकड़ लेते हैं।

हालात के प्रति इन गलत, असंगत या पूर्वाग्रही नज़रिये से हम अनुचित फैसले लेकर गलत कदम उठा बैठते हैं। यह सिद्धांत साफ करता है कि मान्यता या धारणा और सच्चाई में इतना अंतर या गैप क्यों होता है और जब इस गैप के लूप में फंसकर लोग काम करते हैं तो उसका क्या परिणाम होता है। शेयर बाज़ार के संदर्भ में देखें तो निवेशक अगर मान लेते हैं कि बाज़ार एकदम दक्ष व निष्पक्ष है तो यह मान्यता उनके निवेश का तौर-तरीका बदल देगी और इससे उस बाज़ार का स्वभाव बदल जाएगा जिसमें वे भाग ले रहे हैं। तब बाज़ार दक्ष व निष्पक्ष नहीं रह जाएगा। यही सोच और सच्चाई का अंतर है जो आगे चलकर विसंगति पैदा कर देता है।

ज्यादातर यह अंतर बहुत छोटा और बिना किसी नुकसान वाला होता है। शेयर थोड़ा गिर जाते हैं। कोई परवाह नहीं करता। जीवन जस का तस चलता रहता है। लेकिन कभी-कभी अंतर ज्यादा ही संगीन होता है और खुद को ही खाने लगता है। अभी अपना बाज़ार इसी अवस्था में फंसा हुआ है। विचित्र अंतरविरोध है कि जब जीडीपी बराबर बढ़ा जा रहा है, तब शेयर बाजार में पस्ती और गिरावट का आलम है। कहीं यह भविष्य की बडी दुर्दशा का संकेत तो नहीं? कुछ लोग कहेंगे कि सब तात्कालिक मसला है। शॉर्ट-टर्म हल्ला है, शोर है। पश्चिम एशिया में तनाव है। कच्चे तेल के दाम गिरने के बावजूद 80-90 डॉलर प्रति बैरल की रेंज में हैं। डॉलर 96 रुपए के पार है। ये सब फौरी समस्याएं हैं। इससे निवेशकों की चूक या रिफ्लेसिविटी का कोई वास्ता नहीं। लेकिन भारतीय शेयर की संरचना के साथ ही उसका स्वरूप पिछले कुछ सालों में काफी बदल चुका है।

इस साल फरवरी में आए 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक शेयर बाज़ार में व्यक्तिगत निवेशकों का हिस्सा वित्त वर्ष 2013-14 से सितंबर 2025 तक लगभग 11% से बढ़कर 18.8% हो चुका है। घरों या हाउसहोल्ड की वित्तीय बचत में शेयरों व इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश का हिस्सा वित्त वर्ष 2011-12 में महज 2% के आसपास था। वित्त वर्ष 2024-25 तक यह 15.2% हो गया। म्यूचुअल फंड एसआईपी में वित्त वर्ष 2016-17 तक औसतन 4000 करोड़ रुपए आते थे। यह रकम बीते वित्त वर्ष 2025-26 में 28,000 करोड़ रुपए को पार कर गई। अप्रैल 2020 से सितंबर 2025 तक घरों की शेयर बाज़ार में लगी सम्पदा लगभग 53 लाख करोड़ रुपए बढ़ गई। यह दिखाता है कि हमारा मध्यवर्ग शेयर बाज़ार में किस तरह धंसता गया है। यह स्थिति पांच साल पहले तक कतई नहीं थी।

यही से वो खतरा, वो रिस्क पैदा हो रहा है, जिसके बारे में आर्थिक सर्वेक्षण ने चेताया था कि हमारे शेयर में तेज़ गिरावट रिटेल निवेशकों के सेंटीमेंट और खर्च पर सीधे चोट कर सकती है। इससे एक विकट दुष्चक्र शुरू हो सकता है क्योंकि रिटेल निवेशकों में इस वक्त युवा निवेशकों की भरमार है जो बाज़ार में कोविड की महामारी के बाद नए-नए आए हैं। उन्होंने अभी तक बाज़ार का बढ़ना ही देखा। तेज़ी ही देखी है। पहली बाद मंदी की जकड़ से रू-ब-रू हो रहे हैं। देश की क्रय शक्ति का बड़ा हिस्सा अब सीधे-सीधे सेंसेक्स और निफ्टी की धड़कनों, उसके आरोह-अवरोह, उसके उतार-चढ़ाव से जुड़ चुका है। फिलहाल मान्यता और सच्चाई के गैप का फंदा करने लगा है। एक विकट दुष्चक्र शुरू हो चुका है।

म्यूचुअल फंड एसआईपी का घटना इसका पहला संकेत है। मार्च 2026 में एसआईपी के बंद हो जाने का अनुपात 100% के पार चला गया है। मतलब जितने नए एसआईपी आ रहे हैं, उससे ज्यादा बंद हो रहे हैं। आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ था। निवेश में एसआईपी लगाकर भूल जाओ का तरीका मंदी का शिकार होने लगा है। यह देश के मध्यवर्ग की पस्ती को दिखाता है। अलग बात है कि हमारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अब भी विदेश में जाकर इसी मध्यवर्ग की बाज़ार ताकत को बेचे जा रही है। फिर भी विदेशी निवेशक नहीं आ रहे हैं तो बैंकों को हिदायत दे रही हैं कि विदेश में रह रहे अनिवासी भारतीयों की बचत को पकड़ो ताकि देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ सके। लेकिन इससे देश में चल निकला दुष्चक्र थमकर ठहर जाएगा?

एसआईपी का अनुशासन टूटने का अगला असर मध्यवर्ग की खपत पर पड़ा है। कोई अगर देखता है कि उसके पोर्टफोलियो का मूल्य घटता जा रहा है तो यकीनन वो अपना घर नहीं बेच देगा। लेकिन नया मोबाइल खरीदना, कार को अपग्रेड करना, घर का रिनोवेशन और छुट्टियों पर जाना रोक सकता है। इस सोच व रुझान को शेयर बाज़ार के लाखों सक्रिय ट्रेडरों और करोड़ो एसआईपी धारकों से गुणा कर दें तो देश की अर्थव्यवस्था पर पड़नेवाले असर का सहज अहसास किया जा सकता है। बहुत सारे लोग सप्ताह-दर-सप्ताह पहले से कम अमीर होते जा रहे हैं। उनके माथे पर पसीना छा गया है और दिलों की धड़कनें बढ़ गई हैं।

दूसरी तरफ हो यह रहा है कि शेयर बाजार में जारी गिरावट से पूरा वित्तीय तंत्र हिलने लगा है। बैंकों और बॉन्ड बाज़ार में एक तरफ की घबराबट छाने लगी है। वे ऋण देने की शर्तें कड़ी कर रहे हैं या ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं। भले ही रिजर्व बैंक रेपो दर को पकड़कर बैठा है। कंपनियां जो अपने ऋण को रोल करती रही हैं, अब ऐसा नहीं कर पा रही हैं और सॉल्वेंसी खतरे में पड़ गई है। इससे सिस्टम में उधार का चक्र जाम होने लगा है। कंपनियों के अधिकारी अपने शेयरों को लुढ़कता देखकर परेशान हैं। अपनी बैलेस शीट को बचाने और शेयरधारकों को संतुष्ट रखने के लिए वे पूंजी व्यय काट रहे हैं, नई नौकरियां नहीं कर रहे और ले-ऑफ कर रहे हैं।

इस तरह कॉरपोरेट खर्च घटाने पर आमादा है। कंपनियां खर्च घटा रहीं है और कर्मचारियों की छंटनी कर रही हैं तो बेरोज़गारी बढ़ रही है और आर्थिक विकास सुस्त पड़ रहा है। इस तरह शेयर बाज़ार के करेक्शन ने आर्थिक गिरावट पैदा कर दी है और आर्थिक गिरावट शेयरों के गिरने की वजह बन जा रही है। पहले से दूसरा, दूसरे से पहला। दुष्चक्र का पहिया घूमता ही जा रहा है।

सोरोस की ‘रिफ्लेक्सिविटी’ का लूप जारी है। खपत घट रही है। यह कॉरपोरेट क्षेत्र की घटती या ठहरी आय में दिख रही है। बाज़ार आय में इस कमज़ोरी से चल रही गिरावट या करेक्शन का जायज मानने लगता है। इससे गिरावट और बढ़ जाती है जिससे लोग खुद को पहले से ज्यादा गरीब महसूस करने लगते हैं। ऐसे में 2025-26 में जीडीपी का 7.7% बढ़ना किसी को आश्वस्त नहीं कर रहा। न विदेशी निवेशकों को और न ही देशी निवेशकों को। कॉरपोरेट क्षेत्र भी संकरी गली से निकलने की फिराक में है। इस बीच अर्थव्यवस्था का बैरोमीटर कहा जानेवाला शेयर बाज़ार इतना बड़ा और इतने ज्यादा घरों से जुड़ चुका है कि अंदर-अंदर पनप रही आर्थिक सुनामी का संकेत देने लगा है।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन