डॉ नदीम अख्तर-
जितने भी चर्चित टीवी एंकर्स को टीभी पर जंतर मंतर प्रदर्शन पे ज्ञान देते देख रहा हूं, उन सबको मेरी बिना मांगे एक सलाह है।
आप सभी एंकर्स खुद मैदान में आइए और जंतर मंतर से रिपोर्टिंग करिए।
पब्लिक क्या चीज़ है, इसका एहसास आपको जीवन में पहली बार होगा। बेचारे रिपोर्टर्स को बलि का बकरा ना बनाइए।
साथ ही टीभी के संपादक भी मैदान में आएं। उन्हें भी पता होना चाहिए कि स्टूडेंट्स उनके नेतृत्व के बारे में क्या राय रखते हैं। एक बार आकर तो देखें! कुछ पल तो गुजारिए जंतर मंतर पे! चैनल आईडी का माइक लेकर!!!
फंसता है रिपोर्टर, कैमरामैन और टेक्निकल टीम!
कुछ टीवी रिपोर्टर्स से इस बारे में चर्चा हुई। सबका दर्द एक ही है। खेत खाए गधा, मार खाए उसका मालिक।
प्रमोद जोशी-
सोमवार को मीडिया के ख़िलाफ़ नाराज़गी में कुछ वैसे पत्रकार भी रिपोर्टिंग के दौरान निशाने पर आए जिनकी छवि सरकार परस्त वाली नहीं है.
विरोध प्रदर्शन में पत्रकारों के ख़िलाफ़ नाराज़गी का एक वीडियो क्लिप रीपोस्ट करते हुए पत्रकार पूनम पांडे ने एक्स पर लिखा है, ”मीडिया से नाराज़गी हो सकती है लेकिन रिपोर्टर को टारगेट करना सही नहीं है. रिपोर्टर ही है जो ग्राउंड पर उतरता है, तपती धूप हो या बरसात. नाराज़गी सही जगह निकलनी चाहिए.”
इसके जवाब में प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह ने लिखा, ”टीवी पर नफ़रत फैलाने वाले एंकरों, प्रेजेंटरों और वरिष्ठ पत्रकारों के साथ टीवी रिपोर्टरों के बीच फ़र्क़ करना ज़रूरी है. टीवी रिपोर्टरों में से अधिकांश काफ़ी मेहनती होते हैं.”
लेकिन विजेता सिंह की यह बात इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक और द प्रिंट के संस्थापक शेखर गुप्ता को पसंद नहीं आई. जवाब में शेखर गुप्ता ने लिखा, ”नहीं विजेता, हम यह फ़ैसला भीड़ पर नहीं छोड़ सकते कि किस पत्रकार से प्यार किया जाए और किससे नफ़रत. वरिष्ठ हों या जूनियर, हर पत्रकार को अपना काम करते समय पूरी तरह सुरक्षित महसूस होना चाहिए. एक भीड़ के लिए जो ‘अच्छा’ पत्रकार है, वही दूसरी भीड़ के लिए ‘ख़लनायक’ हो सकता है.”
”इस प्रवृत्ति की शुरुआत अन्ना आंदोलन के दौरान हुई थी और उस समय भी कई पक्षधर लोगों ने इसका समर्थन किया था. तब भी यह ग़लत था और आज भी ग़लत है.”


