पुष्प रंजन-
इसकी फटी पड़ी है!

यह इस्तीफ़ा देगा भी, और राहुल गांधी को इसके इस्तीफ़े का क्रेडिट मिलेगा? यह सबसे बड़ा सवाल है. इसे इसकी ही पार्टी में लोग पसंद नहीं करते। बड़ा एरोगेंट है. बहुत से बीजेपी सांसद चाहते हैं, कि इसकी मलाईदार कुर्सी जाये। धर्मेंद्र प्रधान पहली बार 7 जुलाई 2021 को भारत के केंद्रीय शिक्षा मंत्री बने थे। इसके बाद, जून 2024 में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में भी उन्हें लगातार दूसरी बार केंद्रीय शिक्षा मंत्री का कार्यभार सौंपा गया है। शाह जी और मोदी जी का प्यारा दुलारा प्रधान, अब उनके गली की हड्डी बन चुका है.
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, जिनके इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, बुरी तरह से बौखलाया हुआ है. अबतक वांगचुक के विरोध से वो असहज नहीं हुआ था, लेकिन राहुल गांधी की इंट्री होते ही वो बौखला गया है.
प्रधान ने मंगलवार को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर आरोप लगाया कि वे छात्रों के मुद्दे का राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रहे हैं।
X पर एक पोस्ट में, प्रधान ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी “संसद के मॉनसून सत्र के दौरान रुकावट पैदा करने के लिए छात्रों का राजनीतिक हथियार के तौर पर बेशर्मी से इस्तेमाल करते रहे हैं”। उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी और कांग्रेस ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना दिया, जिससे जनता को परेशानी हुई और सुरक्षा के तय नियमों की अनदेखी की गई।
प्रधान ने आरोप लगाया, “सरकार द्वारा व्यापक चर्चा के लिए तैयार होने की बात कहने के बावजूद, कांग्रेस ने लोकतांत्रिक बहस के बजाय राजनीतिक तमाशा चुना। उनका मकसद कभी भी छात्रों के लिए समाधान खोजना नहीं था, बल्कि राजनीतिक सुर्खियां बटोरने के लिए रुकावट पैदा करना था।”
अकु श्रीवास्तव-
अब तो धर्मेंद्र प्रधान चले भी जाओ!
मुझे लगता है कि 20 जुलाई को संसद के आसपास हिंसा का जो तांडव दिखा, जो प्रशासनिक अव्यवस्था हुई, उसके कारणों के पीछे कुछ भी हो. एक बात तो साफ है वो है कि नीट की पहले दौर की परीक्षा कराने में विफलता के बाद ही केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा दे ही देना चाहिए था ताकि यह नौबत ही नहीं आती। कहने को कहा जा सकता है कि पहले भी बहुत सी परीक्षाएं हुई हैं, लीक भी हुईं हैं, पर यह मानने में कोई बुराई नहीं है कि मानव संसाधन मंत्रालय या शिक्षा मंत्रालय बहुत सारे कामों में विफल रहा है।
नीट की पहले दौर की परीक्षा की विफलता ने हजारों बच्चों के ही मंसूबे नहीं तोड़े बल्कि उनके मां-बाप, उनके परिवार के भी सपनों को चकनाचूर कर दिया। उसके बाद दर्जनों बच्चों ने तनाव में आत्महत्या कर ली। पिछले अनेक वर्षों में सर्वाधिक विफल मंत्रालयों में से मानव संसाधन मंत्रालय का जिक्र हो सकता है या रहा है। उसकी जिम्मेदारी धर्मेद्र प्रधान पर ही नहीं रही है, पूर्ववर्तियों पर भी रही है। न ही इनसे एक दिशा में जा रहे इतिहास सुधारने का काम हो पाया और न ही छात्रों के लिए एक दिशा बनाने का काम।
व्यावसायिक शिक्षा को थोड़ा रास्ते पर नहीं ला पाए। शिक्षकों की भर्ती को लेकर बातें होती ही रहती हैं। दूसरे दौर की नीट की परीक्षा के बाद जिस युद्ध स्तर पर अन्य विभागों मंत्रालयों के साथ तैयारी की और कराई गई, अगर यही पहले किया गया होता तो दोबारा परीक्षा को कराने की नौबत ही नहीं आती।
अब जब दूसरे दौर की परीक्षा हो गई है , इसके सफलता पूर्वक कराने में फिलहाल धर्मेंद्र प्रधान पास हो गए हैं, तो अब कम से कम धर्मेन्द्र प्रधान को खुद इस्तीफा देकर नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए और सरकार पर बोझ नहीं बने रहना चाहिए। खास तौर से ऐसी स्थिति में जब संसद की ओर किए गए मार्च में 20 जुलाई को जो हिंसा हुई है, उसमें युवा और पुलिसकर्मी दोनों ही घायल हुए हों, उसकी भूमिका में नीट ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने साथियों पर विश्वास रखने में भरोसा रखते हैं लेकिन धर्मेंद्र प्रधान को चाहिए कि वो अपने बच्चे की खातिर इस्तीफा दे कर यह साबित करें कि अगर उनके पारिवारिक बच्चों के साथ भी ऐसी त्रासदी होती तो वो क्या करते?
इसलिए धर्मेंद्र प्रधान के लिए इस्तीफा देने के लिए सही वक्त यही है।
राकेश कायस्थ-
प्रधान जी इस्तीफा नहीं देंगे
मोदी राज में दो जाली डिग्रियों वाले शिक्षा मंत्रियों की यशस्वी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए श्रीमान धर्मेंद्र प्रधान ने 2021 भारत के बच्चों का भविष्य संवारने का बीड़ा उठाया। प्रधान जी की डिग्री के बारे में कोई दावा नहीं लेकिन कारनामों के मामले में वो स्मृति ईरानी और रमेश पोखरियाल निशंक से बीस साबित हुए।
पिछले दो शिक्षा मंत्रियों के कार्यकाल दो बार नीट पेपर लीक हुए थे लेकिन प्रधान जी ने अकेले ये कारनामा तीन बार करवा दिया। तीसरी बार पेपर लीक हुआ और अलग-अलग शहरों के निराशा में डूबे बीस बच्चों ने अपनी जान ले ली। पूरे देश में गुस्सा दौड़ पड़ा।
क्या 24×7 चुनावी मोड में रहने वाली बीजेपी को ये समझ में नहीं आया होगा कि मरने वालों में ज्यादातर लोग उसके कोर वोटर समूह से हैं? अगर सरकार चाहती तो बड़े आराम से धर्मेंद्र प्रधान को भावुकता का अभिनय करते हुए नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने को कह सकती थी, इससे साख बच जाती और मामला तत्काल शांत हो जाता। लेकिन सरकार ने ये कारगर रास्ता नहीं चुना आखिर क्यों?
वजह बहुत साफ है। बीजेपी अब एक राजनीतिक दल नहीं है बल्कि सिर्फ एक तानाशाह की ड्यूटी बजाने वाले राजनेताओं, उद्योगपतियों, भगवाधारी ठग, फिक्सर और दलालों का समूह है। नरेंद्र मोदी की जिद है कि देश में होनेवाले हर छोटे काम का श्रेय उन्हें मिले लेकिन बड़ी से बड़ी भूल पर उन्हें कोई जवाब ना देना पड़े। यही ‘मोदी दर्शन’ केंद्र सरकार और बीजेपी शासित राज्य सरकारों की गवर्निंग प्रिंसिपल है। सत्ता तंत्र की बेलगाम बदत्तीमीजी का सूत्र इसी मोदी दर्शन में छिपा है।
मोदी के बीजेपी में इस्तीफे का मतलब विनम्रता से अपनी कमी को स्वीकार करना और जन-कल्याण के लिए बेहतर रास्ते ढूंढना नहीं है। यहां इस्तीफे का मतलब है, हार। इस्तीफे का मतलब है डर का खत्म हो जाना। मोदी जानते हैं कि जिस दिन उनका डर खत्म हो गया उसी दिन सब कुछ खत्म हो जाएगा, इसीलिए वो डर बनाये रखना चाहते हैं। दिल्ली के प्रोटेस्ट के दौरान यही कोशिश दिखी।
मोदी की हुकूमत ने ये तय किया है कि जो उसे वोट देगा नागरिक उसी को मानेगी। पत्रकार वही कहलाएगा जो तलवे चाटेगा और छात्र वही कहलाएंगे जो इस अनपढ़ युग की कमियों पर कुछ नहीं बोलेंगे। नीट के नये रिजल्ट में अब भी गड़बड़ियों की शिकायतें आ रही हैं। ये इस बात का सबूत है कि शिक्षा और परीक्षा प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।
ऐसे माहौल में बीजेपी का X हैंडिल देखिये। बीजेपी ये दावा कर रही है कि जो छात्र थे, वो कामयाब हो गये और जो सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं वो गुंडे हैं। जिन परिवारों ने अपने बच्चे खोये हैं, उनके दिल पर क्या गुजर रही होगी, क्या वो मोदी को कभी माफ कर पाएंगे?


