विमल दीक्षित-
विष गुरु की पत्तेचाटी करके इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने कितनी अच्छी साख कमाई है। इसका उदाहरण देश में चल रहा है छात्र आंदोलन है। हर जगह उनके रिपोर्टर की हूटिंग हो रही है और भगाए जा रहे हैं।
खास बात यह है कि इतने बड़े देशव्यापी छात्र आंदोलन से अंजना ओम, श्वेता, रुबिका, अमीश, नाविका, अर्णव जैसे सत्ता के तलवेचाट कुख्यात एंकर पूरे सीन से गायब है। अगर यह लोग वहां जाकर कवरेज करते तो इनके चैनलों को भयंकर टीआरपी मिलती। मगर सत्ता की दलाली करते इनकी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह जंतर मंतर जाकर छात्र आंदोलन की कवरेज करें।
अब यह ऐसी न्यूज़ रूम में बैठकर फंडिंग कहां से आ रही है, पाकिस्तान एंगल, हिंदू मुसलमान, चीन, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, संजय सिंह जैसे नेताओं का नाम लेकर देश की जनता को बरगलाने में लगे हैं। देखा जाए तो इन एंकर्स की भी गलती नहीं है। असली गलती तो उनके चैनल मालिकों की है जो सत्ता की दलाली कर जनता को बरगलाने की आड़ में मोटा पैसा कमा रहे हैं।
कहना चाहिए चैनल सरकार की फंडिंग से ही चल रहे हैं। अगर सरकार इनको फंड देना बंद कर दे तो इनके चैनल चार दिन नहीं चल पाएंगे। हम तो कह रहे हैं कि अपने चैनलों की साख को देखने के लिए टीम के साथ अरुण पूरी, रजत शर्मा, गौतम अडानी, सुभाष चंद्रा और अंबानी को जंतर मंतर जाना चाहिए। और अपने चैनल के माध्यम से देश को बताना चाहिए कि छात्रों की क्या मांग है और वह किस लिए आंदोलन कर रहे हैं। मगर यह शातिर लोग हैं। इनको मालूम है कि उन्होंने सत्ता की मलाई खाने और देश की जनता को बेवकूफ बनाने के लिए क्या-क्या गुल खिलाए हैं। इनकी तो वहां जाने की हिम्मत नहीं है।
अब चैनल के प्रोड्यूसर और संपादक नए लड़कों को भेज कर छात्र आंदोलन की कवरेज करना चाहते हैं। छात्र इनके चैनलों को देखना नहीं चाहते। उनके गुस्से का शिकार नए रिपोर्टर भुगत रहे हैं। और जो कवरेज हो भी रही है वह चोरी छुपे हो रही है। यह बेशर्म चैनल मलिक शाम पांच बजते ही डिबेट के नाम पर सरकार की गलतियों को छुपाते हैं और जो सवाल सत्ता से पूछना चाहिए वह विपक्ष के प्रवक्ताओं से पूछते हैं। एंगल वही है हिंदू मुसलमान, पाकिस्तान कनेक्शन, चीन से फंडिंग छात्रों को अराजक तत्व बोलना आदि।
इनके डिबेट की खास बात यह है कि वही 10-15 प्रवक्ता है जिनको स्टूडियो में बुलाया जाता है और बहस का रूप दिया जाता है पिछले कई वर्षों से यही हो रहा है बाद में यही प्रवक्ता अपनी जेब में लिफाफे डालकर एक ही गाड़ी में अपने अपने घरों को निकल जाते हैं और हंसते हैं कि किस तरह से आज जनता को बेवकूफ बनाया। लेकिन देश का आम नागरिक इनकी करतूत को समझ गया। लोगों की एक बहुत बड़ी संख्या है जिन्होंने इनके चैनल की फर्जी डिबेट और समाचार को देखना बंद कर दिया है। वह इसके बजाए सोशल मीडिया में आ रही खबरों को देखता है।
इन बदमाश चैनलों के मालिकों को यह पता चल गया है कि उन्होंने मोदी शासन काल में किस तरह जनता को बरगलाकर अपना बैंक बैलेंस मजबूत किया। अब उनके मुंह से झाग निकल रहा है। स्टार एंकर अपनी खिसकती जमीन को देखकर बिलबिला हुए हैं। जो इतने साल में बोया है वही काटना पड़ रहा है। मैं तो कहता हूं है तो वह जंतर मंतर जाकर लाइव कवरेज करें। मगर यह डर के मारे नहीं जाएंगे। उनको आशंका है कि छात्र उनको जुतियाएंगे जरूर।
इनकी जैसी स्थित प्रिंट मीडिया की भी है। दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, हिंदू जैसे अखबार पूरी दम के साथ इस बात की होड़ लगाए हैं की विष गुरु की चापलूसी में कौन आगे निकलता है। इन ससुरे चैनल और अखबार के मालिकों ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का भट्ठा बैठा दिया है। सारे अखबारों से अलग अगर कुछ देखना है और सच्चाई देखनी है तो टेलीग्राफ और भास्कर की खबरें पढ़ें। यह दोनों वही लिख रहे हैं जो दिख रहा है। जो पत्रकारिता का धर्म है यह वही काम कर रहे हैं और अपनी साख को मेंटेन किए हैं।
बहरहाल सारा लब्बोलुआब अब यह है कि छात्र आंदोलन आगे बढ़ रहा है और पूरे देश में फैल चुका है। छात्रों की छोटी सी मांग थी कि शिक्षा मंत्री को मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया जाए और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच हो। मगर मोदी सरकार अपने कमाऊ पूत को कैसे बर्खास्त कर सकती है। सरकार छात्रों की मांग मान लेती तो इतना बड़ा बखेड़ा नहीं होता। मोदी सरकार के सामने दिक्कत यह है अगर शिक्षा मंत्री को बर्खास्त करते हैं तो पूरे मंत्रिमंडल को बर्खास्त करना पड़ेगा और स्वयं भी झोला उठाना पड़ेगा। क्योंकि नीचे से ऊपर तक सब करप्ट हैं।
मुझे नहीं लगता अपनी दमनकारी नीति से सरकार छात्र आंदोलन को दबा पाएगी।
डॉ नदीम अख्तर-
अखबार और टीवी में मैंने जब भी रिपोर्टिंग टीम को लीड किया, मेरी सबसे ज्यादा नज़र अपने क्राइम रिपोर्टर पर रहती थी। एक वक्त ये भी रहा कि जब दैनिक जागरण ग्रुप के अखबार inext के सभी राज्यों के एडिशन को हेडक्वॉर्टर कानपुर बैठकर लीड कर रहा था तो तत्कालीन मेरठ एडिशन के संपादक रोज़ फ्रंट पेज पे क्राइम की स्टोरी को लीड खबर बनाकर छाप देते थे।
इसका कारण मुझे ये बताया कि मेरठ क्राइम सिटी है। यहां क्राइम बिकता है। ये जवाब मुझे बेहद बेतुका लगा। काहे का क्राइम सिटी भाई? क्या मेरठ के सारे लोग तमंचा पॉकेट में रखकर घर से निकलते हैं? मैंने सुझाव दिया कि कुछ अच्छी पॉजिटिव खबरों को भी पेज वन की लीड बनाया जाए वरना पाठक अखबार से दूर भागने लगेंगे। कितने सारे एजेंडे हैं छापने को!
खैर। ये कहानी इसलिए याद आई कि दिल्ली के जंतर मंतर पर पुलिस की कार्रवाई और उनके कारनामों के इतने वीडियो वायरल हैं पर दिल्ली के सारे नामी क्राइम रिपोर्टर बिलों में दुबके पड़े हैं। उनके संपादक भी नींद की गोली खाए हुए हैं। सिविल ड्रेस में हवाई चप्पल पहनकर कौन लोग थे, जो दिल्ली पुलिस के साथ मिलकर स्टूडेंट्स पर लाठियां भांज रहे थे, इस पे स्पेशल स्टोरी कोई क्राइम रिपोर्टर आज तक नहीं कर पाया। इंडियन एक्सप्रेस अखबार का रिपोर्टर भी। पचासों किस्से हैं। मैं अखबार में होता तो पूरा एक पेज रोज़ दिल्ली पुलिस पर फोकस करता क्योंकि सरकार की तरफ से यही लोग ज़मीन पे स्टूडेंट्स से लड़ रहे हैं।
आज तक के एक क्राइम रिपोर्टर का नाम याद आता है शम्स ताहिर खान। आजकल डिजिटल युग में ये पर्दे पे कहानी सुनाने लगे हैं। ये भी दिल्ली पुलिस की कहानी दर्शकों और देश को नहीं बता पाए। संपादक ने भी सुधि नहीं ली।
जंतर मंतर की कहानी देखकर लगा कि दिल्ली के सारे क्राइम रिपोर्टर पिकनिक मनाने गए हुए हैं। रिपोर्टर की खबर अगर उनका संस्थान नहीं छापता या दिखाता है तो काबिल रिपोर्टर अपनी स्टोरी को डिजिटल मैदान में पसार देता है। खबर जनता तक जाने से मतलब है। कैसे भी जाए।
या दिल्ली के सारे क्राइम रिपोर्टर अब सिर्फ IPS के साथ फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पे डालने को ही अपने धंधे का उसूल मान चुके हैं!


