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जब जयप्रकाश पांडेय ने न्यूजरूम में संजीव पालीवाल के कान में कहा- ‘सर, ये लड़की तो बहुत गाली देती है’

T thoughtful man wearing glasses and an orange polo sits in front of a bookshelf full of colorful books, hand on chin.

संजीव पालीवाल-

मैं अपने ऑफिस के सबसे उम्रदराज़ लोगों में से एक हूं। मुझसे ज्यादा उम्र के एक या दो ही लोग होंगे। और मेरे इर्दगिर्द नब्बे फीसदी Gen Z हैं। तो इनकी भाषा से मैं पूरा तो नहीं लेकिन काफ़ी हद तक वाकिफ हूं। ये भी जानता हूं कि ये पीढ़ी जेंडर न्यूट्रल हो चुकी है। हर तरह से और गालियों में भी। मैं यहां सही और गलत की बात नहीं कर रहा। बस वस्तुस्थिति से अवगत करा हूँ।

करीब सात आठ साल पहले हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी मेरे पास आये। काफी गंभीर थे। उनके कान लाल हो रहे थे। मैंने कहा कि क्या हुआ?

बोले सर, ये लड़की तो बहुत गाली देती है। उन्होंने किसी का नाम लिया।

मैंने पूछा कि आपको गाली दी क्या।

नहीं सर, लेकिन किसी पर गुस्सा थी तो अनाप शनाप गाली दे रही थी।

मैने फिर पूछा कि कौन सी गाली दी।

उन्होंने कान पर हाथ रखे और बोले सर, मैं तो कभी जबान पर भी नहीं ला सकता। उन्होंने अपना कान पकड़ कर कहा। इतनी गाली दे रही थी कि मैं तो उठ कर चला आया। वो बेचारे इस बात से बेहद परेशान थे कि लड़की गाली दे रही है।

अब मेरे इर्द गिर्द ये तमाशा रोज़ होता है।

पहली बार 1994 में मिला था एक ऐसी लड़की से जो खुल्ले में गाली देती थी। तब अचरज हुआ था।

फिर ऐसी लड़कियां मिलती रहीं। उन्होंने मुझे समृद्ध किया। बताया कि गाली देने का हौसला आने से सड़कों पर लफ़ंगों से लड़ना आसान हो गया। पुरुष गाली देने वाली लड़कियों से बहुत घबराता है। ये उनका ऑब्ज़र्वरवेशन था। आज से तीस साल पहले।

आज जब किसी लड़की के मर्दों को गाली या मर्दों के सामने गाली देता देखता हूं तो उसके कान्फिडेंस पर गर्व करता हूं।

गाली देना या ना देना पर ज्ञान देकर मैं लड़कियों के कॉन्फ़िडेंस को कमज़ोर नहीं कर सकता। अभी तो वो चलना और खड़े होना सीख रही हैं । अभी तो रास्ता बहुत लंबा है।

अपना अच्छा बुरा खुद सीख जायेंगी।


Head-and-shoulders portrait of a man with black hair, mustache, glasses, wearing a camouflage shirt, outdoors with greenery in the background.
Jaiprakash pandey

जय प्रकाश पांडेय-

गाली? किसकी, किसको, किसके द्वारा और क्यों? यह प्रश्न Sanjeev Paliwal सर की इस टीप पर अचानक नहीं उपजा. दरअस्ल ७-८ साल पहले अपने साथ काम कर रही एक लड़की के मुंह से गालियां सुन लाल कान के साथ मैं ही उनके पास पहुंचा था; और कमोवेश इन्हीं प्रश्नों के साथ, जिन्हें आप सबसे भी उत्तर की उम्मीद में ही लिख रहा. वे गालियां मुझे नहीं दी गई थीं, पर मैं उनका श्रोता था.

संजीव सर उदार हैं, उन्होंने जितनी सहजता से यहां लिखा है, उतनी ही सहजता से इसे तब भी ‘न्यू नार्मल’ कहा था.

बात लड़की – लड़के के भेद की है ही नहीं. प्रश्न यह है कि –
१. गाली कोई किसी को क्यों दे?
२. गाली किसी को तभी क्यों दी जाती है, जब नाराजगी हो?
(ना-ना, वैवाहिक समरोहों और बनारसियों के बीच आपसी संवाद वाली गालियों का उद्धरण न दें, मैं उसी परिवेश का हूं, पर स्वयं गाली देना, खाना पसंद नहीं करता)
३. गाली हमेशा कमजोर को ही क्यों दी जाती है?
४. गाली हमेशा स्त्री केंद्रित ही क्यों होती है?
५. गाली हमेशा अपमानित करने या खीझ उतारने के हथियार के रूप में ही क्यों इस्तेमाल होती है?
६. यह अपने माता-पिता, पति, या जिन्हें प्यार करते हैं, जिनका सम्मान करते हैं के समक्ष क्यों नहीं दी जाती है?
७. … और जब, जिसे गाली दी जा रही हो, वह तो अनुपस्थित हो, पर दूसरा केवल इसलिए सुने कि वह वहां उपस्थित हैं, तो वह अपने को गाली के कुप्रभाव से कैसे बचाए?

हम अपने को संस्कार और मान्यताओं वाला देश कहते हैं. ‘मानो तो देव, नहीं तो पत्थर’ में विश्वास करते हैं. उत्तर, तब भी नहीं मिला था, आज भी नहीं मिलता है. वह लड़की अब भी मेरी सहयोगी है. उससे स्नेह भी है और उसके काम का प्रोत्साहन भी…. पर उसके मुंह से गालियां, चाहे किसी को हों, अब भी अप्रिय लगती हैं. यह और बात है कि वह अब भी नाराजगी की स्थिति में उसी प्रचुरता और उसी धड़ल्ले से वैसे ही गरिष्ठ, अप्रिय, शब्दों को उच्चारती है…. पर अब कान ही नहीं चेहरा भी लाल होता है, आक्रोश से नहीं शर्म और दुख से…यह और बात है कि संजीव सर को अब नहीं बताता.

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