श्रीपाल शक्तावत-
नंगेपन की इंतिहा!
किसान आंदोलन (2020-2021) की कवरेज के दौरान स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया की पुलिस द्वारा मौके पर गिरफ्तारी की गई थी ।
30 जनवरी 2021 को सिंघु बॉर्डर से स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया के साथ ही ‘ऑनलाइन न्यूज इंडिया’ के पत्रकार धर्मेंद्र सिंह को भी दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। अगले दिन धर्मेंद्र सिंह को पूछताछ के बाद रिहा कर दिया गया था।
इसी दौरान क्लाइमेट एक्टिविस्ट दिशा रवि को किसान आंदोलन के समर्थन में एक ऑनलाइन ‘टूलकिट’ (Toolkit) सोशल मीडिया पर साझा करने पर 13 फरवरी 2021 को बेंगलुरु से दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था।
पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि पर देशद्रोह और साजिश के आरोप लगाए गए थे, जिसके बाद उन्हें करीब 10 दिन जेल में रहना पड़ा और फिर दिल्ली की एक अदालत से जमानत मिली।
किसान आंदोलन में विरोध प्रदर्शनों की कवरेज और सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर कोई 8- 9 वरिष्ठ पत्रकारों व संपादकों पर राजद्रोह और अन्य गंभीर धाराओं में पुलिस मुकदमे (FIR) दर्ज किए गए थे।
तब इन गिरफ्तारियों के खिलाफ वामपंथ और कांग्रेस का खेमा मुखर था और दक्षिणपंथी उन्हें जायज ठहराने में जुटे थे।
झारखंड पुलिस ने छात्र आंदोलन को कवर करने गए धुर दक्षिण पंथी पत्रकार अमन चोपड़ा पर FIR दर्ज कर पर्चा थमा दिया। हस्पताल में भर्ती एक आंदोलनकारी छात्र के इंटरव्यू के आरोप में चोपड़ा पर FIR दर्ज हुई तो दक्षिणपंथी पत्रकारों, नेताओं के मन में चिंता प्रकट हो गई और दूसरे खेमे के लोग चोपड़ा की हिस्ट्री खोलकर झारखंड पुलिस के पक्ष में नजर आने लगे।
सच यही है कि हर खेमे के अपने पसंदीदा पत्रकार हैं। पत्रकार कहें कि पैरोकार, लेकिन सच यही है। सियासत को अब पत्रकार चाहिए भी नहीं। चाहिए तो सिर्फ और सिर्फ – चाटुकार।
हर राज्य, हर सरकार की चाहत अब इसी तरह की है। राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकार थी तब नापसंद पत्रकारों पर कुछ इसी तरह FIR दर्ज की गई। नंगेपन की हद तो तब हो गई जब बतौर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह तक कह दिया कि सरकारी विज्ञापन तभी मिलेंगे, जब सरकारी खबरें चलेंगी।
यह डिमांड भी थी। धमकी भी। नसीहत भी। और, ऐसा गहलोत ने अकेले ने किया हो ऐसा नहीं। अब हर कोई वही जादुई छड़ी लिए भटक रहा है। या तो पक्ष में गीत गाइए। या फिर कानूनी पचड़ों के लिए तैयार हो जाइए। लगभग सभी जगह यही हाल है। राज्य, सरकार, नेता चाहे इस पक्ष के हों, चाहे उस पक्ष के।
कंगना रनौत के मुताबिक 2014 में जो आजादी आई, उसके बाद मीडिया की आर्म ट्विस्टिंग इस कदर बढ़ी कि हर सरकार का मुखिया मीडिया पर दबाव के लिये आजाद है। और, मीडिया के ज्यादातर नीति नियामक हैं कि बैठने का कहते ही लेट रहे हैं। जो इससे असहमति जताए वह आउट!


