दयाशंकर मिश्र-
अख़लाक़: भारत में मॉब लिंचिंग की विस्तृत ज़मीनी पड़ताल’ वरिष्ठ लेखकों, साहित्यकारों, नागरिकों की गरिमामय मौजूदगी में पाठकों के बीच पहुंची। किताब पर विस्तृत बातचीत जवाहर भवन, नई दिल्ली में तीन सितंबर को संपन्न हुई। मेरी किताब ‘अख़लाक़’ देश के विभिन्न हिस्सों में मुसलमानों के साथ ही ईसाइयों, दलितों के दमन, आंसू, यातना, पीड़ा, अत्याचार और मॉब लिंचिंग की ग्राउंड रिपोर्टिंग है। ‘अख़लाक़’ नफ़रत में डूबते समाज को आंसू, प्रायश्चित के समीप पहुंचाने का विनम्र प्रयास है।
किताब ‘अख़लाक़’ को नागरिकों तक पहुंचाने, गुमनाम लेखक के साथ खड़े होने के लिए मैं कार्यक्रम में मौजूद प्रत्येक नागरिक का आभारी हूं।
‘अवार्ड’ वापसी से सरकार के दमन का प्रतिकार करने की अलख जगाने वाले वरिष्ठ कवि, लेखक अशोक वाजपेयी ने सभा की अध्यक्षता करते हुए मॉब लिंचिंग की संस्कृति, समाज और हिंदी पट्टी की मानसिकता को रेखांकित किया। ‘नाकोहस’ से इस विकट समय की चेतावनी देने वाले लेखक, लोक -जन बुद्धिजीवी पुरुषोत्तम अग्रवाल, विज्ञान और आधुनिक राजनीतिक इतिहास की प्रमुख आवाज़ प्रोफ़ेसर एस इरफ़ान हबीब, वरिष्ठ वकील, नागरिक अधिकारों के पैरोकार प्रशांत भूषण, संसद से सड़क तक निरंतर मुखर सांसद प्रोफ़ेसर मनोज कुमार झा, सांप्रदायिक सद्भाव के लिए दशकों से सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार आनंद वर्धन, सांप्रदायिकता, हेट क्राइम, हिंसा के विरुद्ध सशक्त आवाज़ वरिष्ठ पत्रकार बुशरा खानम का किताब पर विस्तृत टिप्पणियों के लिए शुक्रिया। किताब पर चर्चा की सूत्रधार वरिष्ठ पत्रकार, लेखिका,प्रखर वक़्ता भाषा सिंह ने इसकी संदर्भ सहित विस्तृत व्याख्या की। भाषा, आपका हर अध्याय पर एक नया नज़रिया पेश करने के लिए आभार व्यक्त करना संभव नहीं। ‘अख़लाक़’ की चर्चा में हमारे समय की सबसे प्रमुख आवाज़ों में से एक कवि, लेखक, विचारक गौहर रज़ा और प्रोफ़ेसर जोया हसन की मौजूदगी हौसला बढ़ाने वाली रही।


‘अख़लाक़’ की प्रस्तावना लिखने, पाठकों को मॉब लिंचिंग की पृष्ठभूमि से परिचित कराने के लिए प्रख्यात डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मकार आनंद पटवर्धन साहब का सदैव शुक्रगुज़ार रहूंगा। कार्यक्रम में वरिष्ठ राजनेता दिग्विजय सिंह, मोहन प्रकाश, सुप्रिया श्रीनेत, गुरदीप सप्पल, प्रोफ़ेसर रतनलाल की गरिमामय उपस्थति आश्वस्तकारी है। मॉब लिंचिंग भारतीय संविधान, समाज पर सामूहिक हमला है। इस घातक राजनैतिक हमले का कोई अकेले मुक़ाबला नहीं कर सकता। समाज, संवैधानिक संस्थाओं, विपक्ष, लेखक सबको मिलकर लड़ना होगा।
मॉब लिंचिंग के शोकगीत ‘अख़लाक़’ के लिए प्रकाशक पहले ही इनकार कर चुके थे। मेरी पिछली किताब ‘राहुल गांधी: सांप्रदायिकता, दुष्प्रचार और तानाशाही से ऐतिहासिक संघर्ष’ से ही तय हो गया था, मेरी नियति में प्रकाशकों का साथ नहीं है। भारतीय प्रकाशकों, मीडिया के लिए बहिष्कृत लेखक का साथ देने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित ‘The Truth Pill’ के लेखक, ‘ठाकुर फ़ैमिली फ़ाउंडेशन’ के सूत्रधार दिनेश ठाकुर रोशनी की तरह सामने आए। सोशल मीडिया पर लगातार गालियों, नफ़रत का शिकार होते हुए ‘अख़लाक़’ के साथ आए। ‘अख़लाक़’ पर विमर्श, बहुआयामी चर्चा का हिस्सा बनने के लिए सोलापुर, महाराष्ट्र से इतिहास अध्येता, मॉब लिंचिंग से सताए जा रहे लोगों के हक़ के लिए संघर्षरत सरफ़राज़ अहमद लगभग दौड़े चले आए। आपके बिना किताब कैसे पूरी होती! ओडिशा से अमिया पांडव, डॉ. पल्लव लिमा के बिना चर्च, ईसाइयों पर हमले, आदिवासियों पर अत्याचार की दास्तान दर्ज होना संभव नहीं था। आप सबका ख़ूब सारा वक़्त निकालकर आना बेशक़ीमती है।
भोपाल से आए वरिष्ठ पत्रकार राजू कुमार, बनारस के सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद अहमद अंसारी का शुक्रिया। भारी उमस, बारिश के मौसम में मुरादाबाद से दिल्ली की सड़कों पर इस लेखक के लिए नागरिकों के घर-घर जाकर जवाहर भवन चलने का अनुरोध करने वाले मित्र आशकार अहमद के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।
पहले से तय कार्यक्रमों के कारण ‘अख़लाक़’ पर बातचीत में शामिल नहीं हो सके, इस किताब से गहरे लगाव, सरोकार के लिए वरिष्ठ पत्रकार राजू पारुलेकर और प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद का बेहद शुक्रिया।
सौरभ बाजपेई Saurabh Bajpai जी आप कमाल हैं! दिल्ली से दूर रहकर कार्यक्रम में सतत मौजूद रहे। इसके लिए आभार बहुत छोटा है।
किताब ‘अख़लाक़’ पर बातचीत के लिए मैं सुधी नागरिकों, यू-ट्यूब चैनलों से अनुरोध करता हूं, जिससे पीड़ा, यातना, अत्याचार की यह दास्तां घर-घर पहुंच सके।
मैं ‘अख़लाक़’ के साथ विभिन्न शहरों में ‘मॉब लिंचिंग’ पर नागरिक संवाद के लिए यात्रा आरंभ कर रहा हूं।
आपसे सहयोग, साथ अपेक्षित है।


