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दिल्ली

4पीएम की महिला पत्रकारों के समर्थन में पूरे देश से उठी आवाजें, देर रात तक दिल्ली के साकेत थाने में जमकर हुआ विरोध, देखें पत्र और वीडियो

Front page of a Hindi tabloid '4PM' with two cricketers on the left, a large red-and-black 4PM masthead, and bold Hindi headlines about a journalist's assault by Delhi Police during reporting; a distressed woman with closed eyes is shown on the right side.

दिल्ली पुलिस ने 4पीएम नेटवर्क की दो महिला रिपोर्टर्स के साथ जो कुछ किया वह कहीं से भी जायज नहीं है। दोनों पत्रकारों के शरीर पर लाठी के निशान पुलिसिया बर्बरता की कहानी खुद-ब-खुद बता रहे हैं। अमित शाह और मुख्यमंत्री को इसका संज्ञान लेकर दोषी पुलिसवालों पर स्वयं मुकदमा दर्ज कराना चाहिए। अन्यथा देश की राष्ट्रपति को इसका संज्ञान लेना चाहिए, क्योंकि वह खुद भी एक महिला हैं…


संजय शर्मा-

शाहीन अकेली नहीं है. 4PM अकेला नहीं है. दुनिया भर से उठ रही आवाज़ें इसका सबूत हैं.

भारत से अमेरिका तक, लंदन से खाड़ी देशों तक, ऑस्ट्रेलिया से दुनिया के न जाने कितने हिस्सों से कल रात से लगातार फोन, संदेश और ई-मेल आ रहे हैं. शाहीन के साथ खड़े होने वाले हर इंसान का मैं दिल से शुक्रिया अदा करता हूं.

भारत के उन तमाम राजनेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और आम नागरिकों का भी आभार, जिन्होंने इस मुश्किल घड़ी में शाहीन और पूरे 4PM परिवार के साथ खड़े होकर यह संदेश दिया है कि पत्रकार की आवाज़ को पुलिस की ताकत से दबाया नहीं जा सकता.

मैं रात करीब तीन बजे तक शाहीन के संपर्क में था और सुबह सात बजे एयरपोर्ट पहुंच गया. मैं दिल्ली जा रहा हूं, अपनी रिपोर्टर शाहीन के पास.

मैं विशेष रूप से अपने अधिवक्ता भाई हैदर का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं, जिन्होंने देर रात करीब एक बजे तक बैठकर महामहिम राष्ट्रपति के नाम हमारा विस्तृत ज्ञापन तैयार किया.

हमने राष्ट्रपति महोदया से मांग की है कि पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो, थाना साकेत की CCTV फुटेज तत्काल सुरक्षित की जाए, जिम्मेदार पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय हो और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी तथा विभागीय कार्रवाई हो.
सवाल बहुत बड़ा है.

आखिर 4PM ने ऐसा क्या बिगाड़ दिया है कि हम लगातार निशाने पर हैं?

पहले हमारे चैनल को दो बार बंद करने की कार्रवाई हुई. फिर मेरी फिल्म ‘सहिया’ को सेंसर प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया गया. और अब हमारी पत्रकार शाहीन के साथ दिल्ली में यह घटना हुई. लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को एक बात समझ लेनी चाहिए—

4PM डरने के लिए पत्रकारिता नहीं करता. हम सवाल पूछते थे. सवाल पूछते हैं. और सवाल पूछते रहेंगे.

किसी पत्रकार के सवाल का जवाब पुलिस की ताकत नहीं हो सकती. कैमरा बंद कराया जा सकता है, पत्रकार को हिरासत में लिया जा सकता है, लेकिन सवालों को हिरासत में नहीं लिया जा सकता.

मैं दिल्ली पहुंच रहा हूं. शाहीन की लड़ाई अब केवल शाहीन की लड़ाई नहीं है. यह हर उस पत्रकार की लड़ाई है जो सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछने का साहस रखता है.

हम संवैधानिक और कानूनी तरीके से इस लड़ाई को आखिरी मुकाम तक ले जाएंगे.

शाहीन, हम तुम्हारे साथ हैं. पूरा 4PM परिवार तुम्हारे साथ है. और आज दुनिया भर से उठती आवाज़ें बता रही हैं—तुम अकेली नहीं हो.

Formal letter to the President of India requesting urgent intervention over alleged illegal detention and harassment of journalists Ms. Shaheen Khan and Ms. Nafeesa Khan by Delhi police and authorities in New Delhi, 2026 edition.
Page of a legal document with sections 3–6 discussing press freedom, arrest, and constitutional rights.
Page of a formal document with numbered sections 7–10, containing dense paragraphs about press freedom, government actions, and investigations.
Formal letter page with dense paragraphs, date 04.09.2026, ending with 'Yours faithfully,' a handwritten signature, and editor Sanjay Sharma's contact details at the bottom right side.

4PM नेटवर्क के लिए कवरेज कर रही दो महिला पत्रकार शाहीन खान और नफीसा खान ने दिल्ली पुलिस पर इस्लामोफोबिक गालियां देने और मारपीट करने का आरोप लगाया है. दोनों पत्रकार गुरुवार को गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के कार्यक्रम को कवर कर रही थीं. घटना के विरोध में शाहीन और नफीसा साकेत पुलिस स्टेशन के बाहर नागरिकों के साथ धरने पर बैठी हैं. वे कथित मारपीट में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR करने की मांग कर रहे हैं।
-सिकंदर चौधरी


सौमित्र राय-

सिर्फ़ दिल्ली नहीं, भारत के जितने भी राज्यों में बीजेपी की डबल इंजन की सरकारें हैं, सभी की पुलिस आज कठघरे में हैं।

सबसे पहले बात करें कल 4पीएम चैनल की 2 रिपोर्टरों के साथ साकेत थाने में दिल्ली पुलिस की मारपीट की।

सोशल मीडिया पर बवाल मचा। रिपोर्टर का वीडियो वायरल हुआ। दोपहर को पुलिस दोनों रिपोर्टरों को मेडिकल के लिए अस्पताल ले गई। रात को उन्हें थाने लाया गया।

तब तक AISA और दिल्ली कांग्रेस यूथ विंग के लोग साकेत थाने पहुंच चुके थे। काफी देर तक हंगामे के बाद रात 10.30 पर मारपीट करने वाले पुलिस के खिलाफ रिपोर्ट लिखी गई।

रिपोर्ट की कॉपी देने के नाम पर फिर हंगामा हुआ और नेहा बोरा समेत पीड़ित और वकीलों को धरने पर बैठना पड़ा।

आप समझ सकते हैं कि दिल्ली पुलिस पर अमित शाह का किस कदर दबाव है। दोनों रिपोर्टरों ने जिस प्रोग्राम में रेखा गुप्ता से सवाल किए, उसमें अमित शाह भी थे।

पुलिस की इस गुंडागर्दी को 9 घंटे झेल चुके पूर्व नौकरशाह आशीष जोशी ने कल लिखा–छोटे सिपाहियों पर मत जाइए। वे तो हुक्म बजाते हैं। असली दोषी वे आईपीएस अफसर हैं, जिन्हें समूचे बदलने की जरूरत है।

जाहिर है इस पूरी नौकरशाही की लगाम उस एक हाथ में है, जिसका इस्तीफ़ा विपक्ष अभी तक ले नहीं सका है।

उधर, सोशल मीडिया पर खबरें उड़ने और कांग्रेस की तरफ से कार्यकर्ताओं को तैयार रहने के आदेश के बाद उत्तराखंड पुलिस के तोते उड़ गए।

देर रात पुलिस ने राहुल गांधी की संभावित गिरफ्तारी की खबरों को अफवाह बताया। लेकिन डर के मारे पुलिस हकला रही थी।

जाहिर है, माहौल इस कदर गर्म है कि सत्ता एक और किरकिरी नहीं झेल सकती। खासकर तब, जबकि 9 दिन बाद ब्रिक्स का सम्मेलन हो।

पुलिस पर कोर्ट का भी भरोसा खत्म हो गया है। जनता का कोर्ट पर। उसी कोर्ट ने बार काउंसिल के मुखिया को अवैध ठहरा दिया है।

मोदी सत्ता ने राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ पोस्ट पर एयरफोर्स के एक रिटायर्ड अफ़सर को इसलिए बिठा दिया, ताकि चंदा चोरी पर कोई सवाल न उठाए।

वह भी तब, जबकि जनाब मिश्रा जी सिलेक्ट हुए 3 लोगों के पैनल में ही नहीं थे। यही है नरेंद्र मोदी का प्रशासन। हर जगह अपने आदमी बिठा दो।

काबिलियत–सत्ता के अरमान और फरमान को पूरा करने किसी भी हद तक जाने का हौसला। किस अफसर के भीतर कितना बड़ा गुंडा है, इसे यह सत्ता ट्रेनिंग में ही पहचान लेती है।

यह काबिलियत अक्सर एक जाति विशेष और संघी बैकग्राउंड के साथ दिख जाती है। फिर सत्ता अपने हिसाब से उनकी पोस्टिंग करती है। ये पूरी तरह अंग्रेजों का सिस्टम है, जिसकी जवाबदेही राजा के प्रति थी। संसद, कोर्ट, जनता–सब भूल जाइए।

फिर विपक्ष पुलिस से क्यों, राजा से जवाबदेही क्यों न मांगे? यही मूल सवाल है। चेकमेट की स्थिति में राजा को बचाना विपक्ष का नहीं, सत्ता का काम है।

यहां तो शतरंज ही उल्टी चल रही है।

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