टीवी न्यूज इंडस्ट्री में पिछले डेढ़ दशक के दौरान आए बदलावों और मौजूदा दौर की पत्रकारिता को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। इस बहस में सवाल उन संपादकों की भूमिका पर भी उठ रहे हैं, जिन्होंने करीब 15 साल पहले न्यूजरूम में पत्रकारों की एक ऐसी पीढ़ी को आगे बढ़ाया, जो आज टीवी न्यूज के बड़े चेहरों के तौर पर पहचानी जाती है।
आलोचना का केंद्र यह है कि जिन लोगों को उस दौर में संपादकीय जिम्मेदारियां और स्क्रीन स्पेस मिला, उनमें से कई आज न्यूज चैनलों के प्रमुख चेहरे बन चुके हैं। वहीं, उस दौर के कई पूर्व संपादक अब टीवी न्यूज की गिरती गुणवत्ता और पत्रकारिता के मौजूदा स्तर पर सोशल मीडिया और यूट्यूब के जरिए सवाल उठाते नजर आते हैं।
‘काबिल लोगों को आगे बढ़ाया होता तो तस्वीर अलग होती’
इस आलोचना में कहा जा रहा है कि टीवी न्यूजरूम में प्रतिभा और बौद्धिक क्षमता को प्राथमिकता देने के बजाय कई बार ऐसे लोगों को आगे बढ़ाया गया, जिनकी संपादकीय क्षमता पर सवाल उठाए जा सकते थे। आरोप यह भी है कि सक्षम और सवाल पूछने वाली पत्रकारिता न्यूजरूम की स्थापित सोच को चुनौती दे सकती थी, इसलिए ऐसे लोगों को पर्याप्त अवसर नहीं मिले।
नतीजा यह हुआ कि एक कमजोर संपादकीय संस्कृति ने धीरे-धीरे अपनी अगली पीढ़ी भी तैयार कर दी। आज वही पीढ़ी टीवी न्यूज की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल है।
‘पतन के जिम्मेदार सिर्फ आज के चेहरे नहीं’
इस बहस में सबसे अहम सवाल यही है कि टीवी न्यूज के मौजूदा पतन के लिए सिर्फ आज स्क्रीन पर नजर आने वाले एंकर, पत्रकार या संपादक जिम्मेदार हैं या उन लोगों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए, जिन्होंने उन्हें तैयार किया और आगे बढ़ाया?
आलोचकों का कहना है कि आज टीवी न्यूज के पतन पर चिंता जताने वाले पूर्व संपादकों को पहले अपने कार्यकाल की भूमिका पर भी आत्ममंथन करना चाहिए। अगर उस दौर में बेहतर पत्रकारों को मौका मिलता और न्यूजरूम में सवाल पूछने, असहमति और बौद्धिक बहस की संस्कृति मजबूत की जाती, तो शायद आज की तस्वीर कुछ अलग होती।
फिर भी नई पीढ़ी से उम्मीद क्यों छोड़ी जाए?
हालांकि इस पूरी बहस का दूसरा पहलू यह भी है कि किसी एक दौर की कमजोरियों के आधार पर पूरी नई पीढ़ी को खारिज नहीं किया जा सकता। डिजिटल मीडिया, स्वतंत्र पत्रकारिता और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म ने नई पीढ़ी के पत्रकारों को पारंपरिक न्यूजरूम से बाहर अपनी जगह बनाने का मौका दिया है।
टीवी न्यूज का मौजूदा दौर चाहे जितनी निराशा पैदा करता हो, लेकिन पत्रकारिता की अगली पीढ़ी से उम्मीद खत्म करने की जरूरत नहीं है। दौर बदलते हैं, संस्थान बदलते हैं और पत्रकारिता की भाषा भी बदलती है।
हो सकता है कि आने वाला दौर ऐसी नई पीढ़ी लेकर आए, जो टीवी न्यूज में खोई हुई विश्वसनीयता, सवाल पूछने की हिम्मत और पत्रकारिता की बुनियादी जिम्मेदारी को फिर से स्थापित करे।
लगभग 15साल पहले TV News इंडस्ट्री के ज्यादातर संपादकों ने जिन अयोग्य लोगों को बढ़ाया वो सब आज टीवी के बड़े चेहरे हैं, और वो सारे संपादक यूट्यूब पर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं. उन संपादकों को काबिल लोगों की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि वहाँ उनकी छिछली बौद्धिकता को चुनौती मिलती थी.. अब वो ढोंग करते हैं कि टीवी न्यूज़ का पतन हो गया है। इस पतन के ज़िम्मेदार वही हैं .. खुद भी कमज़ोर थे और अगली पीढ़ी भी कमज़ोर कर दी … ये दौर भी बदलेगा.. नई पीढ़ी से उम्मीद क्यूँ छोड़ना ..॥
-अनुरंजन झा


