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संस्कृत में शब्दों की निर्मिति का विज्ञान अकसर चमत्कृत करने वाला होता है!

सुशोभित-

संस्कृत में शब्दों की निर्मिति का विज्ञान अकसर चमत्कृत करने वाला होता है। जैसे ‘खग’ शब्द को ही लें। इसका अर्थ है पक्षी। किन्तु ‘खग’ शब्द की व्युत्पत्ति दो वर्णों से हुई है- ख और ग। संयोग से हिन्दी वर्णमाला में भी ये दोनों वर्ण सा​थ ही आते हैं। ‘ख’ आकाश के अर्थ को व्यंजित करता है, जैसे खगोल में, खद्योत में। ‘खगोल’ उसी तरह से आकाश से सम्बद्ध है, जैसे ‘भूगोल’ धरती से। ‘ग’ वर्ण गति और गमन के अर्थ को प्रकट करता है। तो खग का अर्थ हुआ वह जो आकाश में गमन करता हो। इन अर्थों में विमान भी खग ही है!

‘मृग’ यानी वह जो मृत्तिका पर गमन करता हो। अब यह शब्द हरिण का पर्याय बन गया है, किन्तु पहले यह सभी थलचरों के लिए प्रयुक्त होता ​था। इसी से सिंह को ‘मृगराज’ कहा है, यानी समस्त थलचरों का स्वामी। हाथी को ‘मृग-हस्तिन’ कहा है यानी हाथ वाला प्राणी। हाथी की सूँड को पहले-पहल आर्यों ने देखा तो उसे उसका हाथ ही समझा था। ‘हस्त’ शब्द हाथ के अर्थ को बताता है, यथा हस्ताक्षर में, हस्तगत में। किन्तु कालान्तर में ‘हस्ती’ शब्द हाथी के लिए रूढ़ हो गया। तो हाथी शब्द हाथ से बना है! देखते हैं कितना रोचक है शब्दों की व्युत्पत्ति का विज्ञान!

पर्वत को ‘नग’ कहते हैं, यानी वह जो कहीं भी गमन ना करे। घोड़े को ‘तुरग’ कहते हैं, यानी वह जो तीव्र गति से गमन करे। ‘तुरग’ के ‘तुर’ में त्वरा और त्वरित का अर्थ निहित है। तुरंत भी इसी से बना है। साँप को ‘उरग’ कहते हैं, यानी जो पेट के बल गति करे। उर शब्द का अर्थ मर्मस्थल होता है। पक्षी का एक और पर्याय है- ‘विहग’। इसमें ‘विहायस्’ शब्द आकाश के अर्थ को बतलाता है। ‘विहग’ शब्द के ही कारण पक्षी की दृष्टि ‘विहंगम’ कहलाई है यानी आकाश से धरती पर दृष्टिपात का परिप्रेक्ष्य!

“खग जाने खग ही की भाषा” वाली बात प्रसिद्ध है, किन्तु भाषा में ‘खग’ शब्द की व्युत्पत्ति जानना भी कम रोमांचक नहीं!

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