यशवंत सिंह-
हनुमान जी के अनन्य भक्त Vijay Kumar Mishra जी का जब पहली बार ग़ाज़ीपुर से चुनाव लड़ना तय हुआ था तो वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्रा जी के भतीजे होने के नाते विजय जी के लिए हम सब भी सक्रिय हुए। एक वरिष्ठ ने फ़ोन कर मुझे कहा- यशवंत देखो अपने विजय मिश्रा चुनाव लड़ने की तैयारी किये हैं ग़ाज़ीपुर से और टिकट भी मिल गया है, आप लोगों को लगना होगा।

वरिष्ठों और बड़े बुजुर्गों का आदेश था इसलिए मैं ग़ाज़ीपुर आया। अपने चाचा राम नगीना सिंह एडवोकेट समेत कई परिजनों परिचितों से विजय जी को मिलवाया। भाग्य के बेहद धनी विजय मिश्रा जी न सिर्फ जीत गए बल्कि इस अप्रत्याशित जीत से बेहद उत्साहित नेताजी मुलायम सिंह यादव ने उनकी पीठ थपथपा कर शाबासी दी।
भाग्य का धनी इसलिए कहा क्योंकि सदर सीट से सपा को जीतना नहीं था इसलिए विजय मिश्रा जी को आराम से जिताने के लिए जंगीपुर ऑफर किए नेताजी लेकिन विजय मिश्रा वहीं से टिकट लेने पर अड़ गए जहाँ उनका घर है। पुराने और मेन गाजीपुर के बिजनेस क्लास बाहुल्य इलाके की पतली सड़कों गलियों के बाशिंदों पर विजय मिश्रा को भरोसा था। सदर सीट सपा ने जीतकर इतिहास रच दिया। कमल की जगह साइकिल के झंडे डंडे पहली बार शहर में सुशोभित हुए।
ज़्यादा फ़्लैश बैक में जाने की ज़रूरत नहीं है। अतीत तो अतीत होता है। उसे बदला नहीं जा सकता। उससे सीखा जा सकता है। एक साल विधायकी और चार साल मंत्रित्व का समय विजय मिश्रा की परीक्षा के लिए पर्याप्त रहा। उन दिनों के ग़ाज़ीपुर के जमे जमाए खुर्राट नेता लोग ग़ाज़ीपुर को उगाही सेंटर के बतौर ट्रीट करते थे। उन दिनों अठारह करोड़ का बंदरबाँट हर माह नेताओं के बीच हो जाया करता। जनता के हिस्से में बिजली कटौती और बीमारियाँ और ख़राब सड़कें थीं। विजय मिश्रा को भी इस सिंडिकेट का हिस्सा बनने का ऑफर मिला लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया। चाचाश्री अच्युता जी का संस्कार और नेताजी का सीधा संरक्षण और आशीर्वाद। इसलिए वे ख़ुद कमाने की बजाय जिले के विकास के मोर्चे पर सक्रिय हुए।
ग़ाज़ीपुर के घाघ नेताओं से घिरे विजय मिश्रा का पूरा पाँच साल इस खतरनाक सियासी नेक्सस से लड़ते और जिले में बिजली अस्पताल सड़क स्पोर्ट्स की योजनाओं को ज़मीन पर लाते बीता। इस क़ीमत पर कि उनके बहुत से क़रीबी नाराज हो गए। ज़्यादा तवज्जो ज़्यादा वक़्त न मिलने के कारण। उस दौर के बहुत से सच विजय मिश्रा के सीने में दबे हैं।
नेता जी मुलायम सिंह यादव से पार्टी की कमान निकलकर अखिलेश यादव जी के हाथों में आई तो हाँ हाँ कहते हुए आख़िरी वक़्त पर विजय मिश्रा जी का टिकट काट दिया गया। सदर से सपा प्रत्याशी के प्रचार के लिए तैयार दो ट्रक बुकलेट आज भी रद्दी घर में पड़ा हुआ है। विजय मिश्रा जी का सबसे मुश्किल सियासी दौर यहीं से शुरू हुआ। उस निजी राजनीतिक भूकंपीय दौर के थोड़ा स्थिर होने पर अंततः भाजपा में समाहित हुए। संघ का आशीर्वाद मिला। और अब भाजपा की जिले की राजनीति की महत्वपूर्ण कड़ियों में हैं। लेकिन तपस्या की मियाद थोड़ी लंबी बनी हुई है। बावजूद इसके, शहर और सियासत से कनेक्ट नहीं छोड़ा। जनता से जुड़ाव की ज़िद और ग़ाज़ीपुर से अथाह प्रेम उन्हें डटे रहने को प्रेरित किए हुए है।
भाजपा में कई किस्म के अप्रत्याशित प्रयोगों की भूमि ग़ाज़ीपुर में इस बार सदर सीट से विजय मिश्रा की दावेदारी के ख़ूब चर्चे हैं लेकिन विजय मिश्रा हनुमान जी की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं- जो प्रभु की इच्छा। हम तो सेवक हैं। साध्य तो सेवा ही है। साधन तो श्रीराम जानें, हमारे हनुमान जी जानें।
ग़ाज़ीपुर से मुख़्तार अंसारी भले ख़त्म हो गए हों लेकिन उस प्रवृत्ति की सियासत का दौर ख़त्म नहीं हुआ है। विजय मिश्रा कहते हैं, “मेरी तब भी जंग उन्हीं लोगों से उसी प्रवृत्ति से रही, और आज भी उन्हीं से है। तब सपा में रहते हुए पार्टी और सरकार के भीतर से लड़ता था। अब बीजेपी में आकर खुल कर लड़ता हूँ। तब भी विकास एजेंडा था। आज भी वही एजेंडा है। स्पोर्ट्स, हेल्थ, इलेक्ट्रिसिटी, इंफ्रास्ट्रक्चर फील्ड में जितना बन सका; किया। सरकारी ठेकों को गैंग्स के चंगुल से छुड़ा कर आम लोगों के किए खुलवाया। कदम कदम पर मेरी परीक्षा ली गई। प्राण तक की धमकियाँ प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तरीके से भिजवाई गई। लेकिन जिसको हनुमान जी का सहारा उसका भला कौन बिगाड़ेगा। जनता का आदमी हूँ, और रहूँगा। मेरा दरवाज़ा आम जनता के लिए सदा खुला हुआ है।”
विजय मिश्रा जी से मेरी मुलाक़ात दूसरी बार हुई। पहली दफ़ा पहले चुनाव से ठीक पहले। दूसरी बार अब, अगले साल होने वाले चुनाव से पहले। बहुत सारी बातें हुईं। पुराने विजय मिश्रा की जगह मैंने इस बार नए विजय मिश्रा को देखा। बेहद मेच्योर, बहुत आध्यात्मिक। बड़े फ़लक पर सोचने समझने वाला। बहुत अपग्रेड हुए हैं। उन्होंने मेरे में नया यशवंत देखा।
विजय जी ने दो चार बातें कमाल की कहीं। पत्रकारिता करते हुए सम्पूर्ण आध्यात्मिक हुआ नहीं जा सकता। पत्रकारिता का मूल चरित्र नकारात्मकता खोजना है। अध्यात्म तो सम्पूर्ण सकारात्मकता का विज्ञान है।
उन्होंने बताया ग़ाज़ीपुर में भी वृद्धाश्रम खुल गया है। परिवार अब संस्कार नहीं पैसा कमाना सिखाते हैं इसलिए बच्चे पैसा कमा रहे और वक़्त की कमी के कारण अपने बुजुर्गों को वृद्धाश्रम भेजने लगे। वैल्यूज़ की तरफ़ हम नहीं लौटेंगे तो भारतीय समाज का समृद्ध पारंपरिक फॉर्मेट नहीं बचेगा।
शेष फिर कभी!


