Connect with us

Hi, what are you looking for?

सियासत

क्या वाक़ई जीडीपी 2.6 प्रतिशत है? 7.8% के सरकारी ढोल की पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने खोल दी पोल!

Hindi headline 'देश की असल GDP ग्रोथ 2.6 फीसदी है...' above a man in a striped shirt speaking; caption on the right: '− सुशील चंद्र गर्ग पूर्व वित्त सचिव'

नई दिल्ली – नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस ने पहली तिमाही में 7.8% GDP ग्रोथ का आंकड़ा जारी किया और सरकार ने इसे उपलब्धि बताकर प्रचार शुरू कर दिया, लेकिन उसी आंकड़े पर पूर्व वित्त सचिव के एक बयान ने सारे दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने कहा है – देश की असल GDP ग्रोथ 2.6 फीसदी है…

पीएम का दावा – निराशावादी नाकाम

आंकड़ा आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा – India’s exemplary GDP growth of 7.8% during Q1 of FY 2026-27 is a herculean feat.

उन्होंने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच तेल के झटकों और सप्लाई चेन की दिक्कतों के बावजूद लोगों की सामूहिक ताकत ने ये ग्रोथ दिलाई है और निराशावादी नाकाम हुए और भारत एक बार फिर खिल उठा।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी रियल 7.8%, नॉमिनल 10.3% और GVA 8.2% का हवाला देकर इसे सुधारों का असर बताया।

आलोचकों का पलटवार

विपक्ष ने इसी आंकड़े को लाइट्स, कैमरा और इनएक्शन की शिकार अर्थव्यवस्था बताया और कहा कि सरकार कागज पर बता रही है कि पहली तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी विकास दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है, जबकि जमीन पर खपत, रोजगार और फैक्ट्री ऑर्डर नहीं दिख रहे।

सबसे बड़ा वार गर्ग ने किया। गर्ग का तर्क है कि सरकार ने GDP डिफ्लेटर से खेल किया है। WPI-CPI की असली महंगाई निकाल दी जाए तो 10.3% नॉमिनल में से 2.6% ही रियल बचता है। यही आंकड़ों की मैन्युफैक्चरिंग है।

जब आंकड़ों की मैन्युफैक्चरिंग शुरू होगी तो विदेशी निवेशक बिदकेगा ही। पिछले एक साल में FII की बिकवाली और FDI में गिरावट इसी भरोसे के टूटने की वजह से है। ट्रस्ट और अकाउंटेबिलिटी की ऐसी मईया-दईया शायद ही किसी सरकार ने की होगी।

ज़्यादा अगल–बगल में झांकने की ज़रूरत नहीं है। सीधे शेयर बाज़ार को देखिए। नरेंद्र मोदी के इंस्टाग्राम रील के बाद भी बाज़ार 700 प्वाइंट नीचे है।

असल में, नरेंद्र मोदी अपने बापजी ट्रंप की राह पर चले थे शेयर मार्केट को मूर्ख बनाने। लेकिन उल्टा पड़ गया।


आधा दर्जन अर्थशास्त्री पद छोड़कर क्यों भागे? हमारी अर्थव्यवस्था बहुत तेज भाग रही है तो उसे छोड़कर अर्थशास्त्री क्यों भाग रहे हैं?

कृष्ण कांत –

उर्जित पटेल, विरल आचार्य, अरविंद सुब्रह्मण्यम, केवी सुब्रह्मण्यम, सुरजीत भल्ला, अरविंद पनगढ़िया – इतने सारे अर्थशास्त्री वक्त से पहले पद छोड़कर क्यों गए?

उर्जित पटेल आरबीआई के गवर्नर थे। कार्यकाल समाप्त होने के पहले ही, दिसंबर 2018 में उन्होंने अचानक पद छोड़ दिया। पटेल के बारे में, पूर्व वित्त सचिव सुभाषचंद्र गर्ग ने दावा किया था कि एक मीटिंग में प्रधानमंत्री, उर्जित पटेल पर भड़क गए और उनकी तुलना “खजाने पर बैठे सांप” से कर दी। कुछ समय बाद उर्जित पटेल ने पद छोड़ दिया। इसके बाद आरबीआई ने लगभग 1.76 लाख करोड़ का अपना लाभांश और सरप्लस पूंजी सरकार को सौंप दी।

Hindi news graphic claiming GDP 7.8% and 2.6% truth, with a man in a suit on the right.

उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद, ​अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला प्रधानमंत्री ने भी आर्थिक सलाहकार परिषद से इस्तीफा दे दिया। दिसंबर 2018 में एक दिन उन्होंने ट्वीट किया कि वे आर्थिक सलाहकार परिषद से इस्तीफा दे चुके हैं। इस्तीफ़ा क्यों दिया, इसकी जानकारी सामने नहीं आई।

विरल आचार्य रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर थे। उर्जित पटेल के इस्तीफे के करीब 7 महीने बाद जून 2019 में विरल आचार्य ने कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पद से इस्‍तीफ़ा दे दिया। इस्तीफ के कुछ महीने पहले 26 अक्तूबर, 2018 में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर के रूप में विरल आचार्य ने एक भाषण में सरकार पर आरबीआई की स्वायत्ता से समझौता करने का आरोप लगाया था।

अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यन ने जून 2018 में देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार पद से अचानक इस्तीफ़ा दे दिया। इसके पीछे उन्होंने निजी कारण बताया।

इसी तरह मुख्‍य आर्थिक सलाहकार रहे केवी सुब्रमण्यम ने अक्टूबर 2021 में अचानक ऐलान किया कि अपना तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के बाद वे शिक्षा क्षेत्र में लौट जाएंगे। नवंबर 2022 में उन्हें आईएमएफ के कार्यकारी बोर्ड में नियुक्त किया गया। लेकिन कार्यकाल पूरा होने के छह महीने पहले, मई 2025 में उनका कार्यकाल तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया।

अरविंद पनगढ़िया जनवरी 2015 में नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष बने। करीब दो साल बाद अगस्त 2017 में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि “मुझे चयन करना था कि कोलंबिया यूनिवर्सिटी की जॉब और नीति आयोग के उपाध्यक्ष में से कोई एक चुनें। मैं जिस तरह का जॉब कोलंबिया यूनिवर्सिटी में कर रहा हूं वो इस उम्र में मिलना लगभग नामुमकिन है।” उन्हें यूनिवर्सिटी की जॉब, नीति आयोग के बेहतर लगी।

अब सवाल ये है कि दुनिया में सबसे तेज गति से भाग रही अर्थव्यवस्था में ऐसा क्या है कि तमाम अर्थशास्त्री इस व्यवस्था में योगदान देने की जगह इसे छोड़कर भाग रहे हैं? इसका जवाब फर्जी आंकड़ों की बाजीगरी, नोटबंदी और इलेक्टोरल बॉन्ड जैसे कांड में छुपा है।


अपन अर्थशास्त्री नहीं हैं कि अच्छी रिसर्च के साथ सबको समझा सकें कि भारत की GDP ग्रोथरेट 7.8% है या 2.6% या कि 3 फीसदी! पर दुनिया के बड़े-बड़े गंभीर अर्थशास्त्री भी भारत की मौजूदा कथित GDP ग्रोथ के 7.8% होने के सरकारी दावे पर चकित है. देश या विदेश में रहने वाले कई बडे भारतीय अर्थशास्त्री इसे अविश्वसनीय बता चुके हैं. सच सामने लाने के लिए भारत के पूर्व वित्त सचिव Subhadh Chandra Garg और पूर्व रिजर्व बैंक गवर्नर Raghuram Rajan जैसे बड़े विद्वान खुलकर बोल रहे हैं और सरकारी दावे को वास्तविकता से दूर बता रहे हैं.ऐसे में सवाल उठता है, हमारी सरकार आंकड़ो में ऐसा गडबडझाला करके क्या हासिल कर लेगी? ग्रोथ रेट इस कदर ऊपर जा रही है तो अच्छा रोजगार क्यों नहीं सृजित हो रहा है? पूंजी निवेश गुणात्मक रूप से क्यों नहीं बढ़ रहा है, खासतौर पर FDI का ऐसा बुरा हाल क्यों है? सरकार के कई प्रिय काॅरपोरेट घराने इन दिनों भारत में कम और विदेश में ज्यादा निवेश को उतावले दिख रहे हैं या पूंजी दबोच कर बैठे हैं! बाजार में इतनी निराशा क्यों है? इन सवालों का जवाब तो सरकार को देना होगा!

-उर्मिलेश (वरिष्ठ पत्रकार)

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन