देवप्रिय अवस्थी-
पत्रकारिता अकादमी का प्रयोग
भास्कर की अपनी पत्रकारिता अकादमी खोलने का मेरा सुझाव सुधीर जी को पसंद आया था. इसकी पुष्टि तब हुई जब सुधीर जी के सचिवालय से जुड़े प्रदीप व्यास मई 2000 में एक दिन अकादमी के स्वरूप के बारे में चर्चा करने मेरे घर आए. उन्होंने बताया कि सुधीर जी ने भास्कर की पुरानी बिल्डिंग में अकादमी खोलने का फैसला किया है और इस बारे में आपसे बात करने को कहा है. मेरे लिए यह खुशी और संतोष के पल थे.
मैंने व्यास जी को अकादमी की अपनी रूपरेखा बताई जिस पर अमल के लिए सुधीर जी ने हरी झंडी दिखा दी. अकादमी के पहले बैच के प्रशिक्षण की शुरुआत 1 अगस्त 2000 से होनी थी. भास्कर के सभी संस्करणों में (तब भास्कर के संस्करण मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में ही थे) विज्ञापन देकर प्रशिक्षण लेने के इच्छुक युवाओं के आवेदन आमंत्रित किए गए. फिर साक्षात्कार के जरिए 16 आवेदकों का प्रशिक्षण के लिए चयन किया गया. प्रशिक्षणार्थियों के रहने-खाने की व़्यवस्था भास्कर की पुरानी बिल्डिंग की ऊपरी मंजिल में थी. रहने-खाने के मद में प्नशिक्षणार्थियों से प्रति माह 1000 रुपए लिए जाते थे.
बिल्डिंग के भूतल पर क्लास रूम, लायब्रेरी और अकादमी की व्यवस्था से जुड़े लोगों की बैठक थी. व्यवस्था में प्रदीप व्यास और अनुज खरे मुख्य भूमिका में थे. मैं भी रोजाना अकादमी जाता. मेरे अलावा एक विशेषज्ञ गेस्ट लेक्चरर वहां रोजाना आमंत्रित किए जाते. मैं मुख्यतः प्रशिक्षणार्थियों द्वारा दैनिक आधार पर लिखे जाने वाले असाइनमेंट देखता और उन पर चर्चा करता. प्रशिक्षणार्थियों के पास समाचार, साक्षात्कार, फीचर, टिप्पणी और अनुवाद आदि कुछ भी लिखने का विकल्प रहता, लेकिन रोजाना 300-350 शब्द लिखना अनिवार्य था.
मेरा हमेशा मानना रहा है कि नए पत्रकारों को रोजाना कुछ न कुछ लिखना ही चाहिए. उस लेखन का नियमित मूल्यांकन और उस पर उनके साथ चर्चा करना भी उतना ही जरूरी है. ज्यादातर पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थानों में असाइनमेंट की खानापूर्ति तो की जाती है, लेकिन उनका मूल्यांकन और उन पर चर्चा नहीं की जाती.
प्रशिक्षण का दूसरा महीना शुरू हुआ ही था कि प्रशिक्षणार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए भास्कर मुख्यालय भेजने का क्रम शुरू हो गया.. प्रशिक्षणार्थी शाम को दो घंटे के लिए वहां जाकर संपादकीय विभाग की अलग-अलग डेस्कों पर काम सीखते-समझते. भोपाल संस्करण के संपादक नरेंद्र कुमार सिंह भी समय निकालकर प्रशिक्षणार्थियों को पत्रकारिता के गुर सिखाते. प्रशिक्षणार्थियों को अकादमी से भास्कर मुख्यालय ले जाने और वापस लाने के लिए वाहन की व्यवस्था भी की गई थी.
महज चार महीने की अवधि में ज्यादातर प्रशिक्षणार्थी अखबार में काम करने की स्थिति में आ गए. सुधीर जी प्रशिक्षणार्थियों की प्रगति से इतने संतुष्ट हुए कि उन्हें दिसंबर 2000 की शुरुआत में ही 6000 रुपए (मौजूदा समय के लगभग 28000 रुपए)के स्टाइपेंड पर विभिन्न संस्करणों में नियुक्ति दे दी.
मेरे रायपुर स्थानांतरण के बाद अकादमी में दो और बैच में प्रशिक्षण चला. फिर प्रबंधन ने अकादमी बंद कर दी, इसका औचित्य मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं. वह चलती रहती तो वह अपनी रजत जयंती पूरी कर चुकी होती. अकादमी में प्रशिक्षण लेने वाले 16 में से 13 साथी आज भी पत्रकारिता और लेखन में सक्रिय हैं. सिर्फ तीन साथियों ने अलग-अलग कारणों से पत्रकारिता छोड़ दी. इन साथियों की मौजूदा स्थिति निम्नानुसार है:
- श्रुति अग्रवाल- इंदौर में भास्कर, पत्रिका और कुछ टीवी चैनलों में काम करने के बाद स्वतंत्र लेखन.
- ब्रह्मवीर सिंह- रायपुर में भास्कर और सहारा समय में काम करने के बाद हरिभूमि, रायपुर में संपादक समन्वय.
- चक्रेश महोबिया- जयपुर में भास्कर और पत्रिका में काम करने के बाद भोपाल में द सूत्र चैनल में कार्यरत.
- महेंद्र कुमार शेखावत- भास्कर, जयपुर में काम करने के बाद पत्रिका के कई संस्करणों के प्रभारी, संप्रति जयपुर में.
- दिव्य शर्मा- भास्कर रायपुर में रिपोर्टर रहीं, अकादमी में सह प्रशिक्षणार्थी ब्रह्मवीर सिंह से विवाह के कुछ समय बाद पत्रकारिता छोड़ दी.
- प्रमोद चौबे- समाचार संपादक, भास्कर सागर.
- संजीव माथुर- कुछ समय भास्कर, जयपुर में रहने के बाद मुख्य उपसंपादक, पत्रिका, जयपुर.
- अमित जलधारी- समाचार संपादक, भास्कर, पुणे.
- शिवेश श्रीवास्तव- समाचार संपादक, भास्कर, भोपाल.
- विनोद सैनी- सीनियर रिपोर्टर, भास्कर, जयपुर.
- अमिताभ बुधौलिया- भास्कर भोपाल में काम करने और भास्कर डिजिटल लांच करने के बाद पीपुल्स समाचार, भोपाल की लांचिंग टीम में, संप्रति स्वतंत्र लेखन.
- मदन कलाल- भास्कर, जयपुर में सीनियर रिपोर्टर.
- संदीप राठौर- भास्कर, जयपुर में काम करने के बाद संप्रति न्यूज 18 राजस्थान में सीनियर रिपोर्टर.
- प्रदीप शुक्ल- रेलवे में नौकरी मिलने पर पत्रकारिता छोड़ दी.
- होरी लाल पटेल- पत्रकारिता छोड़कर परिवार की खेती-बाड़ी संभाल रहे.
- लीना- कोई जानकारी नहीं.
चक्रेश महोबिया-
तो Devpriya Awasthi sir के कुछ ही समय पहले हम पांच साथियों दिव्या, होरीलाल, ब्रह्मवीर, प्रमोद चौबे और मैं रायपुर पहुंच चुके थे। हम सभी जितना नहीं जानते थे, उससे ज्यादा रायपुर की पत्रकारिता और भास्कर के ऑफिस में प्रचार हो चुका था। साफ है इसका दबाव हम पांचों साथियों पर था। ऊपर से चीफ रिपोर्टर से ज्यादा सैलरी हम लोगों की थी। ऐसे में ताने झेलना भी रोज की बात थी। यह बात भी है कि पूरे रायपुर भास्कर के साथियों ने जो प्यार और मार्गदर्शन दिया वो कमाल का था…
खैर, अवस्थी सर रायपुर संपादक बनकर आए तो सभी का हौसला चरम पर था। भास्कर अकादमी की नर्सरी से हम आधे कच्चे, आधे पके पौधों को सीधे रण क्षेत्र में उतार दिया गया था। अकादमी की ट्रेनिंग के बाद एक बार फिर अवस्थी सर के सान्निध्य में ही हमारी व्यावहारिक ट्रेनिंग का बेहतरीन मौका था। दिव्या और होरीलाल अलग-अलग कारणों से दूसरे असाइनमेंट पर थे। मैं, ब्रह्मवीर और प्रमोद एक ही फ्लैट में रहते थे और अवस्थी सर के लिए “अलग” थे।
अब बात उस मेराथन ट्रेनिंग की… तो हमारी आर्मी स्टाइल में शुरू हुई रोज सुबह 10 बजे से भास्कर, नवभारत और देशबंधु पढ़ने से… उन अखबारों से मिसिंग निकालने और भास्कर में गलतियां मार्क करने की… बाकी तो ठीक था, मगर सीनियर्स की खबरों पर गलतियां कैसे मार्क करते? डरते-डरते समस्या अवस्थी सर को बताई तो बोले- अखबार पर मार्क करके मेरी टेबल पर रख दिया करो, किसी और से बात करने की जरूरत ही नहीं…
फिर 11 बजे की मीटिंग में रिपोर्टिंग के लिए कम से कम तीन खबरें लिखवाइए… जिन्हें हर हाल में शाम 7-8 बजे तक सबमिट करना होता। इसके बाद प्रमोद की ड्यूटी लगती सिटी प्रेसनोट पर वीरेंद्र शर्मा के पास, ब्रह्मवीर रीजनल में राजेश जोशी या जितेंद्र शर्मा जी के पास जाते और मैं लास्ट पेज पर…
इसके बाद 9-10 बजे के बीच खाना खाकर लौटिए और… संभालिए लेट नाइट थानों को फोन कर अपडेट के काम को। कोई 36 थाने थे, तो इस काम के लिए हममें से दो लोगों को रुकना पड़ता, मगर मोहदा पारे के फ्लैट में अकेले कौन रुकता सो… तीसरा साथी भी रुक जाता… ऐसे में सुबह 10 बजे से शुरू होने वाला काम का सिलसिला रात एक या दो बजे तक तो चलता ही रहता…
इसी बीच मैं बीमार पड़ गया और आंखों में इन्फेक्शन हो गया। तीन-चार दिन के बाद ऑफिस पहुंचा तो हम तीनों ने ही मिलकर अवस्थी सर को बताया कि इतना काम नहीं हो पा रहा… कुछ कम कर दीजिए।
अवस्थी सर बोले- देखो, ऐसा है कि नौकरी ही करना है तो वो तो एक काम से ही चल जाएगी। सिर्फ रिपोर्टिंग कर लो या डेस्क पर बैठ जाओ। मगर पत्रकारिता की लाइन में सफल होना है तो हर काम सीखो। कुंवारे हो तुम लोग, अभी वक्त है। फिर जिम्मेदारियां घेर लेंगी… हम भला क्या कहते! जी सर करके नई ऊर्जा के साथ अपने काम में फिर जुट गए। आज बताते हुए गर्व होता है कि अवस्थी सर की सीख तब से लगातार काम आ रही है।
पिछला भाग…
मेरी पत्रकारिता यात्रा (13): दैनिक भास्कर, भोपाल में मुख्य समस्या दो पीढ़ियों के सोच और कार्यशैली में अंतर की थी!


