पंकज शुक्ला-
सही दुनिया बसाई जाए तो बिना ख़ान, कपूर या दूसरे सुपर सितारों के भी हिंदी फ़िल्में देखने आते हैं लोग। पहले ‘हनुमान अंश’ और अब ‘मिर्ज़ापुर’! दोनों ने दिखाया कि निर्माता के कलेजे में गूदा हो तो बड़े परदे पर सिनेमा बहुत कुछ नया दिखा सकता है।
सफल टेलीविज़न और ओटीटी किरदारों को सिनेमाघरों तक ले जाने का प्रयोग हॉलीवुड ख़ूब करता रहा है। ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ इस फ़ॉर्मूले को हिंदी सिनेमा में नया व्यावसायिक रास्ता दिखाती है। क्या पता कल को श्रीकांत तिवारी भी बड़े परदे पर ‘द फ़ैमिली मैन’ बने नज़र आ जाएं..! इन पंडितजी की कल्पना को थोड़ा यही विराम देते हैं, और बात करते हैं उन दो पंडितों की जो पहली बार बड़े परदे पर अपना अपना भौकाल एक दूसरे के सामने लेकर आए हैं।
ये तो आपको पता ही है कि मिर्ज़ापुर की गद्दी पर बैठने के लिए बंदूक चलाना आसान है, लेकिन उस पर टिके रहने के लिए चेहरे का भाव नहीं बदलना है। कालीन भैया बने पंकज त्रिपाठी अपने इसी फ़ॉर्मूले पर न जाने कब से टिके हैं! लेकिन, इस बार सामने बब्बन भैया हैं। बब्बन भैया बोले, तो बात-बात में रंग बदलते, संवादों के बीच मुस्कराते और सामने वाले को हंसाते-हंसाते उसकी ज़मीन खिसका देने वाले, रवि किशन शुक्ला, शॉर्ट में बोले तो रवि किशन..!
फ़िल्म ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ की असली जान, इन्हीं दोनों अभिनेताओं का टकराव है। एक तरफ़ पंकज त्रिपाठी का बरसों से जमा होता रहा सन्नाटा है, दूसरी तरफ़ रवि किशन का उफ़नता जोश! एक डर पैदा करता है, दूसरा तमाशा रचता है और जब ये दोनों आमने-सामने होते हैं तो हॉल में सुनाई देती हैं सीटियाँ, तालियाँ और तारीफ़ में निकलती गालियाँ!

रवि किशन इस फ़िल्म में तुरुप का इक्का हैं। उनकी देहभाषा, आवाज़ का उतार-चढ़ाव और आंखों में चमकता लालच इस किरदार को ‘मिर्ज़ापुर’ की परिचित दुनिया में भी अलग पहचान देते हैं। पंकज त्रिपाठी को कुछ नया साबित करना ही नहीं है, फिर भी वह सिर्फ़ गर्दन मोड़ने, पलक उठाने या संवाद से पहले छोटा-सा विराम लेने भर से काम निकाल ले जाते हैं।
सपोर्टिंग कास्ट में दिव्येंदु और अली फ़ज़ल वहीं से आगे बढ़ते दिखाई देते हैं, जहां दर्शक उन्हें छोड़कर आए थे। दिव्येंदु अपनी अकड़, बेचैनी, हास्य और हिंसा का जाना पहचाना मिक्सचर लिए हैं। अली फ़ज़ल की मैचोइज़्म, उनकी मसल्स और कभी कभी ग़ुस्से के बीच इमोशनल हो जाने में दिखती हैं। दोनों के अपने अपने फैंस हैं और ये वे फैंस हैं जिन्हें इनसे कुछ नया चाहिए भी नहीं।
फ़िल्म ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ सबसे कठिन परीक्षा जितेंद्र कुमार उर्फ़ जीतू की रही और इसमें वह डिस्टिंक्शन समेत पास हुए हैं। विक्रांत मैसी के निभाए किरदार के खाँचे में ख़ुद को न सिर्फ़ उतारना, बल्कि ख़ुद को उनसे इक्कीस साबित करना जीतू के ही बस की बात है। सोलो हीरो के तौर पर उनका चलना मुश्किल है, ऐसे में इस तरह की फ़िल्मों में एक शानदार कैमियो या दो-तीन हीरो वाली फ़िल्में उनको सूट करती हैं। हालाँकि, विक्रांत की परछाई उनके आगे पीछे पूरी फ़िल्म में डोलती रहती है।
फ़िल्म ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं, इसके महिला किरदार। ‘मिर्ज़ापुर’ की दुनिया हमेशा पुरुषों के नाम से सजती रही, लेकिन उसकी सबसे जटिल चालें स्त्रियों ने ही चली हैं। रसिका दुग्गल फिर से बीना त्रिपाठी बनी हैं और इस बार भी अपने मौन, विवशता और भीतर चलती रणनीति से ध्यान खींचती हैं। शीबा चड्ढा को समय कम मिला, पर उनका इम्पैक्ट पूरा है। सोनल चौहान पर निर्देशक और निर्माता दोनों मेहरबान हैं। लेकिन, श्वेता त्रिपाठी, श्रिया पिलगांवकर और हर्षिता गौर के किरदार बस उतने ही चमकते हैं, जितने भरे सावन में रात को होने वाली बारिश में चमकने वाली बिजली में धान का खेत चमकता है।
निर्देशक गुरमीत सिंह का काम काबिल तारीफ़ है। पुनीत कृष्णा के साथ वह भी इस दुनिया के रचयिता हैं। और, हिंदी सिनेमा में अपने इस सफल प्रयोग के लिए वह इतिहास में नाम दर्ज़ करा रहे हैं। ओटीटी से फ़िल्म तक उनकी दुनिया की प्रगति पैमाने के स्तर पर साफ़ दिखती है। क़रीब 197 मिनट की फ़िल्म कई जगह धीमी पड़ती है, कुछ मौक़ों पर बिना मतलब का रायता फैलाती भी दिखती है, लेकिन गुरमीत का काम है, इस सीरीज़ के फैंस को सिनेमाघरों तक लाना और उनकी जेब से इतनी रकम निकलवा लेना कि ये दुनिया आगे भी बड़े परदे पर लौटती रही। और, उसमें वह पास हो गए।
‘मिर्ज़ापुर’ पूरी तरह काल्पनिक संसार है, लेकिन उसके भीतर सत्ता, पुलिस, परिवार और अपराध के संबंध इतने विश्वसनीय ढंग से रचे गए हैं कि वह नक़्शे से बाहर होकर भी सच लगते है। अगर ‘मिर्ज़ापुर’ यह छलांग लगा सकती है तो क्या श्रीकांत तिवारी की किसी बड़ी मुहिम पर ‘द फ़ैमिली मैन’ की फ़िल्म नहीं बन सकती? और क्या पता, नेटफ्लिक्स द्वारा कभी ठुकराई गई ‘बाहुबली: बिफोर द बिगिनिंग’ की दुनिया किसी दिन नए रूप और नई कल्पना के साथ बड़े परदे पर लौट आए।
‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ का असली भौकाल इसकी कमाई या इसकी गोलियों में नहीं, बल्कि उस दरवाज़े में है जिसे इसने भारतीय ओटीटी और सिनेमाघर के बीच पहली बार इतने भरोसे के साथ खोल दिया है। जै जै..!


