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आज के अखबार : मनन कुमार मिश्र की ‘खबर’ और हर्जाने की सूचना से नोएडा के डीएम का परिचय गायब!

Split image labeled ACTION (left) and REACTION (right): left panel shows a tweet claiming a massive showdown over action against students, with police resistance; right panel shows Ashish Joshi's tweet about informing his family during interrogation.

मदर ऑफ डेमोक्रेसी और सरकार की सेवा में लगे अखबार। रासुका की कार्रवाई रद्द होने के बाद भी आकृति चौधरी की रिहाई नहीं होगी, 11 और FIR हैं। यह खबर सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। इस खबर का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि नोएडा की डीएम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। आदेश के अनुसार मुआवजे की राशि डीएम के वेतन से भी काटी जानी है। अखबारों में इसे प्रमुखता नहीं दी गई है। सोशल मीडिया पर हर पोस्ट के लिए कार्रवाई संभव नहीं है तो उसे भारत में प्रतिबंधित करवा दिया जाता है। इसके बाद भी कार्रवाई हो तो पूर्व नौकरशाह के मामले में भी नियमों का पालन नहीं होता। दूसरी ओर, सोनम वांगचुक हों, उमर खालिद, शर्जिल इमाम या आकृति चौधरी जिसे जब चाहे जेल में बंद कर दिया जाता है। मंत्रियों को बचाने के लिए सरकार क्या सब करती है और आम लोगों को कैसे फंसाती और परेशान करती है – बताना अखबारों का काम है। पर वे प्रचार में ही लगे हैं या फिर झुकने के लिए कहने पर रेंग रहे हैं।

संजय कुमार सिंह

आज तीन बड़ी खबरें तीन अखबारों में हैं। पहली द हिन्दू में, दूसरी टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है और तीसरी अमर उजाला में सेकेंड लीड है। लेकिन सबसे ज्यादा प्रमुखता चौथी खबर, राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र के सीईओ को मिली है। द टेलीग्राफ में राम मंदिर ट्रस्ट के नए सीईओ की खबर सिंगल कॉलम में है। लीड जादवपुर यूनिवर्सिटी की खबर है। दि एशियन एज में जल शक्ति, जल संरक्षण और इसके लिए टीम इंडिया की जरूरत आदि पर प्रधानमंत्री से संबंधित खबर लीड है। सेकेंड लीड ऊंची जाति के लोगों को खुश करने के लिए सवर्ण आयोग बनाने की भाजपा सांसदों की सिफारिश है। राम मंदिर के सीईओ की खबर यहां पांच कॉलम में है। नवोदय टाइम्स की लीड राम मंदिर ट्रस्ट की खबर है। इसका शीर्षक है, ऑपरेशन सिंदूर के योद्धा जितेन्द्र बने राम मंदिर के सीईओ। मनन मिश्र की खबर को भी प्रमुखता दी गई है लेकिन नोएडा वाली खबर नहीं है। दिल्ली में एनसीआर की खबर का अपना महत्व होता है। कुल मिलाकर, मामला चंदा और चढ़ावा चोरी का था। कार्रवाई क्या हुई, किसके खिलाफ हुई खबर इसकी होनी थी लेकिन अखबार बता रहे हैं कि नए सीईओ कौन हैं या किस महान हस्ती को सीईओ बनाया गया है या बनने के लिए राजी हो गए हैं।

इसमें भी तथ्य यह है कि पहले जिन लोगों के रहते चोरी हुई उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, कुछ अभी भी ट्रस्ट में हैं। मुखिया बदल कर पुराने लोगों में से ही एक को बनाया गया है। जो हटाए गए या छोड़ गए उनके खिलाफ कार्रवाई की खबर नहीं है या उनका यह कहना कि वे दोषी नहीं हैं, मान लिया गया और एक नई हस्ती को सीईओ बना दिया गया। इस व्यवस्था से लगता है कि पहले बलि का बकरा तय नहीं था इसलिए कार्रवाई छोटे लोगों पर हुई। अब बलि का बकरा तय कर दिया गया है। जरूरत पड़ी तो कार्रवाई की जा सकेगी और तब न लगे कि बड़े लोगों को छोड़ दिया इसलिए बड़ा बनाया और बताया जा रहा है। मुझे लगता है कि सीईओ की नियुक्ति की खबर को ज्यादा महत्व दिया गया है।

आज की सबसे बड़ी खबर द हिन्दू की लीड है। खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल की नीति से जुड़े फैसलों की निगरानी का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि मनन कुमार मिश्रा वकीलों की संस्था के सिर्फ़ ‘प्रो-टेम’ (अस्थायी) प्रमुख हैं। इसलिए कोर्ट ने काउंसिल को निर्देश दिया है कि नए चुनाव होने तक सभी बड़े फैसलों के लिए अटॉर्नी-जनरल और सॉलिसिटर-जनरल से सलाह ली जाए। बार कौंसिल ऑफ इंडिया और उसके अध्यक्ष, भाजपा के सांसद मनन कुमार मिश्र हाल में खबरों में थे। उस संदर्भ में इस खबर का मतलब आप समझ सकते हैं। खबर के अनुसार जिन मामलों की जांच की जा रही है और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने जो आरोप लगाए हैं वे इस प्रकार हैं – बार कौंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) प्रमुख मनन कुमार मिश्रा ने हाल ही में नलसार स्नातकों के एनरोलमेंट पर रोक लगाने की कोशिश करके लोगों की नाराज़गी मोल ले ली है।

अब सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने ये आरोप लगाए हैं: बीसीआई चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन का कार्यकाल बढ़ाकर पाँच साल करना, बीसीआई पर्ल फर्स्ट ट्रस्ट बनाना जिसमें श्री मिश्रा और बीसीआई के दूसरे पदाधिकारी ‘परमानेंट मैनेजिंग ट्रस्टी’ हैं। गोवा में 56 एकड़ ज़मीन पर यूनिवर्सिटी बनाने के लिए ट्रस्ट और गोवा सरकार के बीच समझौता हुआ है और सम्मान समारोहों पर ‘करोड़ों रुपये’ का भारी-भरकम खर्च हुआ है। आज की खबरों में यह एक महत्वपूर्ण खबर है लेकिन द हिन्दू के अलावा किसी और अखबार में लीड नहीं है।

दूसरी खबर टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड है। नोएडा के मजदूर आंदोलन के सिलसिले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार, 25 साल की छात्रा आकृति चौधरी हाईकोर्ट द्वारा रासुका की कार्रवाई रद्द किए जाने के बाद भी रिहा नहीं होंगी। उनके खिलाफ 11 अन्य एफआईआर हैं। हाईकोर्ट ने पांच लाख रुपए का मुआवजा देने का भी आदेश दिया है। इस लिहाज से यह बड़ी खबर है। देशबन्धु का फ्लैग शीर्षक है, मजदूर आंदोलन मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला। देशबन्धु ने हाईलाइट किया है, कोई ठोस सबूत नहीं दे सकी उत्तर प्रदेश सरकार। अमर उजाला में यह पहले पन्ने पर तीन कॉलम की खबर है। शीर्षक है, “नोएडा श्रमिक आंदोलन : हाईकोर्ट ने छात्रा से रासुका हटाया, मुआवजे का भी आदेश”। दैनिक भास्कर और नवोदय टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है।

तीसरी अमर उजाला की सेकेंड लीड है, 120 करोड़ की टोल टैक्स चोरी, 7 राज्यों में 14 जगह ईडी के छापे। ना खाउंगा ना खाने दूंगा के बावजूद इस तरह की खबरें कैसे आती हैं मैं नहीं समझ पाता हूं। फिर भी खबर तो है और 1.5 करोड़ रुपए के ट्रेल के लिए आम आदमी पार्टी के नेता पर तीसरा मामला बनाया गया है तो यह 120 करोड़ की चोरी कैसे हुई और कोई बड़ी गिरफ्तारी नहीं हुई तो मुझे मामला अलग ही लगता है पर इस एंगल से अब खबरें होती नहीं हैं। और हो तो उसका संबंधित विस्तार और विवरण नहीं होता है।    

अदालत के आदेश की खबर आज अंग्रेजी अखबारों में सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। शीर्षक है, नोएडा आंदोलन : हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा के खिलाफ एनएसए रद्द किया। इस खबर के इंट्रो में बताया गया है – पांच लाख की राहत मिलेगी, लेकिन जेल से रिहा नहीं किया जाएगा। मजदूर आंदोलन में छात्रा पर एनएसए और फिर उसे रद्द किया जाना अपने आप में खबर है। पांच लाख का मुआवजा भी बड़ी बात है लेकिन 11 और एफआईआर हैं, अपने आप में बड़ी बात है और आज खबर में इसे हाईलाइट नहीं किया जाना असाधारण है। हालांकि, अब ऐसा आम है। अमर उजाला की प्रस्तुति उदाहरण है। जहां यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है वह भी कम नहीं है। ऐसे में कहा जा सकता है कि टाइम्स ऑफ इंडिया की प्रस्तुति खबर के अनुकूल है।

आज यह खबर मेरे 10 अखबारों में सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। खबर के इंट्रो में बताया गया है कि जेल से अभी आजादी नहीं मिलेगी। खबर पढ़ने से पता चला है कि आकृति का नाम 11 एफआईआर में है। ये एफआईआर नोएडा के पांच थानों में दर्ज हैं। इनमें दंगा करने से लेकर हत्या की कोशिश, लूट पाट, हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान और हिंसा के लिए उकसाने जैसे आरोप शामिल हैं। आकृति को अभी तक इनमें से पांच मामलों में ही जमानत मिली है। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार आंदोलनों को ऐसे ही कुचलती रही है। इस तरह की कार्रवाई से विरोधियों को डराती और निपटाती भी रही है। इसलिए यह खबर बड़ी है और पहले पन्ने पर तो होनी ही चाहिए थी। दि इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर पहले पन्ने पर है और आकृति की फोटो का कैप्शन है, आकृति चौधरी का नाम 11 एफआईआर में दर्ज कराया गया है। इंट्रो है, दिल्ली विश्वविद्यालय की स्नातक  आकृति चौधरी अप्रैल से जेल में है। 

एसआईआर के तहत राघव चड्ढा का नाम कट जाने और उनका पंजाब सरकार पर आरोप तथा पंजाब सरकार के जवाब कि राज्य सरकार का कोई लेना-देना नहीं है के बावजूद आज इस आशय की एक खबर दि इंडियन एक्सप्रेस में है लेकिन दलबदल के बाद एसआईआर के लिए अपनी ही पार्टी पर आरोप लगाना और लाखों नाम कटने पर चड्ढा की चुप्पी दिलचस्प है। इस पर इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने की जगह लुटाई है। आप जानते हैं कि तमाम मामलों में सरकार, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग ने कार्रवाई (सुनवाई) नहीं की है। कर्नल सोफिया कुरैशी के लिए अपशब्द कहने वाले मंत्री को बचाने में लगी है, सो अगल। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है, मध्य प्रदेश सरकार ने कर्नल सोफिया पर टिप्पणी के लिए मंत्री के खिलाफ मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी नहीं दी।

खबर के अनुसार, मध्य प्रदेश सरकार ने पांच-बिंदुओं वाला जवाब तैयार किया है, जिसमें राज्य के मंत्री विजय शाह पर मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी न देने वजह बताई गई है। शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित टिप्पणी की थी, जो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की मीडिया ब्रीफ़िंग के दौरान चर्चा में आई थीं। यह जवाब अगले कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने की उम्मीद है। जवाब में कहा गया है कि किसी ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई, मंत्री ने कर्नल कुरैशी का नाम नहीं लिया, बाद में कई बार माफ़ी भी मांगी और उनकी टिप्पणी से सांप्रदायिक सद्भाव भी नहीं बिगड़ा। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार जब मंत्रियों (या आरोपियों) की रक्षा करती है तो उनकी गिरफ्तारी नहीं होती है। दूसरी ओर आरोप हाईकोर्ट रद्द करे या सुप्रीम कोर्ट में खराब स्थिति देखकर सरकार आरोप वापस ले, आम आदमी या सरकार विरोधी को गिरफ्तारी से राहत नहीं मिलती है। इसमें पत्रकार भी शामिल रहे हैं। यह सब सुप्रीम कोर्ट की जानकारी में हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट भी न्याय मांगने वाले को कॉक्रोच और पैरसाइट कह चुका है। यह अलग बात है कि उसी के बाद कॉक्रोच जनता पार्टी बनी और सरकार घिर गई लगती है। लोगों का डर कम हुआ है और विरोध हो रहा है। इस क्रम में सरकारी रवैया नहीं बदला है। कल एक रिटायर नौकरशाह को गिरफ्तार कर लिया गया और शाम में रिहा किया। इस बीच उनके परिवार को सूचना देने की औपचारिकता भी नहीं निभाई गई।

आकृति चौधरी के मामले में जो हुआ उसका विवरण, देशबन्धु ने दिया है। खबर के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय जाने को कहा था। खबर के अनुसार, आकृति चौधरी के खिलाफ दर्ज मामलों में ग्रेटर नोएडा की सत्र अदालत में चार बार जमानत की अर्जी लगाई गई थी। इनमें से तीन अर्जियां खारिज हो चुकी थीं, जबकि एक मामले में उन्हें राहत मिली थी। इसके बाद आकृति चौधरी ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने सीधे जमानत देने के बजाय उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट जाने को कहा था। यह पूरा मामला 13 अप्रैल को वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हुए मजदूर आंदोलन से जुड़ा है। पुलिस का आरोप था कि आंदोलन के दौरान आकृति चौधरी ने मजदूरों को भड़काने की कोशिश की थी। इसके बाद आंदोलन में हिंसा और आगजनी हुई थी और इलाके में तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी। हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, ‘मनगढ़ंत’: हाईकोर्ट ने नोएडा में मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन के मामले में दिल्ली विवि स्नातक की रासुका के तहत हिरासत रद्द की। हाईलाइट किया हुआ अंश है, यह तब हुआ जब पीठ ने गिरफ्तारी के क्रम और जारी किए गए नोटिस के क्रम की जांच में पाया कि कई चूक थी।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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