
देवप्रिय अवस्थी-
भास्कर भोपाल में दो साल
दैनिक भास्कर, भोपाल में मुख्य समस्या दो पीढ़ियों के सोच और कार्यशैली में अंतर की थी. संपादक महेश श्रीवास्तव पुरानी पीढ़ी के पत्रकार थे. प्रबंध संचालक सुधीर अग्रवाल नई पीढ़ी के मालिक, हमेशा कुछ नया करने के लिए अधीर. महेश जी सुधीर अग्रवाल के दादा द्वारका प्रसाद अग्रवाल के समय से भास्कर से जुड़े थे. वे सुधीर जी के पिता और भास्कर समूह के अध्यक्ष रमेश अग्रवाल के हमउम्र थे. उनके लिए सुधीर जी अभी भी वही गुड्डू थे जिन्हें उन्होंने एक बच्चे से किशोर और वयस्क होते हुए देखा था. दूसरी तरफ सुधीर जी महेश अंकल की उम्र का लिहाज करते थे और अखबार के रोजमर्रा के कामकाज के सिलसिले में उनसे ऐसा कुछ भी कहने में हिचकते थे जिससे महेश जी को ठेस पहुंचे.
ऐसे में मेरी भूमिका दोनों के बीच पुल की थी. अखबार में काम कर रहे साथियों में भी कभी-कभी पीढ़ियों का यह अंतर झलकता था. सुधीर जी को मैंने शुरुआती दिनों में आश्वस्त कर दिया था कि मैं अखबार की व्यवस्थाएं आपके अनुसार चलाऊंगा, लेकिन महेश जी को भरोसे में लेकर. मुझे अपने संपादक को अंधेरे में रखना या उनकी अवहेलना करना मंजूर नहीं है. सुधीर जी ने मेरी यह बात मानने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई.
मेरे काम शुरू करने से पहले भास्कर, भोपाल के विभिन्न पेज अक्सर तय समय पर तैयार नहीं हो पाते थे जिससे अखबार की छपाई में देर होती थी. इसकी मुख्य वजह खबरों की प्राथमिकता तय करने में पेज इंचार्ज की ऊहापोह रहती थी. इस स्थिति से निजात पाने में पिछले अखबारों का मेरा अनुभव काम आया. यह अनुभव था-पेज की लीड, सेकंड लीड और बाटम स्प्रेड पहले तय और तैयार कर ली जाएं और उन्हे फोटो कंपोजिंग विभाग को इस निर्देश के साथ भेजा जाए कि उन्हें पहले कंपोज किया जाना है. इन तीन खबरों के पहले तैयार होने से पेज डिजाइनिंग/मेकअप का काम आसान हो जाता है. दीगर है कि कभी-कभार खबरों की प्राथमिकता ऐन वक्त पर बदलनी पड़ती है. ऐसे मौके महीने दो-तीन बार से ज्यादा नहीं आते.
भोपाल में शहर की खबरों की जिम्मेदारी दूसरे समन्वय संपादक राजेश पांडेय के पास थी. देशबंधु में काम कर चुके पांडेय जी मुझसे कुछ दिन पहले ही भास्कर से जुड़े थे. वे बहुत सुलझे हुए और गंभीर स्वभाव वाले व्यक्ति थे. हम दोनों के बीच पूरी तरह समन्वय था. इस वजह से अखबार की सभी व्यवस्थाएं पटरी पर आने में ज्यादा समय नहीं लगा.
सुधीर जी ने भास्कर के सभी संस्करणों के प्रभारी संपादकों और सीनियर साथियों की द्विवार्षिक बैठकों की एक अच्छी परंपरा शुरू की थी. ये बैठकें समूह के सीनियर लोगों के मिलने-जुलने, अनुभव सा़झा करने और भविष्य की कार्ययोजना बनाने का अवसर होती थीं. 1999 की शुरुआत में ऐसी ही एक बैठक में भोपाल में हुई. इस बैठक में मैंने सभी संस्करणों के लिए समान वर्तनी नियमावली बनाने और नए पत्रकारों के प्रशिक्षण के लिए भास्कर की अपनी अकादमी खोलने के सुझाव दिए. बैठक में तो इस बारे में कोई निर्णय नहीं हुआ, लेकिन कुछ दिन बाद सुधीर जी ने मुझे वर्तनी नियमावली तैयार करने के निर्देश दिए.
चूंकि जनसत्ता के लिए वर्तनी नियमावली को अंतिम रूप मैंने ही दिया था, इसलिए मुझे इस काम का अनुभव भी था और इसमें रुचि भी. मैंने जनसत्ता वाली वर्तनी नियमावली में कुछ संशोधन-परिवर्धन के साथ एक सप्ताह के भीतर ही नई वर्तनी नियमावली बनाई और सुधीर जी को सौंप दी. सुधीर जी ने उसी समय अपने सचिव को वर्तनी नियमावली की 1000-1200 प्रतियां छपवाकर समूह के सभी संपादकीय सहयोगियों को भेजने के निर्देश दिए. मेरी इच्छा थी कि सभी प्रमुख संस्करणों में किसी एक सहयोगी को वर्तनी नियमावली के अनुपालन की निगरानी की जिम्मेदारी दी जाए, लेकिन यह व्यवस्था नहीं हो सकी. वर्तनी नियमावली भेजने के साथ सभी संपादकीय सहयोगियों से उसमें संशोधन -परिवर्धन के लिए सुझाव भी मांगे गए थे, लेकिन किसी भी सहयोगी ने सुझाव देने में रुचि नहीं ली. संभवतः सभी ने मान लिया था कि सुधीर जी की इच्छा का अक्षरशः पालन किया जाना चाहिए.
वर्ष 2000 के अप्रैल माह में प्रबंधन ने महेश श्रीवास्तव की जगह नरेंद्र कुमार सिंह को स्थानीय संपादक बनाने का फैसला किया. नईदुनिया, इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले एनके उन दिनों इंडिया टुडे के मध्यप्रदेश और राजस्थान ब्यूरो के प्रमुख थे. वे भोपाल में इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर भी रह चुके थे. यकीनन, एनके बेहतरीन पत्रकार थे और हैं, लेकिन उनका एकाएक आना और महेश जी की विदाई सहज तो नहीं थी. महेश जी को सलाहकार की भूमिका देकर उनके लिए संपादकीय विभाग से अलग कक्ष में बैठने की व्यवस्था की गई जबकि उनके रिटायरमेंट में अभी लगभग डेढ़ साल का समय बाकी था. मुझे यह स्वीकार करने में संकोच नहीं कि इस बदलाव से मैं भी असहज था. मैं एनके को वह आदर-सम्मान नहीं दे पाता था जिसके वे हकदार थे. संभव है कि एनके ने मेरी यह मन: स्थिति भांप ली हो इसलिए वे अखबार के रोजमर्रा के कामकाज में मुझसे ज्यादा अहमियत मेरे जूनियर साथियों को देने लगे.
गनीमत थी कि यह स्थिति ज्यादा लंबी नहीं खिंची. प्रबंधन ने दिसंबर 2000 के दूसरे पखवाड़े में मुझे रायपुर स्थानांतरित कर वहां के स्थानीय संपादक की जिम्मेदारी दे दी. रायपुर रवानगी के पहले भोपाल के संपादकीय सहयोगियों का उल्लेख करना चाहूंगा.
विप्लव राही नामक एक साथी बहुत कम समय के लिए उप समाचार संपादक रहे. राज्य ब्यूरो में प्रशांत कुमार, रवि भोई, विनोद तिवारी, अनिल शर्मा, हृदयेश दीक्षित, मिलिंद कुलकर्णी, आनंद पांडेय रिपोर्टर थे तो भोपाल शहर की रिपोर्टिंग के प्रमुख राजेश चंचल थे. चंचल के सहयोगियों में अलीम बज्मी, भगवान उपाध्याय, रवींद्र कैलासिया और सुनील शुक्ल शामिल थे. शहर के प्रेस नोट और पेज तैयार करने के लिए एक अलग डेस्क थी जिसे महेश दीक्षित, अजय तिवारी, हेमंत बिश्नोई आदि देखते थे.
मुख्य डेस्क के इंचार्ज रवींद्र श्रीवास्तव थे. उनके सहयोगियों में अजित सिंह, भरत सक्सेना (बाद में इंदौर स्थानांतरित), चंद्रभान चौरसिया, कृष्ण मोहन मिश्र, अनुराग त्रिवेदी, इंदिरा त्रिवेदी, अनिल चोलकर, पंकज मुकाती शामिल थे. नगीन बारकिया और आनंद नायक खेल तथा नरपतसिंह भदोरिया व्यापार पेज की जिम्मेदारी संभालते थे.
प्रादेशिक डेस्क अरविंद शीले के जिम्मे थी. शीले जी की नियुक्ति मुझसे बाद में हुई थी. गीता श्रीवास्तव, अरुण त्रिवेदी, गोविंद राजपूत, उमाकांत त्रिपाठी, रमेश दुबे आदि उनके सहयोगी थे.
इन सहयोगियों की जिम्मेदारी के बंटवारे का उल्लेख करने में मुझ से कुछ चूक हो सकती हैं जिन्हें मैं पुष्ट जानकारी मिलने पर दुरुस्त कर दूंगा. दो साल का यह पड़ाव यहीं पूरा होता है. यह पोस्ट ज्यादा लंबा न हो इसलिए अल्पजीवी भास्कर पत्रकारिता अकादमी के अनुभव अलग पोस्ट में लिख रहा हूं.

उमेश चतुर्वेदी-
देवप्रिय अवस्थी Devpriya Awasthi जी की पत्रकारिता यात्रा के 13 वें भाग पर मेरी राय
उन्हीं दिनों मैं भी दैनिक भास्कर में था, लेकिन दिल्ली ब्यूरो में..दैनिक भास्कर ने रिपोर्टिंग का मौका दिया.. लेकिन तब प्रोफेशनलिज्म नहीं था..ब्यूरो चीफ शरद द्विवेदी थे. उन्होंने खूब सिखाया.. हालांकि कुछ देर से..जब तक उनका वरदहस्त मिलता, उन्हें भास्कर ने कोने में बैठा दिया.. बाद में आए रवींद्र शाह ने शुरू में तंग बहुत किया.. लेकिन बाद में उन्होंने पूरी रिपोर्टिंग टीम में वरिष्ठों के होने के बावजूद मुझ पर ज्यादा भरोसा करना शुरू किया.. तभी उन्हें उनके ही एक नजदीकी रहे ब्यूरो के ही सज्जन ने निबटवा दिया.. उनके बाद आए आलोक मेहता.. उन्हें जब बड़े काम लेने होते थे तो मैं याद आता था.. लेकिन कहीं रिपोर्टिंग के दौरे पर मेरी ही बीट की खबर के लिए जाने को बुलावा-मौका मिलता तो वे दूसरों पर भरोसा करते थे.. उनके बाद आए सज्जन का नाम लेना उचित नहीं.. उन्होंने मुझे पानीपत भिजवा दिया…क्योंकि उनके खेल में शामिल होने का मुझे न तो तब शऊर था.. और न ही अब…
उसी दौरान लोकसभा में महिला आरक्षण बिल को समाजवादी पार्टी के सांसदों ने तत्कालीन कानून मंत्री राम जेठमलानी के हाथों से छीनकर चिंदी उड़ा दी थी.. उसकी खबर मैंने ही लिखी थी.. नया था तो मन लगाकर लिखा था.. शरद जी ने बाइलाइन दी थी.. तब भास्कर के फ्रंट पेज चार जगह बनते थे, जयपुर, भोपाल, इंदौर और चंडीगढ़.. भोपाल में बना पेज ही छत्तीसगढ़ के भी संस्करणों में जाता था..
उन दिनों बाइलाइन कोष्ठक में दी जाती थी.. दिल्ली में सबसे पहले जयपुर का संस्करण आता था.. उसमें बाइलाइन वाले कोष्ठक में सिर्फ उमेश छपा था और कोष्ठक बंद होने के पहले खाली जगह थी.. भोपाल में भी वैसा ही था.. वह कुछ ऐसे था.. (उमेश ) खाली जगह रखना समझ से परे था.. लेकिन जब अगले दिन रायपुर संस्करण वाला अखबार आया तो समझ में आया कि कोष्ठक में खाली जगह क्यों थी.. दरअसल बाइलाइन में चतुर्वेदी में त वाली मात्रा च पर लगी थी… तब भोपाल में प्रथम पेज बनवाने का जिम्मा कृष्ण मोहन मिश्र को था.. शायद प्लेट बनने के बाद भोपाल और जयपुर में बाइलाइन की गलती पर निगाह गई तो उसमें से चतुर्वेदी को खुरचकर मिटा दिया गया था.. हालांकि यह चूक कृष्णमोहन की थी, मुझे पता नहीं था.. क्योंकि तब ब्यूरो वालों को पता ही नहीं होता था कि पहला पेज कौन देखता है और हमारी खबरें किसके हाथों गुजरती हैं..
बहरहाल कुछ वर्षो बाद जब इंडिया टीवी लांच होने से कुछ पहले मुझे वहां नौकरी मिल गई। रिपोर्टरों की कापियां जांचने और उन्हें सुधारने के साथ ही असिस्टेंट प्रोड्यूसरों और दूसरे लोगों की कॉपियां भी देखने-सुधारने का एक शिफ्ट में मैं इंचार्ज रहता था.. कृष्णमोहन तब तक इंडिया टीवी में आ चुके थे और बड़े रिपोर्टर के रूप में उभर रहे थे.. अक्सर उनके साथ होता कि उनकी कॉपी बाद में ओके होती.. वे समझते थे कि मैं बाइलाइन की गलती का बदला चुका रहा हूं.. एक दिन सुबह की शिफ्ट खत्म होने के बाद बाहर गिरधारी की चाय की दुकान पर उन्होंने तकरीबन पैर ही पकड़ लिया.. कब तक दंडित करते रहेंगे मुझे.. मैंने मजाक समझा क्योंकि मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था.. तब पूछने पर कृष्णमोहन ने बताया कि उनसे ही बाइलाइन में हिज्जे की गलती हुई थी.. यह सुनकर मुझे खूब हंसी आई.. मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मुझे इसकी जानकारी ही नहीं हैं..
भास्कर से जुड़े ऐसे कई किस्से याद आ रहे हैं.. लेकिन सच मानिए.. आपका नाम तो मैं जानता था.. लेकिन मुझे तब पता नहीं था कि आप भोपाल में उसी अखबार में जिम्मेदारी के पद पर हैं, जिसके दिल्ली ब्यूरो का मैं अदना सा रिपोर्टर हूं…
पिछला भाग…


