बीबीसी न्यूज हिंदी की पत्रकार शुभांगी मिश्रा की खोजी रिपोर्ट ने एक नया बखेड़ा कर दिया है। रिपोर्ट में सामने आया कि पिछले लोकसभा चुनाव से पहले, साल 2023-24 के वित्त वर्ष में कई छोटे दलों को काफ़ी ज़्यादा चंदा प्राप्त हुआ।
इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए बीबीसी की टीम ने लगभग दो महीने पसीना बहाया। पड़ताल में उन्होंने छह ऐसे दलों के बारे में पता किया, जिन्हें ‘रजिस्टर्ड अनरिकग्नाइज़्ड पॉलिटिकल पार्टीज़’ यानी RUPPs कहते हैं।
बीबीसी की टीम को पता चला कि इन पार्टियों को सैकड़ों करोड़ का चंदा मिला, जोकि कुछ मामलों में किसी राष्ट्रीय दल से भी ज़्यादा रहा। लेकिन ये पार्टियां चुनावी राजनीति में अधिकतर गायब ही रहीं।
वहीं, इस प्रकरण पर एक्सपर्टस का कहना है कि हो सकता है ये पार्टियां असल में स्वतंत्र राजनीतिक संगठन ना हों, इसके बजाय ये पार्टियां टैक्स चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, हवाला लेनदेन और दूसरी वित्तीय अनियमितताओं के लिए एक तरह से मोर्चे के तौर पर काम कर सकती हैं।
ये कोई हैरत की बात नहीं है। छह गुमनाम पार्टियों को 1700 करोड़ को चंदा किन कारणों से मिला ये भी सब जानते हैं। पुराना खेल है।
ये सारी पार्टियाँ किसी की जेबी पार्टियाँ हैं। इनके ज़रिए काला-सफ़ेद भी हो रहा है और ये की बड़ी पार्टी के चुनाव खर्चे को भी मैनेज कर रही हैं।
इसीलिए किसी भी पार्टी के पास चंदे और उसके खर्च का रिकॉर्ड नहीं मिलेगा। लेकिन सरकार चाहे तो उगलवा सकती है। इन पार्टियों को पकड़कर थर्ड डिग्री इस्तेमाल कीजिए सब बता देंगे।
लेकिन सरकार क्यों चाहेगी, वो तो ख़ुद भी लाभार्थी है।
-मुकेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

कृष्ण कांत-
इलेक्टोरल बॉन्ड पार्ट-2
गुमनाम पार्टियों का चंदा कांड किसके कुशल नेतृत्व में हुआ? क्या यह इलेक्टोरल बॉन्ड जैसा कारनामा है जो सत्ता के संरक्षण में हो रहा है?
अगर ऐसा नहीं है तो अभी तक इन पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? ED की नजर इन पर क्यों नहीं पड़ी? जो पार्टी चुनाव नहीं लड़ती, वह हजारों करोड़ चंदा किस आधार पर ले रही है?
जिन पार्टियों का कोई अस्तित्व नहीं है वे राष्ट्रीय पार्टियों से ज्यादा, हजारों करोड़ का चंदा कैसे उठा रही हैं? इन्हें चंदा दे कौन रहा है?
ये किसका काला धन है जो फर्जी/शेल पार्टियों में खपाया जा रहा है?
ऐसी ही अचानक एक शेल पार्टी वजूद में आई जिसमें टीएमसी को तोड़कर उसके नेता शामिल कराए गए।
पहले शेल कंपनियां बनती थीं। अब शेल पार्टियां बन रही हैं। इस फर्जीतंत्र का जनक और निर्माता कौन है?
बहुत ही शानदार रिपोर्ट है। भारत की चुनावी प्रक्रिया सड़ गई है। इसमें इतने स्तर पर घोटाले के दरवाज़े खोल दिए गए हैं कि पता नहीं चलता जो रिजल्ट हम देखते हैं वो आयोग का है या प्रिंटर से निकला है।
छह पार्टी के पास सैंकड़ों करोड़ का चंदा कहाँ से आया? क्या इसकी जाँच में भी बरसों लगेंगे? इस पैसे के ख़र्च किए जाने का हिसाब तो होगा। क्या ये पैसा वोट ख़रीदने के लिए बाँटा गया है?
-रवीश कुमार
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