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आयोजन

जयंती समारोह में वरिष्ठ हिंदी-सेवी पत्रकार कुमार कृष्णन को ‘बेचन’ स्मृति-सम्मान!

Group of people on a stage presenting a framed certificate at a cultural event, with a bright yellow table skirt in front.

पटना/भागलपुर। आलोचना-साहित्य के प्रतिमान-पुरुष थे डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’। उन्होंने हिंदी आलोचना को नीरसता के घेरे से बाहर निकालकर उसमें कथा और काव्य का लालित्य तथा सरसता पैदा की। वे केवल आलोचक ही नहीं, बड़े कवि, कथाकार और नाटककार भी थे। यही कारण है कि उनकी आलोचनात्मक टिप्पणियों में भी साहित्यिक संवेदना और रचनात्मकता दिखाई देती है।

ये बातें बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने सोमवार को सम्मेलन में आयोजित ‘हिंदी पखवारा-सह-पुस्तक चौदस मेला’ के चौथे दिन डॉ. बेचन जयंती समारोह की अध्यक्षता करते हुए कहीं। उन्होंने कहा कि डॉ. बेचन बहुआयामी सारस्वत प्रतिभा के धनी और अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व के साधु-पुरुष थे। साहित्य सम्मेलन से उनका गहरा आत्मीय संबंध था। वे कई वर्षों तक भागलपुर जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रहे और 1996 से 2001 तक बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष का दायित्व भी संभाला।

समारोह का उद्घाटन पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मान्धाता सिंह ने किया। उन्होंने कहा कि डॉ. बेचन ने अपने साहित्यिक अवदान से बिहार का गौरव बढ़ाया। रचनात्मक और आलोचनात्मक लेखन के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य के भंडार को समृद्ध किया। वे मनीषी विद्वान होने के साथ-साथ एक प्रतिबद्ध शिक्षाविद भी थे।

इस अवसर पर मुंगेर के वरिष्ठ पत्रकार एवं हिंदी-सेवी कुमार कृष्णन को वर्ष 2026 का ‘डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ स्मृति-सम्मान’ प्रदान किया गया। उन्हें वंदन-वस्त्र, प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिह्न तथा 11 हजार रुपये की सम्मान-राशि देकर सम्मानित किया गया।

समारोह के मुख्य अतिथि मिथिला विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. रत्नेश्वर मिश्र ने कहा कि डॉ. बेचन का व्यक्तित्व बहुआयामी और प्रभावशाली था। वे जितने आकर्षक थे, उतने ही प्रभावशाली भी। उनके व्यक्तित्व में एक ऐसी आत्मीयता थी कि हर व्यक्ति उनके निकट आना चाहता था, जबकि उनकी विद्वत्ता और प्रभाव के कारण एक सहज संकोच भी बना रहता था। उन्होंने कहा कि डॉ. बेचन अपनी रचनाओं में दबे-कुचले और वंचित लोगों की आवाज को प्रमुखता देते थे। इसी कारण उन्हें मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित माना गया, लेकिन वे किसी एक विचारधारा की सीमा में बंधे हुए साहित्यकार नहीं थे। वे पुस्तकालय आंदोलन से भी गहराई से जुड़े रहे और पुस्तकालय संघ के अध्यक्ष रहे।

Man in white kurta with red stole holding a framed certificate, woman in blue sari beside him in an indoor setting with a Hindi sign in the background.

मगध विश्वविद्यालय में मानविकी संकाय के पूर्वाध्यक्ष प्रो. शैलेंद्र कुमार चौधरी, डॉ. बेचन के पुत्र एवं बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के परीक्षा-नियंत्रक डॉ. मनोज कुमार झा, बिहार सरकार में संयुक्त सचिव रह चुके साहित्यकार डॉ. ब्रज किशोर पाठक, उनकी पुत्री डॉ. मीना ठाकुर, डॉ. रीना पाठक, डॉ. बी. एन. ठाकुर सहित अन्य वक्ताओं ने भी डॉ. बेचन के व्यक्तित्व और कृतित्व को स्मरण करते हुए उनके साहित्यिक अवदान को रेखांकित किया।

समारोह के अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि डॉ. रत्नेश्वर सिंह, शमा कौसर ‘शमा’, इरफान अहमद बेलहारबी, इं. अशोक कुमार, रजनीश कुमार गौरव, इंदु भूषण सहाय, राजेश शुक्ल सहित अनेक कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का सुमधुर पाठ कर वातावरण को साहित्यिक सरसता से भर दिया।

धन्यवाद-ज्ञापन सम्मेलन की प्रचार मंत्री विभारानी श्रीवास्तव ने किया, जबकि मंच संचालन कवि ब्रह्मानंद पाण्डेय ने किया।

समारोह में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार इं. बाँके बिहारी साव, डॉ. नागेश्वर प्रसाद यादव, प्रो. प्रत्युष, सुधीर कुमार मिश्र, राकेश कुमार मंडल मृणाल कुमार पाठक, ईशा कुमारी, चंद्रमा चौधरी, शीला कुमारी, डॉ. चंद्रशेखर आजाद, सच्चिदानंद शर्मा, पूजा झा, सुनीता देवी, राकेश कुमार मंडल सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, शिक्षाविद और प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

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