यशवंत सिंह-
आज “हनुमान अंश” देख आया। गौर सिटी माल में अब दिन भर में केवल एक शो चलाया जाता है। उतर जाने से पहले देखने की इच्छा थी। मुझे सबसे अच्छा दृश्य लगा बाबा के मेहरारू द्वारा दाढ़ी न रखने की प्रार्थना करना और बाबा ने इसे माना। हालांकि बीवी को काबू में लाने के लिए उन्हें अपने जीभ पर सरसों जमाने का चमत्कार दिखाना पड़ा।
नीम करौली बाबा के पुत्र से मेरी मुलाक़ात है। वृंदावन में। उन्हें छोटे महाराज जी लोग कहते थे। दिल्ली के छतरपुर में बड़ा आश्रम है नीम करौली बाबा का। वहाँ कई बार मैंने अपने जानने वालों के लिए कमरे फ्री में बुक कराए थे। एक एक्साइज अफ़सर थे जो नीम करौली बाबा के अनन्य भक्त थे। उनके माध्यम से इस पंथ के बहुत से लोगों से जान पहचान हुई। हालांकि वे एक्साइज अधिकारी जल्दी मर गए। मथुरा में लंबे समय तक पोस्टेड रहे। मैं कहीं भी रहूँ, कहते ही एक पेटी बियर या दारू भिजवा देते थे। मैं पीकर भजन गाता था तो उनको अच्छा लगता था। वे मुझे संत स्वभाव वाला कहते तो मैं उन्हें मददगार टाइप आदमी बताता।
श्रीमती जी की बहुत पहले एक बार इच्छा हुई सपरिवार कैंची धाम वाले नीम करौली बाबा के मंदिर जाने की तो मैंने एक पुलिस कप्तान को फ़ोन कर सरकारी गाड़ी ड्राइवर गनर समेत मंगवाया और चल दिया। कैंची धाम ट्रस्ट के किसी आदमी से कहलवाया तो मंदिर के भीतर ही रुकने की व्यवस्था हो गई। हमने दो दिन वहीं ध्यान किया। पुत्र आयुष भी ध्यान लगाने की प्रैक्टिस कर रहा था।
जिस जगह आदमी की भीड़ ज़्यादा हो जाती है उस जगह से सकारात्मक ऊर्जा ग़ायब हो जाती है। कुछ वैसे ही जैसे एक जलते दिए को इतने लोग घेर लें कि वहाँ ऑक्सीजन की कमी हो जाए तो दिया बुझ जाएगा। कैंची धाम फ़िल्म देखकर जाने वालों की भीड़ ने उधर के पहाड़ की शांति में खलल डाल दिया है। इस देश की ज्यादातर जनता औसत बुद्धि से नीचे वाली है और इसे भेड़ चाल में यकीन है। अरे जाकर विपश्यना करो दस दिन। फ्री में होता है। खाना रहना सब फ्री। वहाँ दस दिन रुक गए तो थोड़ा सा समझ आ जाएगा ध्यान का.. क ख ग क्या होता है। और, नीम करौली बाबा तो बचपन से गहरे ध्यानी थे। जब आप हर किस्म के भय लोभ आसक्ति वासना से मुक्त हो जाते हैं तो एक सहज अवस्था प्रकट होती है। इस एनलाइटेंड मोड में आने वाले ख़ुद महसूस करते हैं कि दुनिया बाहर से ज़्यादा अंदर है और अंदर को साधे बग़ैर बाहर शांति से नहीं जिया जा सकता।
मैं बाबा के चमत्कारों के बारे में कुछ नहीं कहूँगा। उच्च सिद्धि पाये लोग मानवेतर ताकतों गुणों से लैस हो जाते हैं हालाँकि उन्हें इसका अहंकार नहीं होता और न इसका दिखावा करना पसंद करते हैं। मुझे नीम करौली बाबा और बुद्ध की साधना में एक कॉमन बात समझ आई। दोनों ने गहन ध्यान के ज़रिए चंचल मन और भावनाओं पर काबू हासिल किया। कोई हनुमान भक्त बन हनुमान चालीसा पढ़कर राम तक पहुँचा तो कोई श्वास के ज़रिए महासिद्ध हुआ और हर एक को ख़ुद के भीतर का दिया जलाकर ख़ुद को ही भगवान बनाने को कहा। इसमें कोई विरोधाभास भी नहीं है। इस ब्रह्मांड का अंश हूँ और मैं ख़ुद एक ब्रह्म हूँ। हर व्यक्ति एक ब्रह्मांड अपने भीतर समाये है। हम आंतरिक यात्रा के संकेतों को अनसुना कर देते हैं इसलिए अंदर ताला मारकर बाहर की हाय हाय किच किच में लोटते रहते हैं। जिस दिन मरने का भय आ जाए उस दिन संसार से मोह भंग हो जाना चाहिए। उस दिन से मरने का अभ्यास शुरू कर दो। सारी आदतें मार दो। सारे दुनियादारी वाले ज्ञान को मिटाओ। बाहर कुछ न रखा है। सब ऐसे ही रहेगा और ऐसे ही चलेगा। असली दुनिया भीतर है। एक घंटा लगातार आँख बंद करके बैठो, ध्यान न लगाने के लिए। हमें एक घंटा आँख बंद कर चुपचाप बैठना है डेली और उसी में सब सोचना है। जो विचार ख़याल आए उसका स्वागत करो उसे चलने दो। देखना एक दिन विचार विहीनता की स्थिति आने लगेगी। ध्यान न लगाने से ध्यान लगने की अवस्था शुरू हो जाएगी। आप प्रारंभ में पहले दिन ही विचार विहीन होने की जिद न करो। विचारों से खेलो। आने जाने दो। बीच बीच में ख़ुद को साक्षी भाव में ले जाओ और ख़ुद से कहो- देखो मैं देख रहा हूँ कि ये ये विचार आ जा रहे हैं!
शरीर को भी न्यूनतम रखना है तो उत्तेजना वाला तरल ठोस त्यागना होगा। जितना कम शरीर में ऊर्जा रहे। ये सब एक बड़ा आंतरिक विज्ञान है जो पढ़कर तो केवल सैद्धांतिक तौर पर जाना जा सकता है लेकिन जी कर इसे ख़ुद महसूस किया जा सकता है। जै जै



